हाल ही में आचार्य जी की अमेरिका के जाने-माने बुद्धिजीवी, लेखक और प्रसिद्ध पीबीएस (PBS) टेलीविज़न सीरीज़ 'क्लोज़र टू ट्रुथ' (Closer to Truth) के निर्माता व होस्ट डॉ. रॉबर्ट लॉरेंस कुह्न के साथ एक गहन चर्चा हुई।
इस संवाद में विस्तार से पड़ताल की गई कि वास्तव में मौलिक क्या है; अहंकार या चेतना?
इस दार्शनिक और वैज्ञानिक विमर्श को गहराई से समझने के लिए पूरा वीडियो ज़रूर देखें: https://youtu.be/fyif6U6kQxA?si=Z3WWL78_wxfqdlUi
संसार में जब भी चेत…
🪔बोध कार्य🪔
1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है?
💡AP फ्रेमवर्क के अनुसार चेतना कोई बाहर रखी हुई वस्तु नहीं है, जिसे अहंकार एक वैज्ञानिक वस्तु की तरह देखकर माप सके। सामान्यतः हम चेतना को विचार, भावना, स्मृति, इच्छा और अनुभवों का नाम मान लेते हैं, लेकिन ये चेतना की सामग्री हैं।
चेतना में हमेशा एक द्रष्टा और दृश्य, यानी विषय और विषयी का द्वैत होता है। इसीलिए चेतना को समझने के लिए केवल बाहर की दुनिया को देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस ‘मैं’ को देखना जरूरी है जो देख रहा है। जब ईमानदारी से अपने डर, इच्छाओं, पहचानों और धारणाओं को देखा जाता है, तो अहंकार की पकड़ ढीली पड़ने लगती है।
🔥इसलिए AP फ्रेमवर्क में चेतना को समझना वास्तव में अपने ही अहंकार और उसकी बनाई हुई दुनिया को समझना है।
2. Neuroscience चेतना को कैसे परिभाषित करता है और AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है?
🏜️तंत्रिका विज्ञान सामान्यतः चेतना को मस्तिष्क की जैविक गतिविधियों से उत्पन्न अनुभव और जागरूकता के रूप में समझता है। वह यह जानने का प्रयास करता है कि मस्तिष्क के कौन-से हिस्से, न्यूरॉन्स और तंत्रिका-प्रक्रियाएँ हमारे अनुभव, विचार, भावनाएँ और जागरूकता से जुड़ी हैं। यानी विज्ञान चेतना को मुख्यतः तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से अध्ययन करने योग्य घटना मानता है।
इसके विपरीत AP फ्रेमवर्क पूछता है कि जिस व्यक्ति के मस्तिष्क और चेतना का अध्ययन किया जा रहा है, वह स्वयं कौन है? विज्ञान चेतना को एक Object की तरह देखता है, जबकि AP उस Subject यानी ‘मैं’ की जाँच पर जोर देता है जो अनुभव कर रहा है और प्रश्न पूछ रहा है।
🎯इसलिए AP फ्रेमवर्क के अनुसार केवल मस्तिष्क की गतिविधियों को समझ लेने से उस अहंकार और उसके दुख की जड़ नहीं समझी जाती।
3. आचार्य जी के अनुसार Free Will क्या है? क्या हमारे निर्णय वास्तव में स्वतंत्र होते हैं?
⛓️💥आचार्य जी के अनुसार सामान्यतः जिसे हम स्वतंत्र इच्छा कहते हैं, वह वास्तव में बहुत बार हमारी इच्छाओं, डर, आदतों, सामाजिक conditioning, स्मृतियों और आत्म-सुरक्षा की मजबूरियों से निकलती है।
मुझे लगता है कि मैं स्वतंत्र होकर कोई निर्णय ले रही हूँ, लेकिन यदि मैं अपने निर्णय को ईमानदारी से देखूँ तो पता चलता है कि उसके पीछे कोई डर, लालच, तुलना, प्रतिष्ठा या पुरानी आदत काम कर रही होती है।
उदाहरण के लिए, यदि मैं पढ़ाई इसलिए कर रही हूँ कि मुझे वास्तव में ज्ञान चाहिए, तो एक बात है; लेकिन यदि मैं केवल इसलिए पढ़ रही हूँ कि दूसरे मुझसे आगे न निकल जाएँ या लोग मुझे असफल न समझें, तो मेरा निर्णय उतना स्वतंत्र नहीं है।
🍁इसी तरह किसी व्यक्ति की बात बुरी लगने पर तुरंत गुस्सा करना मुझे अपनी इच्छा लगता है, लेकिन वास्तव में वह मेरी पुरानी conditioning की प्रतिक्रिया हो सकती है।
🪞इसलिए अहंकार के रहते हमारी स्वतंत्रता बहुत सीमित है। आचार्य जी के अनुसार वास्तविक स्वतंत्रता उस क्षण में दिखाई देती है जब व्यक्ति अपनी ही मजबूरियों को देख पाता है और अहंकार के विगलन की दिशा चुनता है।
4. ‘अहंकार भी नहीं, बल्कि दुख मौलिक होता है’ — मैं इससे क्या समझी?
🙋♀️मैं इससे यह समझी कि अहंकार को केवल एक अलग वस्तु या स्थायी सत्ता मानना भी सही नहीं है। जो सबसे पहले दिखाई देता है, वह है दुख—असंतोष, डर, कमी, बेचैनी और असुरक्षा।
इसी दुख से बचने के लिए ‘मैं’ अपनी पहचान, इच्छाएँ, अपेक्षाएँ और सुरक्षा की कहानियाँ बनाता है। इस अर्थ में अहंकार को उसके दुख से अलग करके नहीं समझा जा सकता।
जब मैं देखती हूँ कि मेरी कोई इच्छा पूरी न होने पर मुझे दुख होता है और उसी दुख से बचने के लिए मैं किसी पहचान या वस्तु को पकड़ लेती हूँ, तब समझ आता है कि अहंकार और दुख का संबंध कितना गहरा है।
✊ इसलिए मुक्ति का अर्थ अहंकार को किसी नई पहचान से बदलना नहीं, बल्कि उस दुख को सीधे देखना है जिसके कारण अहंकार लगातार खुद को बनाए रखता है।
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Yashasvi
🌿 बोधकार्य — मौलिक क्या है: अहंकार या चेतना?
1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है?
AP फ्रेमवर्क के अनुसार चेतना कोई बाहर मौजूद वस्तु नहीं है, जिसे हम एक वस्तु की तरह प्रयोगशाला में देखकर या मापकर समझ सकें। चेतना में हमेशा द्रष्टा (Subject) और दृश्य (Object) का द्वैत होता है। सामान्यतः हमारा अहंकार ही प्रश्नकर्ता और अनुभवकर्ता के रूप में मौजूद रहता है।
हमारी चेतना विचारों, भावनाओं, स्मृतियों, इच्छाओं और डर से भरी रहती है। इसलिए हम संसार को जैसा वह वास्तव में है, वैसा नहीं देखते, बल्कि अपनी इच्छाओं और आत्म-सुरक्षा की धारणाओं के अनुसार देखते हैं।
अर्थात् चेतना को समझने का सही तरीका बाहर देखना नहीं, बल्कि उस ‘मैं’ अर्थात् अहंकार को देखना है जो अनुभव कर रहा है और दुख भोग रहा है।
2. Neuroscience चेतना को कैसे परिभाषित करता है और AP फ्रेमवर्क से यह कैसे अलग है?
तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) सामान्यतः चेतना को मस्तिष्क की गतिविधियों, तंत्रिका-तंत्र और उनसे उत्पन्न होने वाले अनुभवों के संदर्भ में समझता है। यानी चेतना का अध्ययन मस्तिष्क को एक जैविक प्रणाली के रूप में देखकर किया जाता है।
इसके विपरीत, AP फ्रेमवर्क प्रश्न को अनुभव करने वाले व्यक्ति की ओर मोड़ देता है। आचार्य जी के अनुसार यदि चेतना का अध्ययन करने वाला स्वयं ही अहंकार से प्रभावित है, तो केवल बाहरी अध्ययन से चेतना को पूरी तरह समझना संभव नहीं है।
Neuroscience → मस्तिष्क और उसकी प्रक्रियाओं को मुख्य विषय बनाता है।
AP फ्रेमवर्क → द्रष्टा/अहंकार की आंतरिक स्थिति को जाँचने पर जोर देता है।
Neuroscience चेतना को मुख्यतः अध्ययन की वस्तु बनाता है, जबकि AP पूछता है कि अध्ययन करने वाला स्वयं कौन है?
3. आचार्य जी के अनुसार Free Will क्या है? क्या हमारे निर्णय वास्तव में स्वतंत्र होते हैं
आचार्य जी के अनुसार अहंकार स्वयं अपनी मजबूरियों, इच्छाओं, डर और सुरक्षा की जरूरतों से बंधा हुआ है। इसलिए अहंकार द्वारा लिए गए अधिकांश निर्णय वास्तव में स्वतंत्र नहीं होते। हमें लगता है कि हम अपनी इच्छा से निर्णय ले रहे हैं, लेकिन अक्सर हमारे निर्णय हमारी पुरानी आदतों, इच्छाओं, डर और अहंकार की पहचान से निकलते हैं।
उदाहरण के लिए, यदि मैं किसी काम को केवल इसलिए चुनती हूँ क्योंकि लोग मेरी प्रशंसा करेंगे, तो देखने में यह मेरा स्वतंत्र निर्णय है, लेकिन वास्तव में मैं दूसरों की स्वीकृति की इच्छा से प्रभावित हूँ। इसी तरह डर के कारण कोई निर्णय लेना भी पूर्ण स्वतंत्रता नहीं है।
आचार्य जी के अनुसार वास्तविक स्वतंत्रता तब है, जब अहंकार अपनी ही मजबूरियों और बंधनों को देखकर उनके विगलन का चुनाव करता है।
4. आचार्य जी के अनुसार अहंकार नहीं, बल्कि ‘दुख’ मौलिक होता है। इससे आप क्या समझीं?
इसका अर्थ मैं यह समझती हूँ कि मनुष्य के जीवन में मूल समस्या केवल ‘मैं’ का होना नहीं, बल्कि उस ‘मैं’ से उत्पन्न होने वाला दुख है। अहंकार स्वयं को किसी पहचान, इच्छा, डर या कहानी से जोड़ता है और जब वास्तविकता उसकी इच्छा के अनुसार नहीं होती, तब दुख उत्पन्न होता है।
इसलिए वेदांत का उद्देश्य केवल अहंकार को पहचान लेना नहीं, बल्कि उस दुख की जड़ को देखना और उससे मुक्त होना है। जब मैं ईमानदारी से देखती हूँ कि मेरा दुख किन इच्छाओं, अपेक्षाओं और पहचानों से पैदा हो रहा है, तब अहंकार की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।
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Shelesh malviya
1. How does the AP Framework define Consciousness?
According to the AP Framework, consciousness is not an object that exists somewhere outside and can be observed by the ego. The ego itself is one pole of the subject-object relationship through which consciousness is experienced. Therefore, instead of trying to understand consciousness as an external phenomenon, the inquiry has to turn towards the ‘I’ that is experiencing.
In simple words, consciousness as we ordinarily experience it is inseparable from the ego and its contents—thoughts, memories, desires, fears and perceptions. The real inquiry is not “What is consciousness?” but “Who is the one experiencing all this?”
2. How does Neuroscience define Consciousness, and how does it differ from the AP Framework?
Neuroscience generally studies consciousness as a phenomenon associated with the brain and nervous system. It investigates how brain activity, neural networks and information processing give rise to conscious experiences.
