हाल ही में आचार्य जी की अमेरिका के जाने-माने बुद्धिजीवी, लेखक और प्रसिद्ध पीबीएस (PBS) टेलीविज़न सीरीज़ 'क्लोज़र टू ट्रुथ' (Closer to Truth) के निर्माता व होस्ट डॉ. रॉबर्ट लॉरेंस कुह्न के साथ एक गहन चर्चा हुई। इस संवाद में विस्तार से पड़ताल की गई कि वास्तव में मौलिक क्या है; अहंकार या चेतना? इस दार्शनिक और वैज्ञानिक विमर्श को गहराई से समझने के लिए पूरा वीडियो ज़रूर देखें: https://youtu.be/fyif6U6kQxA?si=Z3WWL78_wxfqdlUi संसार में जब भी चेतना की बात होती है, तो विज्ञान और दर्शन इसे मस्तिष्क की एक जैविक उपज या कोई रहस्यमयी पराभौतिक अनुभव मानने लगते हैं। परंतु क्या चेतना कोई ऐसी वस्तु है जिसे बाहर प्रयोगशाला में देखा या मापा जा सके? आचार्य जी स्पष्ट करते हैं: "चेतना कोई बाहर रखी वस्तु नहीं है जिसका अध्ययन प्रश्नकर्ता कर सके; प्रश्नकर्ता (अहंकार) स्वयं चेतना नामक द्वैत के एक छोर पर बैठा है। अहंकार को चित्र से हटा दीजिए, फिर चेतना की बात करने वाला कौन बचता है?" __________ अवलोकन और परीक्षण विज्ञान चेतना की बात करते समय उसे एक वस्तु (Object) बना देता है। परंतु चेतना स्वयं वह द्रष्टा या कर्ता (Subject) है जो विज्ञान की रचना कर रहा है। अद्वैत वेदांत का मूल उद्देश्य मनुष्य के दुखों का निवारण करना है। और दुख का अनुभव बाहर किसी वस्तु को नहीं, बल्कि अहंकार को होता है। चेतना हमेशा द्वैतवादी होती है; यह हमेशा किसी विषय का किसी विषयी के लिए होना है। आचार्य जी कहते हैं: "वेदांत का अर्थ ही है सीधे उस 'मैं' (पीड़ित अहंकार) को देखना जो दुख भोग रहा है। जब तक अवलोकन करने वाला स्वयं अपनी आंतरिक स्थिति का परीक्षण नहीं करता, तब तक चेतना का कोई भी अध्ययन भ्रामक निष्कर्ष ही देगा।" ________ चेतना की सामग्री हमारा सामान्य जीवन पूरी तरह चेतना की सामग्री (Content of consciousness) से भरा रहता है: विचार, भावनाएँ, स्मृतियाँ और इच्छाएँ। हम मानते हैं कि इन अनुभवों का जोड़ ही हमारी चेतना है। हमारी चेतना कभी भी निरपेक्ष या तटस्थ होकर नहीं देखती। देखने वाला हमेशा अपनी किसी कामना या डर से भरा होता है। हम जगत को वैसा नहीं देखते जैसा वह है, बल्कि अपने आत्म-संरक्षण के लिए उसे विकृत करके देखते हैं। अहंकार मूलतः एक शारीरिक संरचना से उपजी भ्रांति है जो खुद को बचाने के लिए काल्पनिक कहानियाँ (Narratives) गढ़ती है। वह निष्पक्ष तथ्यों की परवाह किए बिना अपनी मनगढ़ंत पहचानों से चिपका रहता है। आचार्य जी इस पर सचेत करते हैं: "अहंकार का पूरा खेल आत्म-संरक्षण के लिए काल्पनिक कहानियों में जीना है, जिन्हें यदि परखा जाए तो वे ढह जाती हैं।" __________ 'नेति-नेति' और अहंकार की चालाकी चाहे बौद्ध परंपरा की 'शून्यता’ हो या वेदांत की 'पूर्णता', दोनों का मूल उद्देश्य अहंकार का विगलन ही है। परंतु अहंकार इतना चतुर है कि वह शून्यता और पूर्णता को भी एक विचार या अवधारणा बनाकर निगल जाता है और खुद को बड़ा कर लेता है। वेदांत में 'आत्मा' या 'सत्य' कोई बाहर मौजूद वस्तु नहीं है। उसकी परिभाषा केवल 'नेति-नेति' (Via Negativa) यानी नकार के माध्यम से ही संभव है। आचार्य जी कहते हैं: "आत्मा कोई नई वस्तु नहीं है; ईमानदार आत्म-परीक्षण द्वारा अहंकार का लगातार घटते जाना ही आत्मा की दिशा है। द्रष्टा देखने की इस प्रक्रिया से बच नहीं पाता; देखना ही द्रष्टा का विलीन होना है।" __________ स्वतंत्र इच्छा (Free Will) की वास्तविकता सामान्यतः मनुष्य मानता है कि उसके पास निर्णय लेने की स्वतंत्र इच्छा है। परंतु जब निर्णय लेने वाला अहंकार स्वयं अपनी मजबूरियों, सुरक्षा और डरों का गुलाम है, तो उसकी इच्छा कैसे स्वतंत्र हो सकती है? आचार्य जी स्पष्ट करते हैं: "अहंकार स्वयं अपना कैदी है। स्वतंत्र इच्छा केवल एक ही क्षण में संभव है; जब अहंकार स्वयं अपने विगलन (Self-dissolution) का चुनाव करता है। इसके अलावा अहंकार का हर निर्णय उसकी गुलामी से ही निकलता है।" __________________ आज का बोधकार्य इसी चर्चा पर आधारित है: 1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है? अपने शब्दों में लिखिए। 2. तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) चेतना को कैसे परिभाषित करता है और ये AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है? 3. आचार्य जी के अनुसार स्वतंत्र इच्छा (Free Will) क्या है? अपने जीवन से कुछ उदाहरण दीजिए जहाँ आपको लगता आप स्वतंत्र इच्छा का पालन करते हैं, क्या वाकई स्वंतंत्र होतीं हैं। 4. कल के बोध प्रत्युषा सत्र में आचार्य जी ने कहा कि अहंकार भी नहीं, बल्कि ‘दुख’ मौलिक होता है। आप इससे क्या समझे? संक्षिप्त में लिखिए।














































