✍🏻 पोस्ट 14 | 30 सितम्बर '26
💭 विषय — मानव उत्कृष्टता──────────
📚 तोरू दत्त: दो संस्कृतियों के बीच अपनी साहित्यिक दुनिया रचने वाली युवती
हम अक्सर अपनी क्षमता की सीमा उम्र, भाषा और परिस्थितियों से तय कर लेते हैं। लेकिन 19वीं शताब्दी की एक भारतीय युवती का जीवन इन सीमाओं को नए ढंग से देखने का अवसर देता है।
📖 तोरू दत्त का जन्म 1856 में कलकत्ता के एक शिक्षित बंगाली परिवार में हुआ। घर पर शिक्षा पाने के दौरान उन्होंने बंगाली, अंग्रेज़ी और…
I think most of the limits that I experience today have been imposed by me or are taught to be imposed by my parents. And they were conditioned by their parents.
There are circumstancial limitations for sure but I have chosen to live my life around those limitations. I chose to think more and more about how limited I am by my fate. I chose to be limited and to be defined by those limitations.
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Swagat Kedar
मेरी सबसे बडी धारणा यह बनी हुयी है कि मैं डरा हुआ कमजोर हू और हमेशा वैसा ही बना रहुंगा | इसमे बदलाव संभव नही | मैंने इसे परिस्थिती का उत्पात मान लिया | किंतु अब इस सीमा को मैं तोड रहा हू | आचार्य जी को सुनकर स्वयं कि सीमाओ का सही अनुमान लगा रहा हू | मेरी सीमा केवल प्रकृती के नियम तक है | एक स्थिती के बाद उस सीमा से भी मुक्त हो जाना है |
Neha
कोई एक- दो सीमा ही होंगी शायद जो परिस्थितिजन्य है। बाक़ी तो सब ख़ुद पर धारण कर रखी है, लाद रखी है। उनका कोई तथ्य नहीं सिर्फ़ मान्यता है।
Sumitra Mahato
❓ आपके जीवन में कौन-सी सीमाएँ सचमुच परिस्थितियों ने तय की हैं, और कौन-सी सीमाएँ आपने अपने बारे में बनी किसी धारणा के कारण स्वीकार कर ली हैं?
मैं खुद से कहती हूँ। इंग्लिश इतना टॉप हैं, मेरे से नहीं होगा।
कैसे हो सकता हैं, मैं तो हिंदी मिडियम से पढ़ी हूँ।
नहीं कर सकती !
मैं नहीं समझ सकती !
मुझसे नहीं होगा !
अब मैं कैसे सीख सकती !
यूट्यूब से नहीं सीख सकती, उसके लिए शिक्षक होना चाहिए और शिक्षक चाहिए तो पैसे चाहिए।
और अभी मेरे पास नहीं हैं, जब जॉब मिल जाएगी तो कोचिंग लूंगी।
उससे पहले सीखना असंभव हैं।
काफी सारी चीज़ों से बचाये रखने के लिए बहाना बनाते फिरती हूँ।
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Bhawna Bhartola
मेरे जीवन में तो सीमाएं सचमुच में परिस्थितियों ने ही तय की हैं
जैसे हम पांच बहनें हैं मुझे और मेरी दीदी को 12वीं तक ही पढ़ाया और हमारी शादी 18 साल में कर दी मेरी खेलकूद में काफी रुचि थी खेलने के लिए बाहर दूर के विद्यालय में जाना होता था तो, घर वाले लड़की जात है बोल के खेलने के लिए नहीं जाने देते। आगे पढ़ाई की इच्छा थी तो पढ़ाने की बजाय शादी कर दी न आर्थिक स्थिति सही न शिक्षा थी तो बंधी रह गई अपनी ही सीमाओं में न कुछ सीखने को मिला न कुछ जानने को।
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Priya
hamne obeserv Kiya hai aisa Kuch Nahi hai Jo hame ROK sake Kuch bhi Karne se ,hamari Apni dharnaye hi hai jinhone hame ROKe rakha hai Jaise ager Mai Apni jagah se hat gyi to MERI jagah kon lega ,SAB Kuch mujhe hi sambhalna hai Mai ager Apni position se hat gyi to SAB Kuch bikhar Jayega kyunki mere purane anubhav kahte hai, Maine Apni jagah se hat Kar bhi Dekh liya ikk Baar lakin jahan gyi the vahan bhi sukoon Nahi Mila mujhe isiliye vapas Ghar AA gyi the, ab Mai ye sochti Hu ki kaise Apni jagah rahkar hi Mai Kuch achha Kam Karu ? ye parshan aksar mere samne aa Jata hai mere aise rahne Mai kitni sachchai hai or Kahan tak hai?....🤔
