
1️⃣ AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है? अपने शब्दों में लिखिए। ★ AP फ्रेमवर्क के परिभाषा से मैं समझ पाया हूं कि अहंकार की अनुपस्थिति या क्षिणता में जो बचता है वो चेतना है। मैंने ऐसा अनुभव किया है कि जब मैं (अहंकार) किसी क्रिया या में हस्तक्षेप नहीं करता और प्रकृति को उसकी गति में छोड़ देता हूं तो वहां एक स्थिति बनती है जहां वो गति अपने आप और स्पष्टता से होते रहती है।मैं उसे समझने भर की भी कोशिश करता हूं तो मैं उसमें हस्तक्षेप कर बैठता हूं। मेरे अनुसार शायद उसी स्थिति को चेतना कह सकते हैं। 2️⃣ तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) चेतना को कैसे परिभाषित करता है और ये AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है? ★ तंत्रिका विज्ञान चेतना को एक विषय मानती है। उनका मानना है कि जैसे हमारे मस्तिष्क में कुछ केमिकल्स या मूवमेंट से हमारे अंदर डर,मोह,लालच,क्रोध आदि का प्रवाह आता है,उसी तरह चेतना भी मस्तिष्क से उत्पन्न होती है और इसलिए वो उपकरणों की सहायता से चेतना को समझना चाहते हैं। ये AP फ्रेमवर्क से अलग है क्योंकि AP फ्रेमवर्क के अनुसार चेतना विषय न होकर खुद वो विषयी है जो खुद को विषय मान रहा है और बाहर खोजने की कोशिश कर रहा है। ये सब विषय,शोध,विज्ञान उसी चेतना के लिए और चेतना द्वारा बनाया गया है; जो फिर खुद को खोजने में इसका प्रयोग कर रहा है, जबकि वो अपने ही बनाए उपकरणों से पहले भी अस्तित्व में था। तो उसके खुद के निर्माण या उपकरण उसे नहीं खोज सकते,उसे केवल निष्पक्ष और ईमानदार आत्मावलोकन से जाना जा सकता है। 3️⃣ आचार्य जी के अनुसार स्वतंत्र इच्छा (Free Will) क्या है? अपने जीवन से कुछ उदाहरण दीजिए जहाँ आपको लगता आप स्वतंत्र इच्छा का पालन करते हैं, क्या वाकई स्वंतंत्र होतीं हैं। ★ स्वतंत्र इच्छा अहंकार के उस स्थिति से निकलती है जब वो क्षिण होता है। जब अहंकार किसी मान्यता, धारणा,वृत्तियों के प्रवाह और स्वार्थ से हटकर देखता है तब जो इच्छा होती है वो स्वतंत्र होती है क्योंकि बाकी के इच्छाएं वो किसी बाहरी ढांचे जैसे :- मान्यता,स्वार्थ,वृत्तियों के प्रवाह आदि में खुद को बांधकर पालता है। 4️⃣ कल के बोध प्रत्युषा सत्र में आचार्य जी ने कहा कि अहंकार भी नहीं, बल्कि ‘दुख’ मौलिक होता है। आप इससे क्या समझे? संक्षिप्त में लिखिए। ★ मैंने ये सत्र में भाग नहीं लिया था इसलिए आचार्य जी के इस कथन को सुन तो नहीं पाया लेकिन जहां तक मुझे लगता है कि दुख को इसलिए मौलिक बताया गया है क्योंकि अहंकार तो हर थोड़े देर में पहचान,रूप और रंग बदलते रहता है लेकिन वो जिस भी भेष को धारण करता है उसका दुख वही का वही रहता है, जो उसे खुद को खाली महसूस कराती रहती है। अहंकार के मान्यताएं,पहचान और रूप छूटते रहते हैं लेकिन दुख हमेशा साथ-साथ चलता है।



