The AP Framework approaches the question from the opposite direction. Instead of treating consciousness as an object to be studied, it examines the observer—the ego itself. Science can study correlations between brain activity and reported experiences, but AP asks whether the very questioner and his motives have been properly examined.
So, neuroscience primarily asks “How does the brain produce or correlate with consciousness?”, whereas AP asks “Who is the one asking this question, and what is happening to the ‘I’ that experiences?”
3. According to Acharya Ji, what is Free Will? Was my choice genuinely free?
According to Acharya Ji, ordinary choices are mostly not free because the chooser—the ego—is itself driven by fear, desire, conditioning, memories and the need for security. Real Free Will is possible only when the ego chooses its own dissolution.
One example from my own life is when I wanted to do something because I wanted appreciation and recognition from others. At that moment, I felt that I was freely choosing it. But when I looked more carefully, I could see that the choice was being driven by the desire to create a particular image of myself in other people's eyes.
So, although the decision felt like free will, it was actually being guided by an underlying desire for recognition. Seeing this makes me question how many of my supposedly independent choices are actually just conditioned movements of the ego.
4. What did I understand from “not even the ego, but suffering itself is fundamental”?
I understood this as a shift in where the inquiry begins. Usually, we say “I am suffering”, and therefore we assume that the ego is fundamental and suffering is something happening to it. But on closer observation, what is immediately undeniable is suffering itself.
The ego may be a conclusion we form about the sufferer, but the suffering is directly present. Therefore, instead of intellectually trying to define the ego, we can begin by honestly looking at the suffering, its cause, and the movement of the mind that sustains it.
In this way, suffering itself becomes a doorway to inquiry.
1
Deepak
Ego holds achievement as a medal, and suffering begins when it depends on it.
1. How does the AP Framework define Consciousness? Explain in your own words??¿According to the AP Framework, consciousness is understood in the context of duality: there is a seer and something seen, a subject and an object. For example, when I watch television, I am the watcher (seer) and the television is the object being watched (seen). Similarly, I can observe my own thoughts, emotions and memories; therefore, there is a “me” that knows them and the thoughts or emotions that are known. This “me” is the ego, the subject at one end of the duality. In simple terms, consciousness means awareness—the ego is aware of some object, whether it is something outside or something happening within the mind.
2. How does Neuroscience define Consciousness, and how does it fundamentally differ from the AP framework??¿
According to neuroscience, consciousness is approached as an objective phenomenon that can be studied and measured through the brain, neural activity, behaviour, and experiences.
The AP Framework fundamentally differs. It says consciousness cannot simply be treated as an object because the observer—the ego—is itself part of the subject-object structure. The ego is the seer, and everything it observes becomes the seen. Therefore, AP turns the inquiry toward the observer itself.
Example: If I watch a TV, the TV is the object and I am the observer. Neuroscience may study what happens in my brain while I watch the TV. AP asks: Who is this “I” that is watching?
So, neuroscience studies consciousness as something to be observed; AP asks us to examine the observer itself.
3. According to Acharya Ji, what is Free Will? Share an instance from your own life where you felt you were exercising free will. Upon closer observation, was it genuinely free?¿
According to Acharya Ji's AP Framework, free will is awareness, alertness and the ability to see one's own conditioning. A thought or desire arises, but free will lies in knowing where that thought is coming from—whether it is coming from fear, desire, habit, or conditioning.
For example, I pursued higher studies thinking it was my own choice. But on closer observation, I could see that the decision was largely coming from my conditioning and social expectations. The moment I could see this clearly, I was exercising free will—not because I had suddenly become free to choose anything, but because I was aware of the bondage influencing my choice.In simple terms: A thought arising is not free will; knowing where that thought is coming from is free will.
4. In yesterday's Bodh Pratyusha session, Acharya Ji stated that not even the ego, but 'suffering' itself is fundamental. What did you understand from this? Write in brief??¿
According to Acharya Ji, not even the ego but suffering itself is fundamental, because it is suffering that needs to be directly examined. The sufferer is the ego, but the ego itself is an assumption, not an independent fact. Therefore, suffering arises from the ego's assumptions, expectations, and attachment to imagined outcomes.
For example, if I expect a particular result and become dependent on that result happening, I suffer when reality does not match my expectation. Seeing the fact instead of clinging to the imagined outcome is awareness and freedom from suffering.
In simple terms: The ego lives in assumptions; awareness looks at facts.
Anjali
1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: चेतना दृश्य और द्रष्टा यानी विषय और विषयी का द्वैत है, इसलिए चेतना को समझने के लिए हमको उस ‘मैं’ को समझना होगा जो देख रहा होता है। कुछ विषय हैं मेरी जिंदगी में जो मेरे लिए मेरे बंधन हैं, वो दृश्य हैं और जिसको ये सब दिख रहा है कि वो बंधन है, वो द्रष्टा है। इसलिए ‘मैं’ को देखना जरूरी है, क्योंकि हर बंधन, हर लालच के पीछे ‘मैं’ की ही गहरी कामना छिपी होती है।
2. तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) चेतना को कैसे परिभाषित करता है और ये AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है?
उत्तर: Neuroscience में चेतना मस्तिष्क की गतिविधियाँ होती हैं। यह देखता है कि मस्तिष्क की गतिविधि, न्यूरल नेटवर्क और सूचना-संसाधन किस प्रकार सचेत अनुभवों को जन्म देते हैं। जबकि AP Framework कुछ और बात करता है कि जो व्यक्ति, व्यक्ति और मस्तिष्क की चेतना का अनुभव कर रहा है, वो कौन है? वो खुद अहंकार है। विज्ञान चेतना को दृश्य की तरह देखता है, जबकि AP Framework उस द्रष्टा यानी देखने वाले, उस ‘मैं’ की जाँच करता है।
3. आचार्य जी के अनुसार स्वतंत्र इच्छा (Free Will) क्या है? अपने जीवन से कुछ उदाहरण दीजिए जहाँ आपको लगता है आप स्वतंत्र इच्छा का पालन करते हैं, क्या वाकई स्वतंत्र होती हैं?
उत्तर: अहंकार डर, स्वार्थ, आदतों, लालच, आलस्य और self-preservation का ही पुतला है। तो जब अहंकार बोलता है कि ये उसकी free will से बात आई है, तो वो खुद को देख ही नहीं पा रहा है कि वो हर तरह से खुद को बचाना ही चाहता है, हमेशा-हमेशा। वो अपना विगलन नहीं चाहता। अहंकार के रहते हमारी स्वतंत्रता बहुत सीमित है। आचार्य जी के अनुसार वास्तविक स्वतंत्रता उस क्षण में दिखाई देती है जब व्यक्ति अपनी ही मजबूरियों को देख पाता है और अहंकार के विगलन की दिशा चुनता है।
4. कल के बोध प्रत्युषा सत्र में आचार्य जी ने कहा कि अहंकार भी नहीं, बल्कि ‘दुख’ मौलिक होता है। आप इससे क्या समझे? संक्षिप्त में लिखिए।
उत्तर: मैं समझ पा रही हूँ कि अहंकार अकेला है ही नहीं। उसने पकड़े हैं स्वार्थ, कामनाएँ, self-preservation, डर, उम्मीदें, असुरक्षा। हर चीज़ में अहंकार उल्टा ही चाहता है—कभी खुद को बचाना तो कभी स्वार्थ, कभी लालच, कभी डर। और ये सब वो अपने पूर्ण होने के लिए करता है। उसको लगता है कि कोई तो ऐसा विषय मिले कि डर खत्म हो, स्वार्थ पूरे हो, असुरक्षा कम हो।
इसका मतलब साफ है कि अगर वो सुख की तरफ जा रहा है, अगर वो कामनाओं की तरफ जा रहा है, अगर वो खुद को पूरा करने के लिए जा रहा है, तो उत्तर साफ है कि वह दुखी है, वो अधूरा है, वो डरा है, वो असुरक्षित है।
अहंकार माने दुख। वो दुखी ही है, तभी तो इधर-उधर ताक-झाँक कर रहा है। मैं जब देखती हूँ कि जो मेरी चाहत है उसको मैं क्यों पूरा करना चाहती हूँ, तो कुछ लालच दिखते हैं। या कोई इच्छा पूरी नहीं हो तो भी दुख होता है।
अगर अहंकार दुखी न होता, परेशान न होता, तो क्यों डरता? क्यों बचाता खुद को? वो डरा ही है कि वो खत्म न हो जाए। दोनों का एक-दूसरे से बहुत गहरा संबंध है।
Akshay chaudhary
१. चेतना माने अंहकार-वस्तु या दृष्टा-दृश्य का जोड़ा। यह एक द्वैतवादी सबंध हे। शुद्ध चेतना जैसा कुछ नहीं होता। अहंकार का अपने विगलन होने का चुनाव चेतना के ऊंचे तल को दर्शाता है।
२.न्यूरोसाइंस के अनुसार चेतना कोई आत्मा नहीं, बल्कि दिमाग की एक असर है। कोई अलग चीज़ नहीं जो दिमाग को चलाती है - दिमाग के चलने का तरीका ही चेतना है।
3 थ्योरी हैं, तीनों थोड़ा अलग जवाब देती हैं:
1. Global Workspace Theory - सबसे मान्य
हमारे दिमाग में हर सेकंड लाखों प्रोसेस चल रहे हैं - साँस, दिल, यादें, देखना - पर ज्यादातर बेहोश हैं।
जब कोई जानकारी इतनी जरूरी हो जाती है कि उसे पूरे दिमाग को बताना पड़े, तो दिमाग उसे एक "ग्लोबल स्टेज" पर डाल देता है। जैसे ऑफिस में लाउडस्पीकर पर अनाउंसमेंट।
जो जानकारी उस स्टेज पर आती है, वही हमे conscious लगती है। बाकी सब unconscious रह जाता है।
स्थान - मुख्यतः Prefrontal Cortex + Parietal lobe का नेटवर्क।
2. Integrated Information Theory (IIT)
चेतना = Information + Integration
कंप्यूटर में भी information है, पर वो बिखरी हुई है। इंसान के दिमाग में वही information इतनी बुरी तरह जुड़ी हुई है कि उसे तोड़ा नहीं जा सकता।
इस जुड़ाव की मात्रा को Phi (Φ) कहते हैं। Phi जितना ज्यादा, चेतना उतनी गहरी। इंसान में Phi बहुत ज्यादा, सोते समय या बेहोशी में Phi गिर जाता है।
3. Predictive Processing
दिमाग बाहर की दुनिया को देखता नहीं, अंदाजा लगाता है।
वो हमेशा प्रेडिक्ट करता है - "आगे क्या होगा?" और फिर आँख-कान से सिर्फ गलती सुधारता है।
चेतना वो प्रेडिक्शन का मॉडल है जो दिमाग ने "खुद" के बारे में बना रखा है। यानी तुम्हें लगता है "मैं हूँ", क्योंकि दिमाग ने अपने लिए एक "मैं" का मॉडल बना लिया है ताकि शरीर को कंट्रोल करना आसान हो।
एक लाइन में न्यूरोसाइंस का जवाब: चेतना कोई चीज नहीं जो दिमाग में रहती है, चेतना वो है जो दिमाग करता है, जब उसका नेटवर्क काफी जटिल और काफी जुड़ा हुआ हो जाए।
३.अहंकार के सारे चुनाव उसकी आत्म रक्षा (स्व बचाव) की वृत्ति से आते हे। इस प्रकार उसकी ईच्छाएं भी आत्म रक्षा की दिशामे ही होती हे। आचार्यजी ने कहा हे कि स्वतंत्र इच्छा तभी संभव हे जब अहंकार आत्म विगलन की दिशा में चुनाव करें।
४. अहंकार और दुख साथ साथ चलते हे। मैं माने दुख की कराह/पुकार। दुख मौलिक हे क्योंकि अहंकार खुदको कितनी भी पहचान देदे, भौतिक वस्तुओं से भर ले, दुनिया में सफल कहलाए, इज्जत पा जाए पर दुख उसका कभी खत्म नहीं होता।
Vishal Kushwah
1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है? अपने शब्दों में लिखिए।
चेतना एक द्वैत है जिसके एक छोर ले अहंकार है और दूसरे छोर पे विषय। इसके पर जाने में दावे बस पाखंड हैं।
2. तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) चेतना को कैसे परिभाषित करता है और ये AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है?
