
1) AP फ्रेमवर्क के अनुसार चेतना कोई बाहर मौजूद वस्तु नहीं है, जिसे हम अलग खड़े होकर देख सकें। चेतना में हमेशा द्रष्टा और दृश्य, यानी विषय और विषयी का द्वैत होता है। 2) तंत्रिका विज्ञान चेतना को मुख्यतः मस्तिष्क की जैविक गतिविधियों और न्यूरॉन्स के काम से जुड़ी अवस्था मानता है। वह चेतना को मस्तिष्क में होने वाली प्रक्रियाओं के माध्यम से वस्तुनिष्ठ रूप से समझने और मापने की कोशिश करता है। वहीं AP फ्रेमवर्क कहता है कि चेतना को केवल बाहर से एक वस्तु की तरह नहीं समझा जा सकता, क्योंकि अध्ययन करने वाला स्वयं उसी चेतना का हिस्सा है। इसलिए केवल मस्तिष्क का अध्ययन करने से उस ‘मैं’ और उसके दुख को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। 3) आचार्य जी के अनुसार सामान्यतः जिसे हम स्वतंत्र इच्छा कहते हैं, वह वास्तव में हमारी इच्छाओं, डर, आदतों और सुरक्षा की जरूरतों से निकलती है। इसलिए अहंकार के रहते हमारे अधिकांश निर्णय वास्तव में स्वतंत्र नहीं होते। जैसे मैं पढ़ाई करने के बजाय मोबाइल चलाती हूँ और सोचती हूँ कि यह मेरी अपनी इच्छा है। लेकिन अगर मैं मोबाइल की आदत, मनोरंजन की इच्छा या पढ़ाई से बचने की प्रवृत्ति से मजबूर हूँ, तो यह पूरी तरह स्वतंत्र निर्णय नहीं है। वास्तविक स्वतंत्रता तब है जब मैं अपने अहंकार की मजबूरियों को देखकर उनसे मुक्त होने का चुनाव करूँ। यानी अपने विगलन को चुनना ही वास्तविक स्वतंत्र इच्छा है। 4) ‘अहंकार नहीं, दुख मौलिक है’ — इसका अर्थ मैं इससे यह समझती हूँ कि अहंकार को केवल एक अलग पहचान के रूप में देखने से बात पूरी नहीं होती। दुख ही वह मूल अनुभव है जिसके कारण ‘मैं’ अपने आपको बचाने, सुरक्षित रखने और अपनी पहचान बनाने में लगा रहता है। हम दुख से बचने के लिए इच्छाएँ, रिश्ते, उपलब्धियाँ और अपनी अलग-अलग पहचानें बनाते हैं। इसलिए दुख को ईमानदारी से देखना जरूरी है। जब दुख की जड़ दिखाई देती है, तभी अहंकार की पकड़ भी कमजोर होने लगती है।


