Sanghmitra keer
मेरे जीवन में परिस्थितियों द्वारा तय की गई सीमाएँ बहुत कम हैं, क्योंकि मेरी परिस्थितियाँ कुल मिलाकर अच्छी हैं। हाँ, घर की कुछ आर्थिक ज़िम्मेदारियों के कारण मुझे वर्तमान में ऐसी डिग्री करनी पड़ रही है और अपने समय व विकल्पों को उसी के अनुसार देखना पड़ रहा है। यही मेरे लिए एक वास्तविक परिस्थिति-जनित सीमा है।
मुझे लगता है कि मैंने अपने बारे में “मैं आलसी हूँ”, “अब रात हो गई है और मैं थक गई हूँ, अब मुझसे नहीं होगा” जैसी धारणाएँ बना ली हैं। कई बार मैं अपनी क्षमता को पहले ही सीमित कर देती हूँ। मेरे पिता की यह धारणा कि मैं उस परीक्षा को नहीं निकाल पाऊँगी, भी मुझे प्रभावित करती है और कहीं न कहीं मैंने उसे अपने ऊपर एक सीमा की तरह स्वीकार कर लिया है।
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RITU
मैं तो बहुत सारी चीजों को इसलिए नकारती हूं क्योंकि मुझे लगता है कि वो मेरी उम्र के लिए नहीं है, या वो मेरी भाषा नहीं है।
Prashant Kumar
मुझे अपने घर की परिस्थिति मुझे घर तक रहने को सीमित करती है, जिसको मुझे तोड़कर निकलना है। मुझे बहुत असहनीय लगने लगा है।
prashant Kumar
मुझे कुछ समय पहले स्वास्थ्य संबंधित समस्या हुई।जीवन भर दवाइयों पर निर्भर रहना पड़ता। गलती हालाकि कही न कहीं मुझसे ही हुई है , ज्ञान या अज्ञान में ,शायद अज्ञानता में ही।पर अब पर परिस्थिति पर निर्भर रहना पड़ता है।मेरी धारणा है कि मैं शर्मिला हूँ,ये किसी न किसी बाहरी कारण से है,पर अबतक अज्ञात है।
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Pushpa Lahu Dudhabhate
मेरे जीवन में मेरी बिमारी ( autoimmune disease) ने सीमाएँ तय कर दी है ,बस और बच्चो की जिम्मेदारी की सीमा मैंने खुद तय करी है|
GEETA PATEL
सीमाएं जो मैंने मेरे बारे में बनी धारणा के कारण स्वीकार की है -
मेरी शिक्षा हिन्दी माध्यम से हुई है, रीडिंग और ग्रामर में अंग्रेजी भाषा ठीक है, लेकिन ज्यादा बोलने की प्रैक्टिस न होने के कारण जब सत्र (अंग्रेजी) में होते हैं तो, धारणा यह रहती है कि समझने में टाइम लगेगा और समझना साथ ही 3D इमैजिनेशन नहीं हो पायेगा जैसे सत्र (हिन्दी) में कोई घटना, बचपन की यादें एकाएक चमक उठती हैं।
ये मेरी धारणा ही है क्योंकि कल का इंग्लिश सत्र समझ में आ रहा था ।
बाहरी पारिस्थितियां जिन्होंने मेरी सीमा तय की है -
मैं फेस टू फेस सत्र अटेंड करना चाहती हूं , अनुदान राशि बीच में आ जाती है लेकिन मेरी खुद ही गहरी नीयत नहीं बन पा रही है आचार्य जी के सामने आने की । वो जो कर रहे हैं मेरे लिए मुझे मेरे बंधनों से आजाद करने के लिए, अपने उच्चतम संभावनाओं को प्राप्त कर सकु इसके लिए और मैं संस्था का काम आसान करने के बजाय बढ़ाये ही रहती हूं अपना रिपोर्ट कार्ड न सुधार करके।
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Sanket Sudhakar Mahajan
❓ आपके जीवन में कौन-सी सीमाएँ सचमुच परिस्थितियों ने तय की हैं, और कौन-सी सीमाएँ आपने अपने बारे में बनी किसी धारणा के कारण स्वीकार कर ली हैं?