neuroscience में चेतना शरीर की वो अवस्था है जिसमें वो बाहर का अनुभव कर पता है जबकि ap framework में चेतना अहंकार है जो विषय से संबंध बनकर खुद की पहचानें गढ़ता है।
3. आचार्य जी के अनुसार स्वतंत्र इच्छा (Free Will) क्या है? अपने जीवन से कुछ उदाहरण दीजिए जहाँ आपको लगता आप स्वतंत्र इच्छा का पालन करते हैं, क्या वाकई स्वंतंत्र होतीं हैं।
फ्री will एक भ्रम है हमारे सारे फैसले हमारे भूतकाल से आते हैं और सामाजिक संस्कार , शरीर के हार्मोंस हमारे फैसलों को प्रभावित करते हैं।
मेरा कुछ बनने का फैसला, पियानो सीखना आदि सब बाहर से आया क्योंकि बाहर इसे अच्छा समझा जाता है और मुझे लगता है ये मेरी पसंद है।
4. कल के बोध प्रत्युषा सत्र में आचार्य जी ने कहा कि अहंकार भी नहीं, बल्कि ‘दुख’ मौलिक होता है। आप इससे क्या समझे? संक्षिप्त में लिखिए।
अहंकार के केंद्र में दुख है और आध्यात्म इसीलिए है क्योंकि दुख है अगर दुख न होता तो अहंकार को विगलित करने की कोई जरूरत ही नहीं थी।
Drishti Rai
1️⃣ चेतना एक द्वैतवादी परिघटना है, जिसके एक छोर पर
अहंकार और दूसरे छोर पर विषय होता है। इस संरचना के
बिना चेतना नहीं है। अहंकार के विगलन के बाद वैसी चेतना
भी समाप्त हो जाती है, जैसी अहंकार उसे जानता है।
2️⃣ तंत्रिका विज्ञान चेतना को मुख्यत: मस्तिष्क और जैविक
गतिविधियों से उत्पन्न अनुभव या जागरूकता के रूप में देखता
है। वही AP framework चेतना को केवल मस्तिष्क की उपज
मानकर नहीं रुकता, बल्कि यह पूछता है अनुभव करने वाला ’मैं’
कौन है और वह किस केंद्र से देख रहा है। यानी विज्ञान मुख्यत:
चेतना के न्यूरल आधार को देखता है, जबकि AP framework
अहंकार और उसके अनुभव संरचना को देखता है।
3️⃣ मैं अपनी ज़िंदगी में आज तक जो भी फैसले लेती थी, मुझे
लगता था मैं अपनी इच्छा से ले रही हूं लेकिन जब देखती हूं तो
पता चलता है कि ज्यादातर फ़ैसले तो मैंने समाज के हिसाब से
ही लिए हैं। समझ अब आता है कि इसे स्वतंत्र कहना सही नहीं
है।
4️⃣ क्योंकि हमें सबसे पहले इसी दुख को देखना है, अहंकार भी
एक मान्यता है, लेकिन दुख प्रत्यक्ष अनुभव है। एक दुख हमारी
अपेक्षाओं, मान्यताओं और उनसे चिपकने से पैदा होता है, इसलिए
भी से जाँच शुरू करना चाहिए।
Arihant Jain
1. How does the AP Framework define Consciousness? Explain in your own words.
The AP Framework describes consciousness as the relation between the ego and its object. This is a binary duality: one cannot exist without the other. The ego cannot exist without its object, and the object, meaning the psychological object, cannot exist without the ego. The thinning of the ego and the refinement of consciousness is the aim of spirituality in the AP Framework.
2. How does Neuroscience define Consciousness, and how does it fundamentally differ from the AP framework?
In my childhood, in 7th or 8th class, we were taught the difference between living and non-living things. A living thing is one that grows and multiplies, that is, one that has the ability to reproduce. This was taught in biology. Neuroscience also says that living things can think and imagine, and have systems like respiration, and these exist at the cellular level too. This is how neuroscience describes life.
But the AP Framework deals only with the ego, which is the subject of all objects and leads to the relationship with objects. Whatever life is, it is due to that ego, that consciousness, alone.
3. According to Acharya Ji, what is Free Will? Share an instance from your own life where you felt you were exercising free will. Upon closer observation, was it genuinely free?
According to Acharya ji, free will is the ego's decision not to remain, to thin itself down. This is the only free will there is, and it belongs to the ego alone. Otherwise, there is no free will. There is not even a will, because nature, the Prakriti, is the doer. The ego itself claims to be there, and claims to be the doer.
So the ego sees itself as the doer, a choice-maker with free will, but it has no free will. The ego is a collection of tendencies. The body, society, and coincidences are what the ego is made up of. The only choice the ego has is whether to identify or not to identify with these things. In that sense the ego is sovereign and has a choice, though it does not really exist as it claims to.
And if the ego does not see itself, it will not decide by free will. It will only be conditioned. So whenever the ego is there, there is no free will. Free will exists only in the ego's decision about its own remaining or not remaining.
4. In yesterday's Bodh Pratyusha session, Acharya Ji stated that not even the ego, but 'suffering' itself is fundamental. What did you understand from this? Write in brief.
Acharya ji said that the ego is the suffering, and the ego is the sufferer. But to describe its nature and its characteristics, we call it the ego, which causes suffering. The fundamental thing, though, is suffering itself.
To describe the ego, we have to describe the whole world. We search for happiness, pleasure, newness and adventure, and we search for all of it in order to reduce our suffering. Even if we describe self-consciousness, or self-ism, it is due to the ego, but the fundamental is suffering alone, because suffering drives all the work the ego does and all the choices it makes. All of it is for the sake of reducing one's suffering.
anshulsingh
1. How does the AP framework define consciousness?
As I understand it, in the AP framework consciousness is not just some function of the body or the brain.
Consciousness is that which can honestly watch its own choices.
Consciousness has the capacity to recognize its ego, its desires, fears and beliefs, and to separate from them and move towards the Truth.
So consciousness is not just about knowing; it is about awakening and making the right choice.
2. How does neuroscience define consciousness, and how is it different from the AP framework?
Neuroscience understands consciousness as a state of awareness and experience arising from neural activity in the brain.
In other words, neuroscience studies how the processes happening in the brain give rise to our sensations, thoughts and awareness.
The AP framework goes beyond this and does not see consciousness as merely an activity of the brain.
According to AP, the real question is: who is the one that is seeing all that is going on in the mind, and how can that one be free of its bondage?
So while neuroscience views consciousness mainly from a scientific and biological standpoint, the AP framework looks at it in the context of ego, bondage, Truth and liberation.
3. According to Acharya Ji, what is free will?
As I understand it, free will does not simply mean that I can choose anything as per my liking. If my choices are being determined by my desires, fears, conditioning, habits and other people’s opinions, then outwardly I may look free, but in reality I am a slave to those very things.
For example, in my life I might think I am freely choosing to use my phone a lot, to drink too much tea, or to procrastinate. It appears to me that this is my free choice. But when I look closely and see that I’m doing this because of habit, laziness, inner restlessness or some desire, then I realize: where is real freedom in this?
True free will is when the ego chooses its own dissolution and chooses to move towards the Truth. Most of our other choices arise from the ego’s own desires.
4. “Ego is not fundamental, rather suffering is fundamental” — how did you understand this?
I understood it like this: we usually think that first there is ‘me’, the ego, and then this ‘me’ experiences suffering. But Acharya Ji’s point invites us to see that, in our experience, what first becomes evident is suffering itself, and to escape that suffering the ego creates its identities, desires and supports.
In other words, instead of treating ego as some separate entity, it is important to see that it is the inner suffering that keeps pushing us to become something, acquire things, and keep clinging to them.
If the root of suffering is understood, then the entire activity of the ego also starts becoming clear.
For me, the main realization here is that liberation is not just about trying to destroy the ego, but about honestly seeing that suffering from which the ego continually draws its sense of identity.
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Jagat Dorata
1️⃣ framework चेतना को कैसे परिभाषित करता है
चेतना कोई अखंड स्वतंत्र चीज नहीं
(कोई जान रहा है और कुछ जाना जा रहा है)
जानने वाला न हो तो जाना जाने वाला भी नहीं टिकताऔर जाना जाने वाला न हो तो जानने वाला भी व्यर्थ है
दोनों साथ साथ उठते है , एक दूसरे के बिना किसी का अस्तित्व नहीं
अहंकार जैसे संसार को देखना चाहता है वैसे ही संसार उसे दिखता है माने द्वैत के दोनों छोर असल में अहंकार के ही दो रूप है
इसलिए जब अहंकार पतला पड़ता है तो जानने वाली चीज भी बदल जाती है
2️⃣
neuroscience पूछ सकता है
गुस्से के समय ब्रेन में क्या हो रहा है
कौनसे neural circuit सक्रिय है ?
neurotransmitters क्या भूमिका निभा रहे हैं ?
attention और decision making कैसे बदलते है?
framework पूछता है
क्या मै गुस्सा हु
गुस्सा किसे आयब, क्या मै देख सकता हु
3️⃣
स्वतंत्र इच्छा free will केवल एक ही क्षण में उपलब्ध है, जब अहंकार स्वयं अपने विगलन का चुनाव करे
मेरा आचार्य जी से जुड़े रहना
4️⃣ कल के बोध प्रत्युषा सत्र में आचार्य जी ने कहा कि अहंकार भी नहीं, बल्कि ‘दुख’ मौलिक होता है। आप इससे क्या समझे? संक्षिप्त में लिखिए।
जो मुझे समझ आया
हमे अहंकार से कोई अड़चन नहीं , अड़चन है तो दुख से , और दुख हमारा स्वभाव नहीं
अहंकार से हमे कोई दिक्कत नहीं थी अगर उसके रहते हम दुख हटा सकते
पर अहंकार माने ही दुख है
अहंकार है तो दुख है दुखी रहना नहीं तो अहंकार हटाओ
Amit Kumar
1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है? अपने शब्दों में लिखिए।
Ans-:
AP फ्रेमवर्क के अनुसार, चेतना ‘मैं’ (अहंकार) और ‘विषय’ (जिसे मैं जान रहा हूँ) के बीच का द्वैत है।
अर्थात् जहाँ कोई ‘जानने वाला’ और कोई ‘जाना जाने वाला’ है, वहाँ चेतना की यह संरचना मौजूद है।
2. तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) चेतना को कैसे परिभाषित करता है और ये AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है?
