
(1) चेतना एक द्वैतवादी परिघटना है, जिसके एक छोर पर अहंकार और दूसरे छोर पर विषय होता है। इस संरचना के बिना चेतना नहीं है। अहंकार के विगलन के साथ वैसी चेतना भी समाप्त हो जाती है, जैसी अहंकार उसे जानता है। (2) तंत्रिका विज्ञान चेतना को मुख्यतः मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र की जैविक गतिविधियों से उत्पन्न अनुभव या जागरूकता के रूप में देखता है। वहीं AP Framework चेतना को केवल मस्तिष्क की उपज मानकर नहीं रुकता, बल्कि यह पूछता है कि अनुभव करने वाला ‘मैं’ कौन है और वह किस केंद्र से देख रहा है। यानी विज्ञान मुख्यतः चेतना के न्यूरल आधार को देखता है, जबकि AP Framework अहंकार और उसके अनुभव की संरचना को देखता है। (3) मेरी आज तक की ज़िंदगी में मुझे लगता रहा कि मैं अपनी इच्छा से फैसले ले रहा हूँ, लेकिन पीछे देखता हूँ तो ज्यादातर फैसले समाज की अपेक्षाओं के हिसाब से ही लिए हैं। पढ़ाई, करियर और कई दूसरे फैसलों में मैंने यही देखा कि मेरी इच्छा से ज्यादा समाज क्या कहेगा, इसी ने दिशा तय की। अब समझ आता है कि इसे स्वतंत्र इच्छा कहना सही नहीं होगा। (4) मेरे अनुसार मूल बात दुःख है, क्योंकि सबसे पहले हमें इसी दुःख को देखना है। अहंकार भी एक मान्यता है, लेकिन दुःख प्रत्यक्ष अनुभव है। यह दुःख हमारी अपेक्षाओं, मान्यताओं और उनसे चिपके रहने से पैदा होता है; इसलिए वहीं से जाँच शुरू करनी चाहिए।


