👉🏽 मेरे जीवन मे कोई सीमा परिस्थिती ने तय नही की हैं, मैने अपनी धारणा के चलते हुए अपनी सीमाये बना रखी हैं जैसे 'मै कुछ चीजो से उपर नही उठ सकता, मेरे कुछ ढररे हैं वही मेरी सीमा हैं'|
जीतना सिखा हैं वही मेरे लिये काफी हैं और सिखने की कोई जरुरत नही हैं -धारणा
Shubham
मैं कुछ भी पढ़ने के लिए सोचता हूं कि ये काम करूंगा लेकिन जब भी वो काम के प्रति जाता हु तो मन ही कही और भटक जाता है और वो काम मैं नहीं कर पाता फिर बाद में सोचता हूं कि मैने क्यों नहीं किया अगर मैं बुक 📚 पढ़ने के लिए बैठता हूं। तब नींद आने लगती है ये क्यों होता है पता नहीं फिर भी मैं पढ़ता हूं। बाकी बहुत से काम छुट जाते है। नियत तो है पर होता नहीं है।
JITESH KUMAR TELI
में अभी जहां हूं वो तो परिस्थितियों ने ही तय किया है लेकिन कुछ नया काम शुरु करने से पहले हजार संशय रहते है क्योंकि पुरानी असफलताओं की धारणा मन में घूमती रहती है।
Dikeshwar
करने वाले के लिए उम्र महत्वपूर्ण नहीं होती है।
kumari rani
परिस्थिति को भी हम मौके कि तरह लेते हैं,ताकि हमें बने बनाए रास्तों पर चलने की सहूलियत बनी रहें। और ये भी कह सकें कि हमारे साथ तो परिस्थिति ही ऐसी थी, मैं क्या करतीं।
यही धारणा कि जो जैसा है वैसा ही रहे,जो मिल रहा है उसी में संतुष्ट रहो। सीमाओं का उलंघन करने पर उसकी कीमत चुकाने का सामर्थ्य का अभाव। पिंजरा को ही स्वतंत्रता मानना।
Ritik
अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी
मैंने ये सुना भी नहीं था एक भारतीय वो भी महिलाओर वो फ्रेंच का अंग्रेजी में अनुवाद कर रही है। गजब।
मतलब जो बताया जाता है कि ऐसा होना चाहिए महिलाओं को वो बिल्कुल भी गलत है।
Padmalochan Hembram
मैंने अपने अंदर एक सीमा बना ली है कि मैं दुखी हूं और मैं अज्ञानी हूं। मैं बेहतरी नहीं कर सकता लेकिन आचार्य जी की शिक्षा मुझे उनसे सवाल करने और स्पष्टता के साथ कार्य करने में मदद करती है।
Kavita Sarowar
हम अपनी-अपनी सीमाओं में बंधे हुए हैं।
लेकिन जैसे-जैसे समझ बढ़ती है और हम खुद को थोड़ा पीछे रखकर, पूरी तरह सुनने लगते हैं, तब वह बात भीतर असर करने लगती है।
फिर एक-एक करके बहुत-सी चीज़ें छूटने लगती हैं।
मेरे साथ भी HIDP में ऐसा ही हुआ। मुझे न्यूज़पेपर अवलोकन की activity मिली। ऐसा नहीं है कि मैंने इससे पहले कभी न्यूज़पेपर पढ़ा ही नहीं था, लेकिन इस activity के माध्यम से मुझे समझ आया कि मुझे यह काम करना है, इसे देखना है और इससे सीखना है।
इसी तरह मैंने अपने जीवन में भी देखना शुरू किया। मैंने जो मंगलसूत्र पहना हुआ था, उसे उतार दिया। क्योंकि अब मुझे समझ में आ रहा था कि जीवन में जो-जो चीज़ें मुझे भीतर से बाँधकर रखती हैं, उन्हें एक-एक करके देखना और समझना है।
यह मैंने किसी के कहने पर या दिखावे के लिए नहीं किया।
समझ से किया।
शायद यही बात जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है—
पहले देखना, फिर समझना और फिर जो अनावश्यक है, उसे छोड़ देना।
Arnab Mondal
this reminds me "Jindage choti nehi bari honi chahiye". today I feel like, repeating this line to myself all day long.