Ans:- तंत्रिका विज्ञान के अनुसार चेतना
चेतना (Consciousness) वह अवस्था है जिसमें मस्तिष्क अपने तथा बाहरी संसार से संबंधित सूचनाओं को ग्रहण, संसाधित और उनका अनुभव कर पाता है।
उदाहरण: दर्द होने पर केवल तंत्रिका-संकेत उत्पन्न होना पर्याप्त नहीं है; उस दर्द का अनुभव होना चेतना का हिस्सा है।
तंत्रिका विज्ञान में चेतना को मुख्यतः दो पहलुओं में समझा जाता है:
1. जागरूकता (Awareness) — अपने और वातावरण के बारे में जानकारी होना।
2. अनुभूति (Experience) — रंग, दर्द, सुख, विचार आदि का व्यक्तिगत अनुभव होना।
तंत्रिका विज्ञान और AP फ्रेमवर्क में चेतना का अंतर
1. दृष्टिकोण:
तंत्रिका विज्ञान: चेतना को मस्तिष्क और तंत्रिका-तंत्र की प्रक्रियाओं के आधार पर समझता है।
AP फ्रेमवर्क: चेतना को ‘मैं’ (अहंकार) और ‘विषय’ के द्वैत के रूप में समझता है।
2. मुख्य प्रश्न:
तंत्रिका विज्ञान: चेतना मस्तिष्क में कैसे उत्पन्न या संबंधित है?
AP फ्रेमवर्क: चेतना में ‘मैं’ और विषय की भूमिका क्या है?
3. मुख्य तत्व:
तंत्रिका विज्ञान: मस्तिष्क, न्यूरॉन्स, तंत्रिका-संकेत और सूचना-प्रसंस्करण।
AP फ्रेमवर्क: अहंकार (‘मैं’) + विषय (‘जिसे मैं जान रहा हूँ’)।
4. विशुद्ध चेतना:
तंत्रिका विज्ञान: ‘विशुद्ध चेतना’ को स्थापित वैज्ञानिक अवधारणा नहीं मानता; इसके लिए अनुभवजन्य प्रमाण आवश्यक हैं।
AP फ्रेमवर्क: ‘मैं’ और विषय के द्वैत से अलग किसी अवशिष्ट विशुद्ध चेतना को नहीं मानता।
5. अहंकार के विगलन पर:
तंत्रिका विज्ञान: self-awareness में होने वाले बदलावों को मस्तिष्कीय प्रक्रियाओं के संदर्भ में अध्ययन करता है।
AP फ्रेमवर्क: अहंकार के विगलन के साथ अहंकार द्वारा जानी जाने वाली चेतना भी समाप्त हो जाती है।
3. आचार्य जी के अनुसार स्वतंत्र इच्छा (Free Will) क्या है? अपने जीवन से कुछ उदाहरण दीजिए जहाँ आपको लगता आप स्वतंत्र इच्छा का पालन करते हैं, क्या वाकई स्वंतंत्र होतीं हैं।
मैंने अभी तक Free will को नहीं पढ़ा है।
सत्रों में सिर्फ सुना हूँ कि जिसे आम तौर पर हम फ्री विल कहते हैं वह भी बस शरीर, समाज और संयोग पर आश्रित होती है।
मुझे अपने जीवन से ऐसा उदाहरण देना मुश्किल हो रहा है, शायद नहीं होती है ; Free will.
4. कल के बोध प्रत्युषा सत्र में आचार्य जी ने कहा कि अहंकार भी नहीं, बल्कि ‘दुख’ मौलिक होता है। आप इससे क्या समझे? संक्षिप्त में लिखिए।
Ans: - धर्म का प्राथमिक संबंध दुःख से है, अहं से नहीं। चूँकि जब तक अहं है दुःख भी रहेगा।
इसलिए अहं के विगलन पर जोर दिया जाता है।
Suman Kumari
अपने दुख और अपने 'मैं' को ईमानदारी से देखना ही आत्मज्ञान की शुरुआत है।
अहंकार अपनी इच्छाओं, और डर के कारण बंधा रहता है। जब हम उसे पहचानकर उसकी मजबूरियों से ऊपर उठने का चुनाव करते हैं, तभी वास्तविक स्वतंत्रता और मुक्ति की दिशा खुलती है।
Aman kumar
आचार्य प्रशांत फ्रेमवर्क के अनुसार, चेतना को मूल रूप से एक द्वैतवादी घटना के रूप में परिभाषित किया गया है। इस दर्शन में चेतना को किसी रहस्यमयी या अलौकिक तत्व के बजाय पूरी तरह से अहंकार और विषय के अंतर्संबंध के रूप में देखा जाता है।
Deepak Raj
1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है? अपने शब्दों में लिखिए।
✍🏻 चेतना हमेशा द्वैत में होती है। एक तरफ ‘मैं’ यानी अहंकार होता है और दूसरी तरफ उसका विषय। अहंकार और उसका विषय—इन्हीं दोनों के बीच चेतना की गतिविधि होती है। इसलिए ‘विशुद्ध चेतना’ जैसी कोई अलग अवस्था, जिसमें न देखने वाला हो और न कोई विषय, मानना सही नहीं है। द्वैत के दोनों छोर पर अहंकार की ही गतिविधि हैं।
जब अहंकार का विगलन होता है, तो अहंकार जिस तरह की चेतना को जानता था, वह भी वैसी नहीं रहती।
2. तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) चेतना को कैसे परिभाषित करता है और ये AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है?
✍🏻 Neuroscience चेतना को मुख्य रूप से मस्तिष्क और उसकी गतिविधियों से जोड़कर समझता है।
AP Framework का ध्यान इस पर है कि जो चेतना और मस्तिष्क का अध्ययन कर रहा है, वह ‘मैं’ कौन है।
यानी विज्ञान बाहर से चेतना को समझने की कोशिश करता है, जबकि AP Framework देखने वाले ‘मैं’ को ही देखने के लिए कहता है।
3. आचार्य जी के अनुसार स्वतंत्र इच्छा (Free Will) क्या है? अपने जीवन से कुछ उदाहरण दीजिए जहाँ आपको लगता आप स्वतंत्र इच्छा का पालन करते हैं, क्या वाकई स्वंतंत्र होतीं हैं।
✍🏻 स्वतंत्र इच्छा का मतलब अपनी मनमर्जी करना नहीं है। अगर मेरे फैसले डर, लालच, मोह, आदत या अपनी सुरक्षा की चिंता से निकल रहे हैं, तो मैं वास्तव में स्वतंत्र नहीं हूँ, क्योंकि भीतर से मैं उनका गुलाम हूँ।
सच्ची स्वतंत्रता तब है जब मैं अपने बंधनों को देखूँ और उनसे मुक्त होने का निर्णय लूँ। अहंकार के लिए सबसे बड़ी स्वतंत्र इच्छा अपने ही विगलन और सच्चाई की ओर जाने को चुनना है।
मेरी नौकरी है। सच बोलूँ तो कई बार मुझे लगता है कि मैं अपनी मर्ज़ी से यह नौकरी कर रहा हूँ। लेकिन जब मैं थोड़ा गहराई से देखता हूँ, तो समझ आता है कि इसके पीछे मेरी कई डर भी हैं—पैसे की जरूरत और परिवार की जिम्मेदारी।
इसलिए मैं कह सकता हूँ कि बाहर से यह मेरा फैसला दिखाई देता है, लेकिन क्या यह वास्तव में मेरी स्वतंत्र इच्छा नहीं है। क्योंकि मेरे निर्णय पर मेरी जरूरतें, डर और जिम्मेदारियाँ भी असर डाल रही हैं।
4. कल के बोध प्रत्युषा सत्र में आचार्य जी ने कहा कि अहंकार भी नहीं, बल्कि ‘दुख’ मौलिक होता है। आप इससे क्या समझे? संक्षिप्त में लिखिए।
✍🏻 मेरी समझ में, ‘दुख’ मौलिक है क्योंकि हमारे लिए सबसे पहली और सबसे सीधी अनुभूति दुख की ही होती है। अहंकार को भी हम दुख के माध्यम से ही पहचान पाते हैं—दुख किसे हो रहा है, यह देखने पर ‘मैं’ की पहचान सामने आती है।
अहंकार पकड़ने के बजाय पहले अपने दुख को ईमानदारी से देखना ज़रूरी है। जब मैं देखता हूँ कि मुझे दुख क्यों हो रहा है, तो उसके पीछे मेरी इच्छाएँ, डर, मोह और अपनी बनाई हुई धारणाएँ दिखाई देने लगती हैं।
Anu bishnoi
💫AP फ्रेमवर्क के अनुसार चेतना कोई बाहर की वस्तु नहीं, बल्कि द्रष्टा और उसके अनुभव के बीच का संबंध है। विज्ञान चेतना को मस्तिष्क की जैविक प्रक्रिया मानकर उसका अध्ययन करता है, जबकि AP में स्वयं उस ‘मैं’ को देखा जाता है जो अनुभव कर रहा है।
✳️‼️स्वतंत्र इच्छा भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है, क्योंकि हमारे अधिकतर निर्णय डर, इच्छाओं, आदतों और अहंकार से निकलते हैं। जैसे मैं पढ़ाई या फोन में से कुछ चुनती हूँ, लेकिन कई बार मेरा चुनाव मेरी आदत और मन की इच्छा से तय होता है। वास्तविक स्वतंत्रता तब है जब अहंकार अपनी ही मजबूरियों को देखकर उनसे मुक्त होने का चुनाव करे।
‘💫✳️दुख’ को मौलिक कहने का अर्थ है कि हमारे भीतर सबसे पहले दुख का अनुभव है और अहंकार उसी दुख से बचने के लिए अपनी पहचान, इच्छाएँ और कहानियाँ बनाता है। इसलिए दुख को समझना ही अहंकार को समझने की दिशा है।
Aanchal
1) AP फ्रेमवर्क के अनुसार चेतना कोई बाहर मौजूद वस्तु नहीं है, जिसे हम अलग खड़े होकर देख सकें। चेतना में हमेशा द्रष्टा और दृश्य, यानी विषय और विषयी का द्वैत होता है।
2) तंत्रिका विज्ञान चेतना को मुख्यतः मस्तिष्क की जैविक गतिविधियों और न्यूरॉन्स के काम से जुड़ी अवस्था मानता है। वह चेतना को मस्तिष्क में होने वाली प्रक्रियाओं के माध्यम से वस्तुनिष्ठ रूप से समझने और मापने की कोशिश करता है।
वहीं AP फ्रेमवर्क कहता है कि चेतना को केवल बाहर से एक वस्तु की तरह नहीं समझा जा सकता, क्योंकि अध्ययन करने वाला स्वयं उसी चेतना का हिस्सा है। इसलिए केवल मस्तिष्क का अध्ययन करने से उस ‘मैं’ और उसके दुख को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
3) आचार्य जी के अनुसार सामान्यतः जिसे हम स्वतंत्र इच्छा कहते हैं, वह वास्तव में हमारी इच्छाओं, डर, आदतों और सुरक्षा की जरूरतों से निकलती है। इसलिए अहंकार के रहते हमारे अधिकांश निर्णय वास्तव में स्वतंत्र नहीं होते।
जैसे मैं पढ़ाई करने के बजाय मोबाइल चलाती हूँ और सोचती हूँ कि यह मेरी अपनी इच्छा है। लेकिन अगर मैं मोबाइल की आदत, मनोरंजन की इच्छा या पढ़ाई से बचने की प्रवृत्ति से मजबूर हूँ, तो यह पूरी तरह स्वतंत्र निर्णय नहीं है।
वास्तविक स्वतंत्रता तब है जब मैं अपने अहंकार की मजबूरियों को देखकर उनसे मुक्त होने का चुनाव करूँ। यानी अपने विगलन को चुनना ही वास्तविक स्वतंत्र इच्छा है।
4) ‘अहंकार नहीं, दुख मौलिक है’ — इसका अर्थ
मैं इससे यह समझती हूँ कि अहंकार को केवल एक अलग पहचान के रूप में देखने से बात पूरी नहीं होती। दुख ही वह मूल अनुभव है जिसके कारण ‘मैं’ अपने आपको बचाने, सुरक्षित रखने और अपनी पहचान बनाने में लगा रहता है।
हम दुख से बचने के लिए इच्छाएँ, रिश्ते, उपलब्धियाँ और अपनी अलग-अलग पहचानें बनाते हैं। इसलिए दुख को ईमानदारी से देखना जरूरी है। जब दुख की जड़ दिखाई देती है, तभी अहंकार की पकड़ भी कमजोर होने लगती है।
Manisha
1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है?
