
1️⃣ framework चेतना को कैसे परिभाषित करता है चेतना कोई अखंड स्वतंत्र चीज नहीं (कोई जान रहा है और कुछ जाना जा रहा है) जानने वाला न हो तो जाना जाने वाला भी नहीं टिकताऔर जाना जाने वाला न हो तो जानने वाला भी व्यर्थ है दोनों साथ साथ उठते है , एक दूसरे के बिना किसी का अस्तित्व नहीं अहंकार जैसे संसार को देखना चाहता है वैसे ही संसार उसे दिखता है माने द्वैत के दोनों छोर असल में अहंकार के ही दो रूप है इसलिए जब अहंकार पतला पड़ता है तो जानने वाली चीज भी बदल जाती है 2️⃣ neuroscience पूछ सकता है गुस्से के समय ब्रेन में क्या हो रहा है कौनसे neural circuit सक्रिय है ? neurotransmitters क्या भूमिका निभा रहे हैं ? attention और decision making कैसे बदलते है? framework पूछता है क्या मै गुस्सा हु गुस्सा किसे आयब, क्या मै देख सकता हु 3️⃣ स्वतंत्र इच्छा free will केवल एक ही क्षण में उपलब्ध है, जब अहंकार स्वयं अपने विगलन का चुनाव करे मेरा आचार्य जी से जुड़े रहना 4️⃣ कल के बोध प्रत्युषा सत्र में आचार्य जी ने कहा कि अहंकार भी नहीं, बल्कि ‘दुख’ मौलिक होता है। आप इससे क्या समझे? संक्षिप्त में लिखिए। जो मुझे समझ आया हमे अहंकार से कोई अड़चन नहीं , अड़चन है तो दुख से , और दुख हमारा स्वभाव नहीं अहंकार से हमे कोई दिक्कत नहीं थी अगर उसके रहते हम दुख हटा सकते पर अहंकार माने ही दुख है अहंकार है तो दुख है दुखी रहना नहीं तो अहंकार हटाओ


















