
1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है? अपने शब्दों में लिखिए। एपी फ्रेमवर्क के अनुसार चेतना का मतलब ही है द्वैत। जिसमें एक तरफ अहंकार होता है तो दूसरे छोर में संसार। एक छोर में दृष्टा और दूसरे छोर पर दृश्य। चेतना कोई बाहर रखी हुई वस्तु नहीं है। 2. तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) चेतना को कैसे परिभाषित करता है और ये AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है? Neuroscience चेतना को मस्तिष्क की गतिविधियों से जोड़कर अध्ययन करता है। उदाहरण के लिए, नींद, एनेस्थीसिया, कोमा और जागृत अवस्था में मस्तिष्क की गतिविधियों में होने वाले बदलावों का अध्ययन करके वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करते हैं कि कौन-सी neural processes conscious experience के साथ जुड़ी हैं। जिस मस्तिष्क को मैं जान रहा हूँ, उस मस्तिष्क को जानने वाला कौन है? मान लीजिए MRI में आपके मस्तिष्क की गतिविधि दिखाई जा रही है। वहाँ तीन चीजें हैं: मस्तिष्क की गतिविधि → वैज्ञानिक उसे देख रहा है → वह गतिविधि जानी जा रही है। वेदान्त कहेगा कि जो कुछ जाना जा सकता है, वह ज्ञेय है। विचार, भावना, शरीर और मस्तिष्क—सब किसी न किसी अर्थ में ज्ञात हैं। तब प्रश्न आता है: ज्ञाता क्या है? यहीं वेदान्त की चेतना की अवधारणा Neuroscience से अलग हो जाती है। 3. आचार्य जी के अनुसार स्वतंत्र इच्छा (Free Will) क्या है? अपने जीवन से कुछ उदाहरण दीजिए जहाँ आपको लगता आप स्वतंत्र इच्छा का पालन करते हैं, क्या वाकई स्वंतंत्र होतीं हैं। आचार्य जी के अनुसार जो स्वतंत्र इच्छा है, वह भी हमारे कामनाओं, डर और कंडीशनिंग का परिणाम होती है। जो कि शरीर, समाज और संयोग से आती है। कहीं ना कहीं हमारी स्वतंत्र इच्छा, स्वतंत्र नहीं होती बल्कि इन तीनों से प्रभावित होती है। मैंने जब सीजीपीएससी एग्जाम की तैयारी करने का निर्णय लिया तो मुझे ऐसा लग रहा था यह मेरी स्वतंत्र इच्छा है लेकिन वास्तव में देखूं तो यह समाज द्वारा, परिवार द्वारा मुझ पर थोपी गई थी जिसे मैंने अपना मानकर अपनी स्वतंत्र इच्छा का टैग, उस पर लगा दिया था। 4. कल के बोध प्रत्युषा सत्र में आचार्य जी ने कहा कि अहंकार भी नहीं, बल्कि ‘दुख’ मौलिक होता है। आप इससे क्या समझे? संक्षिप्त में लिखिए। अहंकार नहीं, दुख मौलिक होता है। दुख और बेचैनी हमारे भीतर हमेशा बनी रहती है। हम कोई कामना करते हैं, उसे पूरा करने की कोशिश करते हैं। वह पूरी हो जाती है। क्षणिक सुख मिलता है और फिर वही बेचैनी लौट आती है। इससे यही समझ आता है की दुख का ही थोड़ा सा कम हो जाना सुख कहलाता है। हम जो भी करते हैं, वह अपने दुख को कम करने के लिए ही करते हैं।


