मेरी समझ से AP फ्रेमवर्क में चेतना केवल शरीर या मस्तिष्क की कोई क्रिया नहीं है।
चेतना वह है जो अपने चुनाव को ईमानदारी से देख सकती है।
चेतना में यह क्षमता है कि वह अपने अहंकार, अपनी इच्छाओं, डर और धारणाओं को पहचानकर उनसे अलग होकर सत्य की ओर जा सके।
इसलिए चेतना का संबंध केवल जानने से नहीं, बल्कि जागृति और सही चुनाव से है।
2. Neuroscience चेतना को कैसे परिभाषित करता है और यह AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है?
तंत्रिका विज्ञान चेतना को मस्तिष्क की तंत्रिका-गतिविधियों से जुड़ी जागरूकता और अनुभव की अवस्था के रूप में समझता है।
यानी मस्तिष्क में होने वाली प्रक्रियाओं से हमारी अनुभूति, विचार और जागरूकता कैसे पैदा होती है, इसका अध्ययन Neuroscience करता है।
AP फ्रेमवर्क इससे आगे जाकर चेतना को केवल मस्तिष्क की गतिविधि नहीं मानता।
AP के अनुसार प्रश्न यह है कि जो कुछ मन में चल रहा है, उसे देखने वाला कौन है और वह अपने बंधन से मुक्त कैसे हो सकता है।
इसलिए Neuroscience चेतना को मुख्यतः वैज्ञानिक और जैविक दृष्टि से देखता है, जबकि AP फ्रेमवर्क उसे अहंकार, बंधन, सत्य और मुक्ति के संदर्भ में देखता है।
3. आचार्य जी के अनुसार स्वतंत्र इच्छा (Free Will) क्या है?
मेरी समझ से स्वतंत्र इच्छा का अर्थ केवल यह नहीं है कि मैं अपनी मर्जी से कोई भी चीज चुन सकती हूँ। अगर मेरा चुनाव मेरी इच्छाओं, डर, संस्कार, आदतों और दूसरों की राय से तय हो रहा है, तो मैं बाहर से तो स्वतंत्र दिख रही हूँ, लेकिन वास्तव में उन्हीं चीजों की गुलामी में हूँ।
जैसे मेरे जीवन में कभी मैं सोचती हूँ कि मैं अपनी इच्छा से मोबाइल चला रही हूँ, ज्यादा चाय पी रही हूँ या किसी काम को टाल रही हूँ। मुझे लगता है कि यह मेरा स्वतंत्र चुनाव है। लेकिन जब मैं देखती हूँ कि मैं ऐसा अपनी आदत, आलस, मन की बेचैनी या किसी इच्छा के कारण कर रही हूँ, तो समझ आता है कि इसमें वास्तविक स्वतंत्रता कहाँ है।
सच्ची स्वतंत्र इच्छा तब है जब अहंकार अपने ही विगलन को चुनता है और सत्य की ओर जाने का चुनाव करता है। बाकी अधिकतर चुनाव अहंकार की ही इच्छाओं से निकलते हैं।
4. ‘अहंकार नहीं, बल्कि दुःख मौलिक होता है’ — आप इससे क्या समझे?
मैंने इसे ऐसे समझा कि हम अक्सर सोचते हैं कि पहले ‘मैं’ यानी अहंकार है और फिर मुझे दुःख होता है। लेकिन आचार्य जी की बात हमें यह देखने को कहती है कि हमारे अनुभव में सबसे पहले दुःख ही दिखाई देता है और उसी दुःख से बचने के लिए अहंकार अपनी पहचान, इच्छाएँ और सहारे बनाता है।
अर्थात अहंकार को केवल एक अलग वस्तु मानने के बजाय यह देखना जरूरी है कि अंदर का दुःख ही हमें लगातार कुछ बनने, पाने और पकड़कर रखने के लिए मजबूर करता है।
अगर दुःख की जड़ को समझ लिया जाए, तो अहंकार की पूरी गतिविधि भी समझ में आने लगती है।
मेरे लिए इसका मुख्य बोध यह है कि मुक्ति केवल अहंकार को खत्म करने की कोशिश करना नहीं है, बल्कि उस दुःख को ईमानदारी से देखना है जिससे अहंकार लगातार अपनी पहचान बनाए रखता है।
Roma kuari
1️⃣ AP फ्रेमवर्क के अनुसार चेतना कोई बाहर रखी वस्तु नहीं है जिसका प्रयोगशाला में अध्ययन हो सके
चेतना हमेशा द्वैतवाद होती है यह हमेशा किसी विषय का किसी विषय के लिये होता है एक दृश्य ओर एक दृष्टा अकेली चेतना जैसी कोई चीज नहीं होती
हमारी चेतना कभी निरपेक्ष होकर नहीं दिखती देखने वाला हमेशा अपनी किसी कामना या डर से भरा होता है हम जगत को वैसा नहीं देखते जैसा वह है, बल्कि अपने आत्म - संरक्षण के लिए उसे विकृत करके देखते है
2️⃣ संसार में जब भी चेतना की बात होती है तो विज्ञान ओर दर्शन इसी दो तरह से देखते है
मस्तिष्क की एक जैविक उपज ब्रेन से पैदा होने वाला secretion जैसा
दूसरा कोई रहस्मय पाराभोतिक अनुभव जिसे बाहर प्रोगशाला में देखा या मापा जा सके
दोनों ही मामलों में चेतना को एक वस्तु बना देता है जैसे बाहर से observ किया जा सकता है
AP फ्रेमवर्क इसे अलग तरह से देखती है
विज्ञान चेतना का अध्ययन करना चाहता है पर यह नहीं देखता कि अध्ययन करने वाला कौन है
AP फ्रेमवर्क कहता है- जब तक अवलोकन करने वाला स्वयं अपनी आंतरिक स्थिति का परीक्षण नहीं करता तब तक चेतना का कोई भी अध्ययन भ्रामक निष्कर्ष ही देगा
विज्ञान पूछता है - चेतना क्या है
वेदांत पूछता है - चेतना की बात करने वाला मैं कौन है
3️⃣ आचार्य जी कहते है स्वतंत्र इच्छा केवल एक ही क्षण में संभव है जब अहंकार स्वयं अपने विगलन का चुनाव करता है उसके अलावा अहंकार का हर निर्णय उसकी गुलामी से ही निकलता है
क्यों कि निर्णय लेने वाला अहंकार स्वयं अपनी मजबूरियों सुरक्षा, ओर दरों का गुलाम है
मेरी जीवन का उदाहरण रिश्तों में लगता है मैने अपनी स्वतंत्र इच्छा से गुस्सा किया या प्यार जताया पर गुस्सा भी इसलिए आया ताकि मेरी छवि को चोट न लगे प्यार भी इसलिए जताया ताकि दूसरा मुझे छोड़ न दे पर देख भी पाई हों कि यह स्वतंत्रता नहीं थी
स्वतंत्रता का एक ही क्षण है जब में कह पाऊं यह इच्छा मेरी अहंकार की है और मैं इसे नहीं चुनता मैं अपने मिटने का चुनता हूँ, जैसे सच बोलना, जबकि झूठ बोलने में अहंकार का लाभ हो
4️⃣ वेदांत का अर्थ सीधे उस मैं , पंडित अहंकार को देखना जो दुख भोग रहा है
अहंकार मौलिक नहीं है क्यों कि वह शरीर, मन से बना एक विचार है एक भ्रांति है, वह बदलता रहता है पर दुख मौलिक है क्यों कि दुख का अनुभव ही वह पहली और सबसे सच्ची बात है जिसे कोई नकार नहीं सकता
दुख बाहर किसी वस्तु को नहीं होता, अहंकार को होता है और उसी दुख के निवारण के लिए सारा अध्यात्म है
इसलिए नेति - नेति कहा गया - आत्मा कोई वस्तु नहीं है ईमानदार आत्म परीक्षण है द्वारा अहंकार का घटते जाना ही आत्मा की दिशा है
Vindhyachal Singh
1️⃣ AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है? अपने शब्दों में लिखिए।
मेरी समझ से AP फ्रेमवर्क में चेतना को कोई बाहर रखी हुई वस्तु नहीं माना जाता, जिसे हम किसी दूसरी वस्तु की तरह देखकर माप सकें। चेतना में हमेशा द्रष्टा और दृश्य, यानी जानने वाला और जानी जाने वाली चीज़ का संबंध होता है। हमारे विचार, भावनाएँ, स्मृतियाँ, इच्छाएँ आदि चेतना की सामग्री हैं, लेकिन इन्हें ही चेतना मान लेना अधूरा है।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अहंकार स्वयं चेतना के भीतर मौजूद एक ध्रुव है। इसलिए चेतना का अध्ययन केवल बाहर की वस्तुओं को देखकर पूरा नहीं हो सकता। जिस 'मैं' के माध्यम से संसार को देखा जा रहा है, उसी 'मैं' की भी जाँच करनी होगी।
वेदांत का प्रश्न इसलिए केवल यह नहीं है कि “चेतना क्या है?”, बल्कि यह भी है कि “जो चेतना के बारे में पूछ रहा है, वह कौन है और उसकी स्थिति क्या है?” आत्म-परीक्षण में जैसे-जैसे अहंकार की भ्रांतियाँ और उसकी पकड़ कमजोर होती जाती है, वैसे-वैसे सत्य की दिशा खुलती जाती है। इसलिए 'नेति-नेति' का अर्थ किसी नई वस्तु को पाना नहीं, बल्कि गलत पहचानों को लगातार हटाना है।
2️⃣ तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) चेतना को कैसे परिभाषित करता है और ये AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है?
तंत्रिका विज्ञान मुख्यतः चेतना को मस्तिष्क की गतिविधियों से जुड़ी हुई अवस्था के रूप में अध्ययन करता है। वह यह देखने का प्रयास करता है कि जागरूकता, अनुभव, स्मृति, ध्यान आदि के पीछे मस्तिष्क के कौन-से हिस्से और कौन-सी neural processes काम कर रही हैं। उदाहरण के लिए, मस्तिष्क की चोट, एनेस्थीसिया या नींद के दौरान चेतना में होने वाले बदलावों का अध्ययन किया जाता है।
इसका AP फ्रेमवर्क से मुख्य अंतर दृष्टिकोण का है।
• Neuroscience मुख्यतः चेतना को तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से अध्ययन करता है—मस्तिष्क में क्या हो रहा है?
• AP फ्रेमवर्क प्रश्न करता है कि पहले व्यक्ति के अनुभव और उस अनुभवकर्ता 'मैं' की प्रकृति क्या है?
