जोशीमठ नहीं धँस रहा, हम धँस रहे हैं || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2023)

प्रश्नकर्ता: सर, साल की शुरुआत से ही जोशीमठ से कुछ ख़बरें आ रही हैं, ज़मीन धँसने की और इसरो ने सेटेलाइट डेटा से ये बात भी बतायी है कि पिछले साल के अप्रैल से लेकर नवंबर के बीच में ज़मीन वहाँ धँस रही थी पर तब वो सात सेंटीमीटर धँस रही थी पर इस साल दो-हज़ार-तेईस के शुरुआती बारह दिनों में ही पाँच-दशमलव-चार सेंटीमीटर धँस चुकी है और वो आशंका लगा रहे हैं कि जिस तरह ये बात गम्भीर हो रही है तो शायद पूरा शहर ही धँस सकता है। कई परिवार है जिनको उनके घरों से शहर के होटलों में स्थानान्तरित करना पड़ा है। सरकारी कार्यालय हैं और बहुत जगह हैं जहाँ स्थायी नुक़सान हो चुके हैं। तो इस पर सवाल ये उठता है कि हमारे तीर्थस्थलों की दुर्दशा के पीछे क्या कारण हैं?
आचार्य प्रशांत: काफ़ी कुछ तो सिर्फ़ प्राकृतिक ही है। जोशीमठ जितना मैंने पढ़ा है जिस जगह पर बसा हुआ है, वो जग ही जूलॉजिकल (भौगोलिक) दृष्टि से बहुत पक्की, स्थायी टिकाऊ है नहीं और वहाँ पर ज़मीन धँसने वगैरह की प्रक्रिया कोई नयी-ताज़ी नहीं है, पचासों साल से वहाँ ये चल रहा है तो काफ़ी वजह तो प्राकृतिक ही है। लेकिन जैसा कि आपने अभी कहा कि जितना बुरा था पिछले बीस-तीस साल में, उससे ज़्यादा दो-हज़ार-तेईस में हो गया है।
आपने कुछ सेंटीमीटर गिनाए थे—बारह दिनों में पाँच सेंटीमीटर काफ़ी होता है और ये आँकड़ा भी मुझे लग रहा है कि थोड़ा-सा पुराना है अभी और बढ़ गया होगा। इतना जो भूमि धँसाव है बहुत होता है। अब हम क्या पढ़ रहे हैं? हमें क्या सुनाई दे रहा है? जितनी भी रिपोर्ट आ रही हैं जो थोड़े से विश्वसनीय अख़बार हैं उनमें पढ़ें तो? प्राकृतिक कारण तो अपनी जगह है ही। कहते हैं, ‘पहले बहुत पुरानी लैंडस्लाइड (भूस्खलन) है और उसी लैंडस्लाइड का जो मलवा है जब वो बिलकुल जम गया था तो उस पर बसाया है जोशीमठ।’ वो तो प्राकृतिक कारण हो गया।
उसके अलावा ये चल रहा है कि जो चार धाम अभियान है, उसके लिए कई लेन की विस्तृत सड़क बनानी है। उसके लिए ज़बरदस्त तरीक़े से डायनामाइटिंग (विस्फ़ोट) चल रही है और अभी दो-तीन साल से उधर के लोग उन सब गतिविधियों की वीडियो बना-बनाकर डालते रहते हैं कि कैसे



