
Swagat Kedar
मेरी सबसे बडी धारणा यह बनी हुयी है कि मैं डरा हुआ कमजोर हू और हमेशा वैसा ही बना रहुंगा | इसमे बदलाव संभव नही | मैंने इसे परिस्थिती का उत्पात मान लिया | किंतु अब इस सीमा को मैं तोड रहा हू | आचार्य जी को सुनकर स्वयं कि सीमाओ का सही अनुमान लगा रहा हू | मेरी सीमा केवल प्रकृती के नियम तक है | एक स्थिती के बाद उस सीमा से भी मुक्त हो जाना है |