• विज्ञान मस्तिष्क, न्यूरॉन और व्यवहार जैसे observable correlates को माप सकता है।
• वेदांत यह देखता है कि दुख किसे हो रहा है, देखने वाला कौन है और उसकी धारणाएँ किस प्रकार उसके अनुभव को निर्धारित करती हैं।
इसलिए दोनों को सीधे विरोधी मानना उचित नहीं होगा। Neuroscience चेतना के मस्तिष्कीय correlates और mechanisms का अध्ययन करता है, जबकि AP फ्रेमवर्क चेतना में उपस्थित अहंकार, अनुभव और दुख के संबंध की आत्म-परीक्षण द्वारा जाँच करता है।
3️⃣ आचार्य जी के अनुसार स्वतंत्र इच्छा (Free Will) क्या है? अपने जीवन से कुछ उदाहरण दीजिए जहाँ आपको लगता आप स्वतंत्र इच्छा का पालन करते हैं, क्या वाकई स्वंतंत्र होतीं हैं।
मेरी समझ से आचार्य जी के अनुसार सामान्यतः जिसे हम स्वतंत्र इच्छा कहते हैं, वह वास्तव में बहुत बार स्वतंत्र नहीं होती। हम सोचते हैं कि “मैंने अपनी इच्छा से यह निर्णय लिया”, लेकिन उस निर्णय के पीछे डर, लालच, सामाजिक दबाव, आदत, मान्यता पाने की इच्छा और अपने भविष्य को सुरक्षित करने की चाह हो सकती है।
उदाहरण के लिए, यदि मैं कोई नौकरी केवल इसलिए चुनता हूँ कि लोग मुझे सफल मानें या परिवार को लगे कि मैं कुछ बन गया हूँ, तो बाहर से यह मेरा निर्णय दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में मेरा निर्णय दूसरों की स्वीकृति की इच्छा से संचालित है।
इसी तरह यदि मैं पढ़ाई इसलिए करता हूँ कि असफल होने पर लोग मुझे निकम्मा न समझें, तो मैं पढ़ तो रहा हूँ, लेकिन मेरा निर्णय डर से निकल रहा है।
मेरे जीवन में परीक्षा, नौकरी, पैसे या करियर से जुड़े कई निर्णय ऐसे रहे हैं जिन्हें मैंने उस समय अपनी स्वतंत्र पसंद समझा, लेकिन बाद में देखने पर लगा कि उनमें परिवार की अपेक्षा, असफलता का डर, आर्थिक सुरक्षा और समाज में अच्छा दिखने की इच्छा काफी हद तक काम कर रही थी।
इस दृष्टि से स्वतंत्र इच्छा का अर्थ मन की हर इच्छा को पूरा करना नहीं है। बल्कि जब व्यक्ति अपनी मजबूरियों को देख पाता है और अहंकार की पकड़ से थोड़ा मुक्त होकर सही को चुनता है, तब स्वतंत्रता की संभावना पैदा होती है। यानी स्वतंत्रता का संबंध अहंकार की इच्छाओं को बढ़ाने से नहीं, बल्कि उसकी गुलामी को पहचानने और उससे मुक्त होने से है।
4️⃣ कल के बोध प्रत्युषा सत्र में आचार्य जी ने कहा कि अहंकार भी नहीं, बल्कि ‘दुख’ मौलिक होता है। आप इससे क्या समझे? संक्षिप्त में लिखिए।
मैं इसे इस तरह समझता हूँ कि हमारे लिए शुरुआत में सबसे प्रत्यक्ष तथ्य यह नहीं है कि “मैं एक अहंकारी व्यक्ति हूँ”, बल्कि यह है कि “मैं दुखी हूँ।”
अहंकार की परिभाषा समझने से पहले ही मुझे अपने जीवन में डर, असुरक्षा, अकेलापन, तुलना, इच्छा और चिंता दिखाई देती है। मैं इनसे बचने के लिए अपने बारे में अलग-अलग कहानियाँ बनाता हूँ—मैं कौन हूँ, मुझे क्या चाहिए, लोग मुझे कैसे देखें, मुझे क्या हासिल करना है आदि। यही दुख धीरे-धीरे उस 'मैं' की जाँच का द्वार बन सकता है।
इसलिए “दुख मौलिक है” का अर्थ मेरे लिए यह है कि वेदांत की शुरुआत किसी दार्शनिक अवधारणा से नहीं, बल्कि अपने वास्तविक दुख को ईमानदारी से देखने से होती है। जब मैं पूछता हूँ कि “आखिर दुख किसे हो रहा है और क्यों?”, तब अहंकार की संरचना सामने आने लगती है।
इस अर्थ में दुख केवल समस्या नहीं है; यदि उसे दबाने या उससे भागने के बजाय ठीक से देखा जाए, तो वही आत्म-परीक्षण का प्रारंभिक बिंदु बन सकता है।
Yash
Wisdom Activity:-
1.How does the AP Framework define Consciousness? Explain in your own words.
-->Consciousness is dualistic phenomenon: ego at one end, Object at the other. There is no Consciousness without this duality, no awareness that is not awareness of something, from the perspective of some centre.
--> In simple words, what we understand from Consciousness is simply due to Ego seeing the world and using it for self-preservation and for himself. ego is not observing or noticing the world in an objective manner.
2.How does Neuroscience define Consciousness, and how does it fundamentally differ from the AP framework?
---> In neuroscience, consciousness refers to the subjective, internal experience of awareness of oneself and the surrounding world.
---> In neuroscience consciousness is defined from subjective perspective where in AP framework Consciousness define from Objective perspective. Ap framework directly question subject (ego) who is using All the things for self-protection.
3.According to Acharya Ji, what is Free Will? Share an instance from your own life where you felt you were exercising free will. Upon closer observation, was it genuinely free?
---> According AP framework personal free will ("your" free will) is an illusion or a "slave's will," because ordinary choices are entirely bound by biological, social, and psychological conditioning.
---> When i have to choose two elective topics from many Topics. I didn't choose topic which my friend are choosing because they are choosing topic I which rest or don't have to work in that. So i choose a topic which is interesting for me and important for my future carrier clarity& work has to do, Now I see that in this my conditioning work means I choose topic which supporting my claim that I am capable of doing this in the future or my desire for that future make me choose that. if I see from Objective manner, it was not genuinely free also that I have to compulsory choose two topic from only given topics.
4. In yesterday's Bodh Pratyusha session, Acharya Ji stated that not even the ego, but 'suffering' itself is fundamental. What did you understand from this? Write in brief.
--->I understand that suffering causes the ego to choose other things where the ego thinks that it can be fulfilled. So suffering is causing more suffering. But here ego has a choice to what to choose another object or dissolve itself, so suffering can't be felt or see that suffering is only to ego.
Pithiya Hardik
(1)
चेतना एक द्वैतवादी परिघटना है, जिसके एक छोर पर अहंकार और दूसरे छोर पर विषय होता है। इस संरचना के बिना चेतना नहीं है। अहंकार के विगलन के साथ वैसी चेतना भी समाप्त हो जाती है, जैसी अहंकार उसे जानता है।
(2)
तंत्रिका विज्ञान चेतना को मुख्यतः मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र की जैविक गतिविधियों से उत्पन्न अनुभव या जागरूकता के रूप में देखता है। वहीं AP Framework चेतना को केवल मस्तिष्क की उपज मानकर नहीं रुकता, बल्कि यह पूछता है कि अनुभव करने वाला ‘मैं’ कौन है और वह किस केंद्र से देख रहा है। यानी विज्ञान मुख्यतः चेतना के न्यूरल आधार को देखता है, जबकि AP Framework अहंकार और उसके अनुभव की संरचना को देखता है।
(3)
मेरी आज तक की ज़िंदगी में मुझे लगता रहा कि मैं अपनी इच्छा से फैसले ले रहा हूँ, लेकिन पीछे देखता हूँ तो ज्यादातर फैसले समाज की अपेक्षाओं के हिसाब से ही लिए हैं। पढ़ाई, करियर और कई दूसरे फैसलों में मैंने यही देखा कि मेरी इच्छा से ज्यादा समाज क्या कहेगा, इसी ने दिशा तय की। अब समझ आता है कि इसे स्वतंत्र इच्छा कहना सही नहीं होगा।
(4)
मेरे अनुसार मूल बात दुःख है, क्योंकि सबसे पहले हमें इसी दुःख को देखना है। अहंकार भी एक मान्यता है, लेकिन दुःख प्रत्यक्ष अनुभव है। यह दुःख हमारी अपेक्षाओं, मान्यताओं और उनसे चिपके रहने से पैदा होता है; इसलिए वहीं से जाँच शुरू करनी चाहिए।
Purvi Nagar
चेतना अहंकार और उसके विषय से मिलकर बनती है, चेतना कोई स्वतंत्र इकाई नहीं है जिसे जाना जा सके, चेतना माध्यम है जानने का चेतना को नहीं जाना जा सकता।
विज्ञान के अनुसार चेतना कोई अलग सत्ता है जिसको जाना जा सकता है जबकि फ्रेमवर्क के अनुसार जानने वाले को ही जानना है। चेतना कोई स्वतंत्र इकाई नहीं विषय और विषयता दोनों का सम्मलित रूप ही चेतना का आधार है अगर विशेयता नहीं तो n कोई चेतना न कोई विषय
Subhash Charlewar
1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर :- AP फ्रेमवर्क के अनुसार चेतना कोई बाहर रखी हुई वस्तु नहीं है, जिसे मैं एक वैज्ञानिक की तरह बाहर से देख सकूँ। चेतना में हमेशा देखने वाला और देखी जाने वाली चीज़ होती है। सामान्यतः देखने वाला अहंकार होता है और सामने संसार, विचार, भावनाएँ, स्मृतियाँ और इच्छाएँ होती हैं।
मेरी समझ में चेतना को समझने का सही रास्ता बाहर किसी वस्तु को पकड़ना नहीं, बल्कि उस ‘मैं’ को देखना है जो देख रहा है। जब मैं अपने डर, इच्छाओं, अपेक्षाओं और अपनी बनाई हुई पहचान को ईमानदारी से देखता हूँ, तब समझ आता है कि मेरी चेतना भी अहंकार से रंगी हुई है। इसलिए वेदांत का जोर चेतना की कोई नई परिभाषा बनाने से ज्यादा द्रष्टा यानी अहंकार की जाँच और उसके विगलन पर है।
2. तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) चेतना को कैसे परिभाषित करता है और ये AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है?