Divya Bharti
मैंने खुद को एक सीमित दायरे में बांध के रखा है और उस सीमा के बाहर जाने की कोशिश करती हूं तो डर सामने आ जाता है और फिर मेरे पैर वंहा से हिल ही नहीं पाते...... 😔
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Lalita Jena
thank you to bring such excellence to the spotlight! what a beautiful way to live life.
but when I look at myself, such a late runner! 😔
Avishka Raj
मैं अभी 19 वर्ष की हुं , कुछ साल पहले 17 साल की उम्र में मेरा operation हुआ फिर स्थिति तब भी नहीं सुधरी । अभी भी दवाइयों के सहारे हूं। मैने आचार्य जी को सुनना शुरू इसीलिए किया था क्योंकि बहुत दुख था पर उन्होंने सिखाया तुम देह के अलावा भी कुछ हो ।
अभी उनकी शिक्षा से बहुत बदलाव आया है पर अंदर से कुछ है जो मुझे बदलने नहीं दे रहा। बार बार पीछे खींच रहा है। मुझे भी लाश होने से पहले आकाश होना है पर कैसे करु स्थितियां मुझे बार बार गिरा दे रही है ।😭
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Arjun
में अक्सर कम काज ओर बढ़ती उम्र के सीमाएं बांध के बैठ जाता हु ओर समय आदि की
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Tulsi Kumar Ravi
मैं अंग्रेजी सीखना चाहता हूं और घूमने भी चाहते हैं पर मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि मैं किसी अंग्रेजी बोलने वाली इलाके में रहकर वहां सीख सकु। यह हुआ परिस्थिति
पर मैं अंग्रेजी और भी माध्यम से अपने आसपास के माहौल से सीख सकता हूं पर जैसे अंग्रेजी का नाम सुनते ही दिमाग में आता है कि मैं यह नहीं कर सकता या फिर मैं तो यह जानता ही नहीं। यह मैंने अपने बारे में धारणा बना लिया है।
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Revati Mahila Kisan
मैने अंग्रेजी भाषा के बारे में धारणा बनाई है, इसलिए अंग्रेजी का क्लास लेना मुश्किल हो जाता है।
लेकिन अब डेली प्रैक्टिस के माध्यम से सीखने की कोशिश करूंगी
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Dinesh Chandra
मैं भी सत्रह साल सेना में रहा, मुझे भी ऐसे कईं अवसर आए थे कि मैं तमिल, तेलुगु, मलयालम, भोजपुरी, नेपाली, बंगाली और भी कईं भाषाएँ सीख सकता था, लेकिन अहंकार वश मैंने अपने आप को बहुत सारी सीमाओं में बांध लिया था। जिसके कारण बजाय सीखने के मैं उनका और मज़ाक उड़ाया करता था और आश्चर्य करता था। कभी उनके खाने की अलग शैली का, कभी अधिक चावल पर निर्भरता और हमारी तरह घी दूध नहीं खाने वाले, ऐसे करके उनसे अलग थलग रहता था। उनमें से कई लोग बहुत पढ़े लिखे भी थे, लेकिन फिर भी कुछ लोगों की संगति में आकर मैं भी अंधा हो चुका था।
अब मुझे पछतावा होता है कि मैं उनसे कितना कुछ सीख सकता था। कईं तरह की भाषाएँ, कईं तरह के व्यंजन, कईं तरह का बहुत कुछ। लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा ; सब अहंकार की भेंट चढ़ गया।
मैंने और भी कईं धारणाएं बाँध रखी थी, कि - मुझे तो खुले में काम करना है, मैं दफ्तर में बैठकर काम नहीं कर सकता। इसलिए मैं आजतक कम्यूटर तक नहीं सीख पाया।
