
1️⃣ AP फ्रेमवर्क के अनुसार चेतना कोई बाहर रखी वस्तु नहीं है जिसका प्रयोगशाला में अध्ययन हो सके चेतना हमेशा द्वैतवाद होती है यह हमेशा किसी विषय का किसी विषय के लिये होता है एक दृश्य ओर एक दृष्टा अकेली चेतना जैसी कोई चीज नहीं होती हमारी चेतना कभी निरपेक्ष होकर नहीं दिखती देखने वाला हमेशा अपनी किसी कामना या डर से भरा होता है हम जगत को वैसा नहीं देखते जैसा वह है, बल्कि अपने आत्म - संरक्षण के लिए उसे विकृत करके देखते है 2️⃣ संसार में जब भी चेतना की बात होती है तो विज्ञान ओर दर्शन इसी दो तरह से देखते है मस्तिष्क की एक जैविक उपज ब्रेन से पैदा होने वाला secretion जैसा दूसरा कोई रहस्मय पाराभोतिक अनुभव जिसे बाहर प्रोगशाला में देखा या मापा जा सके दोनों ही मामलों में चेतना को एक वस्तु बना देता है जैसे बाहर से observ किया जा सकता है AP फ्रेमवर्क इसे अलग तरह से देखती है विज्ञान चेतना का अध्ययन करना चाहता है पर यह नहीं देखता कि अध्ययन करने वाला कौन है AP फ्रेमवर्क कहता है- जब तक अवलोकन करने वाला स्वयं अपनी आंतरिक स्थिति का परीक्षण नहीं करता तब तक चेतना का कोई भी अध्ययन भ्रामक निष्कर्ष ही देगा विज्ञान पूछता है - चेतना क्या है वेदांत पूछता है - चेतना की बात करने वाला मैं कौन है 3️⃣ आचार्य जी कहते है स्वतंत्र इच्छा केवल एक ही क्षण में संभव है जब अहंकार स्वयं अपने विगलन का चुनाव करता है उसके अलावा अहंकार का हर निर्णय उसकी गुलामी से ही निकलता है क्यों कि निर्णय लेने वाला अहंकार स्वयं अपनी मजबूरियों सुरक्षा, ओर दरों का गुलाम है मेरी जीवन का उदाहरण रिश्तों में लगता है मैने अपनी स्वतंत्र इच्छा से गुस्सा किया या प्यार जताया पर गुस्सा भी इसलिए आया ताकि मेरी छवि को चोट न लगे प्यार भी इसलिए जताया ताकि दूसरा मुझे छोड़ न दे पर देख भी पाई हों कि यह स्वतंत्रता नहीं थी स्वतंत्रता का एक ही क्षण है जब में कह पाऊं यह इच्छा मेरी अहंकार की है और मैं इसे नहीं चुनता मैं अपने मिटने का चुनता हूँ, जैसे सच बोलना, जबकि झूठ बोलने में अहंकार का लाभ हो 4️⃣ वेदांत का अर्थ सीधे उस मैं , पंडित अहंकार को देखना जो दुख भोग रहा है अहंकार मौलिक नहीं है क्यों कि वह शरीर, मन से बना एक विचार है एक भ्रांति है, वह बदलता रहता है पर दुख मौलिक है क्यों कि दुख का अनुभव ही वह पहली और सबसे सच्ची बात है जिसे कोई नकार नहीं सकता दुख बाहर किसी वस्तु को नहीं होता, अहंकार को होता है और उसी दुख के निवारण के लिए सारा अध्यात्म है इसलिए नेति - नेति कहा गया - आत्मा कोई वस्तु नहीं है ईमानदार आत्म परीक्षण है द्वारा अहंकार का घटते जाना ही आत्मा की दिशा है


