उत्तर :- तंत्रिका विज्ञान सामान्यतः चेतना को मस्तिष्क और तंत्रिका-तंत्र की गतिविधियों से जुड़ी हुई घटना के रूप में देखता है। वह यह समझने की कोशिश करता है कि मस्तिष्क में कौन-सी न्यूरल गतिविधियाँ अनुभव, जागरूकता, स्मृति और अनुभूति से जुड़ी हैं। यानी विज्ञान चेतना को मुख्यतः एक ऐसी घटना मानकर अध्ययन करता है जिसे मस्तिष्क की गतिविधियों के माध्यम से समझा और मापा जा सकता है।
AP का प्रश्न इससे एक कदम पीछे जाकर है—जो मस्तिष्क और चेतना का अध्ययन कर रहा है, वह स्वयं कौन है? विज्ञान प्रायः चेतना को अध्ययन की वस्तु बनाता है, जबकि AP कहता है कि अध्ययन करने वाला भी उसी द्वैत का हिस्सा है।
मेरी समझ में दोनों का क्षेत्र अलग है। Neuroscience मस्तिष्क में होने वाली प्रक्रियाओं को समझने में उपयोगी है, जबकि AP उस ‘मैं’ की जाँच करता है जो उन प्रक्रियाओं को देखकर अपने बारे में निष्कर्ष निकाल रहा है। इसलिए AP के लिए केवल मस्तिष्क को समझ लेना दुख की जड़ को समझ लेना नहीं है।
3. आचार्य जी के अनुसार स्वतंत्र इच्छा (Free Will) क्या है? अपने जीवन से कुछ उदाहरण दीजिए जहाँ आपको लगता आप स्वतंत्र इच्छा का पालन करते हैं, क्या वाकई स्वंतंत्र होतीं हैं।
उत्तर :- पहले मुझे लगता था कि मैं स्वतंत्र हूँ क्योंकि मैं अपनी इच्छा से निर्णय लेता हूँ। लेकिन अब समझ आता है कि मेरी बहुत-सी इच्छाएँ वास्तव में मेरी पुरानी स्मृतियों, डर, पसंद-नापसंद, सामाजिक संस्कार और सुरक्षा की चाह से निकलती हैं।
उदाहरण के लिए, मैं कोई काम केवल इसलिए टाल देता हूँ क्योंकि उसमें मेहनत या असुविधा है। उस समय मुझे लगता है कि “मैंने तय किया है कि अभी नहीं करना।” लेकिन अगर ईमानदारी से देखूँ तो निर्णय मैंने स्वतंत्र होकर नहीं लिया; मेरे आलस्य और सुविधा ने निर्णय लिया और मेरी बुद्धि ने बाद में उसे सही साबित करने के लिए तर्क दे दिए।
इसी तरह कई बार हम कोई वस्तु खरीदते हैं और सोचते हैं कि यह मेरी अपनी पसंद है, जबकि उसके पीछे विज्ञापन, दूसरों से तुलना या अपनी सामाजिक छवि बनाने की इच्छा होती है।
इसलिए आचार्य जी की बात मुझे बहुत गहरी लगती है कि अहंकार अपनी मजबूरियों का गुलाम है। वास्तविक स्वतंत्रता शायद अपनी हर इच्छा पूरी करने में नहीं, बल्कि उस अहंकार को देखने और उससे मुक्त होने का चुनाव करने में है।
4. कल के बोध प्रत्युषा सत्र में आचार्य जी ने कहा कि अहंकार भी नहीं, बल्कि ‘दुख’ मौलिक होता है। आप इससे क्या समझे? संक्षिप्त में लिखिए।
उत्तर :- इस बात को मैंने ऐसे समझा कि हमारे लिए सबसे पहले प्रत्यक्ष तथ्य दुख है। हम बाद में उस दुख को समझाने के लिए “मैं”, “मेरा”, “मेरी पहचान”, “मेरी इच्छा” जैसी धारणाएँ बनाते हैं। यानी अहंकार को केवल एक अलग वस्तु मानकर पकड़ना पर्याप्त नहीं है; देखना यह है कि जिस ‘मैं’ को मैं अपना अस्तित्व मानता हूँ, उसकी पूरी संरचना दुख और असंतोष से जुड़ी हुई है।
जैसे मुझे किसी से अपेक्षा होती है कि वह मेरी बात माने। जब वह नहीं मानता तो दुख होता है। फिर मैं कहता हूँ, “उसने मेरा अपमान किया”, “मेरे साथ गलत हुआ।” यहाँ दुख पहले दिखाई देता है और उसके चारों ओर अहंकार अपनी कहानी खड़ी कर देता है।
इसलिए मेरे लिए इसका सार है—दुख को ईमानदारी से देखना ही अहंकार को देखने की शुरुआत है। दुख से भागने या उसका कारण बाहर खोजने के बजाय यह देखना कि दुख किस ‘मैं’ को हो रहा है, यही आत्म-परीक्षण है।
Kriti
🔥बोधकार्य | 4 Oct 2026🔥1. AP फ्रेमवर्क में चेतना की परिभाषा:
AP फ्रेमवर्क के अनुसार चेतना केवल मस्तिष्क की गतिविधि नहीं है। चेतना में द्रष्टा (अहंकार) और दृश्य दोनों शामिल हैं। इसलिए चेतना को समझने के लिए स्वयं ‘मैं’ को समझना आवश्यक है।
2. Neuroscience और AP फ्रेमवर्क में अंतर:
Neuroscience चेतना को मुख्यतः मस्तिष्क की जैविक और तंत्रिका संबंधी गतिविधियों का परिणाम मानता है। वहीं AP फ्रेमवर्क चेतना के साथ-साथ उस ‘मैं’ की जाँच करता है जो अनुभव कर रहा है।
3. स्वतंत्र इच्छा:
आचार्य जी के अनुसार अहंकार अपने डर, इच्छाओं और मजबूरियों से बंधा होता है, इसलिए उसके अधिकांश निर्णय पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होते। जैसे मैं पढ़ाई करने का निर्णय अपनी इच्छा से लेता हूँ, लेकिन अच्छे अंक पाने की इच्छा और असफल होने का डर भी मुझे प्रभावित करते हैं। वास्तविक स्वतंत्रता अपने अहंकार को पहचानकर उससे मुक्त होने का चुनाव करना है।
4. ‘दुख’ मौलिक क्यों है?
मैंने समझा कि अहंकार अपनी पहचान और इच्छाओं के माध्यम से दुख से बचने की कोशिश करता है। इसलिए दुख को समझना और उसके कारण को देखना अहंकार को समझने की दिशा में पहला कदम है।
Preeti jhariya
1. AP Framework के अनुसार चेतना कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है, जिसे बाहर से देखकर या मापकर जाना जा सके। चेतना हमेशा द्रष्टा और दृश्य, विषयी और विषय के द्वैत में प्रकट होती है।
हम जिसे चेतना कहते हैं, उसमें विचार, भावनाएँ, स्मृतियाँ, इच्छाएँ और डर जैसी चेतना की सामग्री होती है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के एक छोर पर अहंकार यानी ‘मैं’ बैठा है, जो अपने शरीर, इच्छाओं और आत्म-संरक्षण के आधार पर संसार को देखता है।
इसलिए चेतना का अध्ययन केवल बाहर की वस्तुओं को देखने से पूरा नहीं हो सकता। जिस ‘मैं’ के माध्यम से देखा जा रहा है, उसी ‘मैं’ को देखना और परखना आवश्यक है। अहंकार जितना क्षीण होता जाता है, चेतना की वास्तविकता की ओर उतना ही बढ़ते हैं।
2.
Neuroscience सामान्यतः चेतना को मस्तिष्क और तंत्रिका-तंत्र की गतिविधियों से जुड़ी अवस्था के रूप में समझता है। वह यह देखने का प्रयास करता है कि मस्तिष्क में कौन-सी जैविक प्रक्रियाएँ जागरूकता, अनुभव, स्मृति, भावनाओं और निर्णयों से जुड़ी हैं।
AP Framework का दृष्टिकोण इससे अलग है। AP के अनुसार विज्ञान चेतना को एक Object की तरह देखने की कोशिश करता है, जबकि देखने और अध्ययन करने वाला Subject स्वयं चेतना के भीतर है।
अर्थात Neuroscience मुख्यतः पूछता है—“चेतना मस्तिष्क में कैसे उत्पन्न होती है?”
AP Framework पूछता है—“चेतना को जानने वाला ‘मैं’ कौन है और वह किस स्थिति से देख रहा है?”
इसलिए AP Framework में केवल मस्तिष्क की गतिविधियों को समझ लेना दुख के मूल को समझ लेना नहीं है; दुखी अहंकार की जाँच आवश्यक है।
3.
आचार्य जी के अनुसार सामान्यतः जिसे हम Free Will कहते हैं, वह वास्तव में अहंकार की अपनी मजबूरियों, इच्छाओं, डर और आत्म-संरक्षण से निकला हुआ निर्णय होता है।
उदाहरण के लिए, मैं यह सोचूँ कि “मैं यह नौकरी इसलिए कर रही हूँ क्योंकि यह मेरी स्वतंत्र पसंद है।” लेकिन यदि भीतर से मेरी पसंद पैसे की जरूरत, समाज की स्वीकृति, असुरक्षा या भविष्य के डर से संचालित है, तो यह पूरी तरह स्वतंत्र निर्णय नहीं है।
इसी तरह हम रिश्तों, करियर, खरीदारी या अपनी छवि से जुड़े बहुत-से निर्णयों को अपनी पसंद मानते हैं, जबकि उनके पीछे कोई न कोई कामना या भय सक्रिय होता है।
AP के अनुसार वास्तविक स्वतंत्रता तब है जब अहंकार अपनी ही गुलामी को देख सके और अपने अहंकार के विगलन को चुन सके। यानी स्वतंत्र इच्छा का सर्वोच्च उपयोग स्वयं को मजबूत करने में नहीं, बल्कि उस ‘मैं’ की पकड़ को कम करने में है जो लगातार अपनी सुरक्षा और संतुष्टि चाहता है।
4.
इस कथन को मैं ऐसे समझता हूँ कि अहंकार को केवल एक अलग, स्वतंत्र सत्ता मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। मूल समस्या दुख है।
जहाँ दुख है, वहाँ उससे बचने, उसे मिटाने या उससे सुख पाने की कोशिश में एक ‘मैं’ खड़ा होता है। वही अपने लिए पहचान, इच्छाएँ, डर और कहानियाँ बनाता है। इस तरह अहंकार और दुख को अलग-अलग चीज़ों की तरह देखने के बजाय समझना है कि दुख ही अहंकार की पूरी गतिविधि का आधार बनता है।
इसलिए वेदांत का उद्देश्य अहंकार को कोई नया रूप देना नहीं, बल्कि दुख के मूल को देखना और उस पूरी अहंकारी संरचना को समझकर उससे मुक्त होना है।
Sunita
1️⃣. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है? अपने शब्दों में लिखिए।
🌿🌿* AP फ्रेमवर्क में चेतना को समझना वास्तव में अपने ही अहंकार और उसकी बनाई हुई दुनिया को समझना है।*
फ्रेमवर्क के अनुसार चेतना कोई बाहर रखी हुई वस्तु नहीं है, जिसे अहंकार एक वैज्ञानिक वस्तु की तरह देखकर माप सके। सामान्यतः हम चेतना को विचार, भावना, स्मृति, इच्छा और अनुभवों का नाम मान लेते हैं, लेकिन ये चेतना की सामग्री हैं।
चेतना में हमेशा एक द्रष्टा और दृश्य, यानी विषय और विषयी का द्वैत होता है। इसीलिए चेतना को समझने के लिए केवल बाहर की दुनिया को देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस ‘मैं’ को देखना जरूरी है जो देख रहा है। जब ईमानदारी से अपने डर, इच्छाओं, पहचानों और धारणाओं को देखा जाता है, तो अहंकार की पकड़ ढीली पड़ने लगती है।
2️⃣तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) चेतना को कैसे परिभाषित करता है और ये AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है?