मुझे आज भी किसी काम के लिए थोड़ा सा भी डिफिकल्ट डाक्यूमेंटेशन करना पड़ता है तो मैं पसीना पसीना हो जाता हूँ।
इसके अलावा मैंने ठान रखा था कि लम्बे समय के लिए किसी के पकड़ में नहीं आना, मतलब कुछ घंटों के बाद मुझे पर्सनल टाइम मिलना चाहिए। जिसके कारण सेना में मुझे "आर्मोरर ट्रेड" मिलने वाला था, लेकिन मैंने "ड्राइवर ट्रेड" ठीक समझा, ताकि मैं खुला घूम सकूँ। ऐसा हुआ भी ; लेकिन मैं कईं पढ़े लिखे लोगों की संगती से वंचित रह गया।
यहाँ तक कि वे पढ़े लिखे लोग कई बार मेरी ओछी बातें भी सुनकर रह जाते थे, क्योंकि उनका अक्सर मुझसे काम पड़ता था। लेकिन मैं इसी में खुद को होंशियार समझता था। जबकि उसी सर्विस में रहते रहते मैंने देखा कि वे लोग सिर्फ अपना काम निकाल रहे हैं, इसलिए चुप हैं, वरना वे मुझसे ऊपर के हैं।
हालांकि मौका आने पर वे भी मुझे डोमिनेट करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते थे, लेकिन वो एक अलग विषय है।
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Archana
मुझे English में समस्या होती है। ऐसा नहीं है कि मुझे English बिल्कुल नहीं आती। मैं कुछ-कुछ समझती हूँ, शब्दों का अर्थ भी जानती हूँ, लेकिन जब कोई व्यक्ति लगातार पूरी English में बोलता है या लंबे sentences बोलता है, तो मुझे समझने में कठिनाई होती है।
धीरे-धीरे मैंने इस कठिनाई से एक धारणा बना ली है—“मुझे English नहीं आती।” अब जब भी कोई English sentence मेरे सामने आता है और मुझे तुरंत समझ नहीं आता, तो मैं उसे समझने की कोशिश करने के बजाय पहले ही मान लेती हूँ कि मैं इसे नहीं समझ पाऊँगी।
यही धारणा मेरे लिए वास्तविक समस्या बन गई है। मैं session में बैठती हूँ, कुछ समझ नहीं आता, मन कहता है कि “मुझसे नहीं होगा”, और फिर मैं session बंद कर देती हूँ। इस तरह English सीखने की जगह मेरी धारणा और मजबूत होती जाती है।
अब मुझे यह देखना है कि वास्तव में मुझे English नहीं आती, या मुझे English पूरी तरह और तुरंत समझने की आदत नहीं है। दोनों बातें एक जैसी नहीं हैं।
अगर मुझे कोई sentence समझ नहीं आता, तो इसका अर्थ यह नहीं कि मैं English नहीं जानती। इसका अर्थ केवल इतना है कि उस sentence को समझने के लिए मुझे थोड़ा समय, अभ्यास या उसे छोटे हिस्सों में बाँटने की जरूरत है।
इसलिए अब मैं “मुझे English नहीं आती” इस धारणा को सत्य मानकर session छोड़ने के बजाय, जहाँ समझ नहीं आएगा वहाँ रुकूँगी, sentence को दोबारा पढ़ूँगी/सुनूँगी, उसका अर्थ समझने की कोशिश करूँगी और धीरे-धीरे अपनी समझ बढ़ाऊँगी।
मेरी समस्या शायद English से कम और English को लेकर बनी हुई मेरी धारणा से अधिक है। मुझे अपनी इस धारणा को देखना है, उससे भागना नहीं है।
Ranu Lot
मैंने सरकारी स्कूल से पढ़ाई की है तो वहां हिंदी माध्यम से ही पढ़ाया जाता था। इसलिए मेरी इंग्लिश थोड़ी वीक है।
आज इंगलिश सेशन है और मुझे इंग्लिश कम आती हैं तो इसलिए में सेशन अटेंड नहीं कर पाई।
मैं इंग्लिश सीख सकती हूं पर समय नहीं मिलता।
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✍🏻 पोस्ट 14 | 30 सितम्बर '26 💭 विषय — मानव उत्कृष्टता ────────── 📚 तोरू दत्त: दो…