
मैंने खुद को एक सीमित दायरे में बांध के रखा है और उस सीमा के बाहर जाने की कोशिश करती हूं तो डर सामने आ जाता है और फिर मेरे पैर वंहा से हिल ही नहीं पाते...... 😔
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मैंने खुद को एक सीमित दायरे में बांध के रखा है और उस सीमा के बाहर जाने की कोशिश करती हूं तो डर सामने आ जाता है और फिर मेरे पैर वंहा से हिल ही नहीं पाते...... 😔

दिव्या जी, आपने लिखा पैर वहाँ से हिल ही नहीं पाते, यानी डर आते ही आप रुक जाती हैं, कोशिश करती भी हैं तो एक हद तक। गौर करने वाली बात ये है कि डर सामने आने के बाद जो रुकना होता है, वो शरीर की मजबूरी नहीं, फैसला है, बस इतनी तेज़ी से होता है कि फैसला जैसा लगता ही नहीं। पैर खुद नहीं रुकते, आप रोक लेती हैं, और फिर उसे डर का नाम दे देती हैं ताकि ज़िम्मेदारी उठानी न पड़े। सीमा बाहर से नहीं आई, ये आपने खुद लिखा है, दायरा खुद का बनाया हुआ है। तो सवाल ये नहीं कि डर से कैसे लड़ें, सवाल ये है कि उस दायरे को बचाने में क्या फायदा मिल रहा है कि पैर उसकी हिफ़ाज़त में लग जाते हैं। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401