
मैं भी सत्रह साल सेना में रहा, मुझे भी ऐसे कईं अवसर आए थे कि मैं तमिल, तेलुगु, मलयालम, भोजपुरी, नेपाली, बंगाली और भी कईं भाषाएँ सीख सकता था, लेकिन अहंकार वश मैंने अपने आप को बहुत सारी सीमाओं में बांध लिया था। जिसके कारण बजाय सीखने के मैं उनका और मज़ाक उड़ाया करता था और आश्चर्य करता था। कभी उनके खाने की अलग शैली का, कभी अधिक चावल पर निर्भरता और हमारी तरह घी दूध नहीं खाने वाले, ऐसे करके उनसे अलग थलग रहता था। उनमें से कई लोग बहुत पढ़े लिखे भी थे, ले…
