🌿🌿तंत्रिका विज्ञान सामान्यतः चेतना को मस्तिष्क की जैविक गतिविधियों से उत्पन्न अनुभव और जागरूकता के रूप में समझता है। वह यह जानने का प्रयास करता है कि मस्तिष्क के कौन-से हिस्से, न्यूरॉन्स और तंत्रिका-प्रक्रियाएँ हमारे अनुभव, विचार, भावनाएँ और जागरूकता से जुड़ी हैं। यानी विज्ञान चेतना को मुख्यतः तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से अध्ययन करने योग्य घटना मानता है।
इसके विपरीत AP फ्रेमवर्क पूछता है कि जिस व्यक्ति के मस्तिष्क और चेतना का अध्ययन किया जा रहा है, वह स्वयं कौन है? विज्ञान चेतना को एक Object की तरह देखता है, जबकि AP उस Subject यानी ‘मैं’ की जाँच पर जोर देता है जो अनुभव कर रहा है और प्रश्न पूछ रहा है।
इसलिए AP फ्रेमवर्क के अनुसार केवल मस्तिष्क की गतिविधियों को समझ लेने से उस अहंकार और उसके दुख की जड़ नहीं समझी जाती।
3️⃣आचार्य जी के अनुसार स्वतंत्र इच्छा (Free Will) क्या है? अपने जीवन से कुछ उदाहरण दीजिए जहाँ आपको लगता आप स्वतंत्र इच्छा का पालन करते हैं, क्या वाकई स्वंतंत्र होतीं है।
🌿🌿आचार्य जी के अनुसार सामान्यतः जिसे हम स्वतंत्र इच्छा कहते हैं, वह वास्तव में बहुत बार हमारी इच्छाओं, डर, आदतों, स्मृतियों और आत्म-सुरक्षा की मजबूरियों से निकलती है।
हमे लगता है कि हम स्वतंत्र होकर अपना कोई निर्णय ले रहे हैं, लेकिन यदि मैं अपने निर्णय को ईमानदारी से देखूँ तो पता चलता है कि उसके पीछे कोई डर, लालच, तुलना, प्रतिष्ठा या पुरानी आदत काम कर रही होती है।
उदाहरण के लिए, यदि मैं पढ़ाई इसलिए कर रही हूँ कि मुझे वास्तव में ज्ञान चाहिए, तो एक बात है; लेकिन यदि मैं केवल इसलिए पढ़ रही हूँ कि दूसरे मुझसे आगे न निकल जाएँ या लोग मुझे असफल न समझें, तो मेरा निर्णय स्वतंत्र नहीं है।
🪞इसलिए अहंकार के रहते हमारी स्वतंत्रता बहुत सीमित है। *आचार्य जी के अनुसार वास्तविक स्वतंत्रता उस क्षण में दिखाई देती है जब व्यक्ति अपनी ही मजबूरियों को देख पाता है और अहंकार के विगलन की दिशा चुनता है।*
4️⃣कल के बोध प्रत्युषा सत्र में आचार्य जी ने कहा कि अहंकार भी नहीं, बल्कि ‘दुख’ मौलिक होता है। आप इससे क्या समझे? संक्षिप्त में लिखिए।
🌿🌿सत्र से मैं यह समझ पायी कि अहंकार को केवल एक अलग वस्तु या स्थायी सत्ता मानना सही नहीं है। अहंकार साधन है, दुख साध्य (अनुभूति) है: अहंकार दुख को उत्पन्न करने वाला एक माध्यम या जड़ कारण हो सकता है, परंतु मनुष्य जिस वास्तविकता को सीधे तौर पर भोगता और अनुभव करता है, वह दुख ही है।
हमारे जीवन की शुरुआत ही असुरक्षा, अधूरापन और पीड़ा के अहसास के साथ होती है। यही मौलिक दुख मनुष्य को जीवन की खोज और मुक्ति की ओर प्रेरित करता है। जब हम यह स्वीकार करते हैं कि दुख हमारा मौलिक स्वभाव नहीं है बल्कि एक विसंगति है, तभी हम इसके समाधान की वास्तविक तलाश शुरू कर पाते हैं।
संक्षेप में, अहंकार स्वयं में कोई अंतिम बुराई नहीं है, बल्कि वह उस गहरे और मौलिक दुख का लक्षण मात्र है जिससे हर जीव मुक्ति पाना चाहता है।
✊ इसलिए मुक्ति का अर्थ अहंकार को किसी नई पहचान से बदलना नहीं, बल्कि उस दुख को सीधे देखना है जिसके कारण अहंकार लगातार खुद को बनाए रखता है।
Madhavi sahu
1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है? अपने शब्दों में लिखिए।
एपी फ्रेमवर्क के अनुसार चेतना का मतलब ही है द्वैत। जिसमें एक तरफ अहंकार होता है तो दूसरे छोर में संसार। एक छोर में दृष्टा और दूसरे छोर पर दृश्य। चेतना कोई बाहर रखी हुई वस्तु नहीं है।
2. तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) चेतना को कैसे परिभाषित करता है और ये AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है?
Neuroscience चेतना को मस्तिष्क की गतिविधियों से जोड़कर अध्ययन करता है। उदाहरण के लिए, नींद, एनेस्थीसिया, कोमा और जागृत अवस्था में मस्तिष्क की गतिविधियों में होने वाले बदलावों का अध्ययन करके वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करते हैं कि कौन-सी neural processes conscious experience के साथ जुड़ी हैं।
जिस मस्तिष्क को मैं जान रहा हूँ, उस मस्तिष्क को जानने वाला कौन है?
मान लीजिए MRI में आपके मस्तिष्क की गतिविधि दिखाई जा रही है।
वहाँ तीन चीजें हैं:
मस्तिष्क की गतिविधि → वैज्ञानिक उसे देख रहा है → वह गतिविधि जानी जा रही है।
वेदान्त कहेगा कि जो कुछ जाना जा सकता है, वह ज्ञेय है।
विचार, भावना, शरीर और मस्तिष्क—सब किसी न किसी अर्थ में ज्ञात हैं।
तब प्रश्न आता है:
ज्ञाता क्या है?
यहीं वेदान्त की चेतना की अवधारणा Neuroscience से अलग हो जाती है।
3. आचार्य जी के अनुसार स्वतंत्र इच्छा (Free Will) क्या है? अपने जीवन से कुछ उदाहरण दीजिए जहाँ आपको लगता आप स्वतंत्र इच्छा का पालन करते हैं, क्या वाकई स्वंतंत्र होतीं हैं।
आचार्य जी के अनुसार जो स्वतंत्र इच्छा है, वह भी हमारे कामनाओं, डर और कंडीशनिंग का परिणाम होती है। जो कि शरीर, समाज और संयोग से आती है। कहीं ना कहीं हमारी स्वतंत्र इच्छा, स्वतंत्र नहीं होती बल्कि इन तीनों से प्रभावित होती है।
मैंने जब सीजीपीएससी एग्जाम की तैयारी करने का निर्णय लिया तो मुझे ऐसा लग रहा था यह मेरी स्वतंत्र इच्छा है लेकिन वास्तव में देखूं तो यह समाज द्वारा, परिवार द्वारा मुझ पर थोपी गई थी जिसे मैंने अपना मानकर अपनी स्वतंत्र इच्छा का टैग, उस पर लगा दिया था।
4. कल के बोध प्रत्युषा सत्र में आचार्य जी ने कहा कि अहंकार भी नहीं, बल्कि ‘दुख’ मौलिक होता है। आप इससे क्या समझे? संक्षिप्त में लिखिए।
अहंकार नहीं, दुख मौलिक होता है। दुख और बेचैनी हमारे भीतर हमेशा बनी रहती है। हम कोई कामना करते हैं, उसे पूरा करने की कोशिश करते हैं। वह पूरी हो जाती है। क्षणिक सुख मिलता है और फिर वही बेचैनी लौट आती है। इससे यही समझ आता है की दुख का ही थोड़ा सा कम हो जाना सुख कहलाता है। हम जो भी करते हैं, वह अपने दुख को कम करने के लिए ही करते हैं।
Dipa Yadav
1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है? अपने शब्दों में लिखिए।
दस तो मानी गई हैं इंद्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ।
और उसके अलावा होता है अन्तःकरण।
अन्तःकरण क्या?
अन्तःकरण चतुष्टय, जिसमें चार आते हैं।
कौन से चार?
जो अंदर के हैं।
इन्द्रियाँ वो, जो सीधे-सीधे बाह्य जगत से संपर्क रखती हैं। और अन्तःकरण चतुष्टय में वो आते हैं चार जो अंदर-अंदर बैठे हैं, जो सीधा संबंध नहीं रखते हैं बाहरी जगत से। वो चार है।
मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार।
2. तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) चेतना को कैसे परिभाषित करता है और ये AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है?
तंत्रिका (Nerve/Nervous System) हमारे शरीर और मस्तिष्क के बीच संदेशों का आदान-प्रदान करके चेतना (Consciousness) और जागरूकता को नियंत्रित करती है।
3. आचार्य जी के अनुसार स्वतंत्र इच्छा (Free Will) क्या है? अपने जीवन से कुछ उदाहरण दीजिए जहाँ आपको लगता आप स्वतंत्र इच्छा का पालन करते हैं, क्या वाकई स्वंतंत्र होतीं हैं।
स्वतंत्र इच्छा जो हमारे चेतना तल से आती है हमारी बोध से हमारी समझ से आती आती है किसी के दबाव में नहीं।
स्वतंत्र इच्छा केवल एक ही क्षण में संभव है; जब अहंकार स्वयं अपने विगलन में हो।
SUDHIR VERMA
इन चारों प्रश्नों को AP फ्रेमवर्क की भाषा में, लेकिन अपने शब्दों में इस तरह लिखा जा सकता है:
1. AP फ्रेमवर्क में चेतना क्या है?
मेरी समझ में चेतना केवल जागे होने या आसपास की चीज़ों को महसूस करने का नाम नहीं है। चेतना वह क्षमता है जिसमें मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं, इच्छाओं, धारणाओं और अपने ही अहंकार को देख और जाँच सकता है।
AP फ्रेमवर्क में चेतना का वास्तविक अर्थ बोध से जुड़ता है—यानी यह देख पाना कि मैं जैसा सोच रहा हूँ, वैसा सोचने के पीछे मेरी conditioning, इच्छाएँ और अहंकार कैसे काम कर रहे हैं। चेतना जितनी स्पष्ट होती है, व्यक्ति उतना ही अपने बंधनों को पहचानकर सत्य की ओर बढ़ सकता है।
2. Neuroscience में चेतना क्या है और AP से कैसे अलग है?
Neuroscience में चेतना को सामान्यतः मस्तिष्क की वह अवस्था/क्षमता माना जाता है जिसमें व्यक्ति को अपने और अपने आसपास के अनुभवों का subjective awareness होता है—जैसे दर्द महसूस करना, किसी आवाज़ को सुनना, अपने विचारों का अनुभव होना आदि। विज्ञान इसका संबंध मस्तिष्क की neural activity और विभिन्न brain networks से खोजता है।
अंतर यह है कि Neuroscience मुख्यतः यह पूछता है कि चेतना मस्तिष्क में कैसे उत्पन्न होती है और उसके neural mechanisms क्या हैं, जबकि AP का प्रश्न अधिक अस्तित्वगत है—चेतना का उपयोग करके मैं अपने बंधन, अहंकार और दुख को कैसे देखूँ और उनसे मुक्त कैसे होऊँ?
अर्थात विज्ञान चेतना को मुख्यतः एक अनुभव/मस्तिष्कीय प्रक्रिया के रूप में देखता है, जबकि AP में चेतना बोध और मुक्ति की संभावना से जुड़ती है।
3. आचार्य जी के अनुसार Free Will क्या है?
AP के अनुसार जिसे हम सामान्यतः स्वतंत्र इच्छा कहते हैं, वह अक्सर वास्तव में स्वतंत्र नहीं होती। मेरी इच्छा मेरे संस्कारों, स्मृतियों, conditioning, डर, लालच, सामाजिक प्रभाव और सुख की चाह से पैदा होती है। इसलिए मुझे लगता है कि “मैंने अपनी इच्छा से चुना”, जबकि उस चुनाव के पीछे बहुत-सी ऐसी चीज़ें काम कर रही होती हैं जिन्हें मैंने स्वयं चुना ही नहीं।
उदाहरण के लिए:
मुझे कोई वस्तु इसलिए पसंद आती है क्योंकि समाज और विज्ञापन ने उसके प्रति आकर्षण पैदा किया।
मैं किसी व्यक्ति को पसंद या नापसंद करता हूँ क्योंकि उसके बारे में मेरी पुरानी धारणा बनी हुई है।
मैं कोई निर्णय इसलिए लेता हूँ क्योंकि मुझे प्रशंसा, सुरक्षा या सम्मान चाहिए।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि मैंने स्वतंत्र होकर कोई बात कही, लेकिन बाद में देखता हूँ कि वह मेरे पुराने संस्कार या अहंकार की प्रतिक्रिया थी।
इसलिए चुनाव होना और स्वतंत्र चुनाव होना अलग बातें हैं। जब तक मैं अपनी conditioning और इच्छाओं को देख नहीं रहा, तब तक मेरी इच्छा की स्वतंत्रता बहुत सीमित है। वास्तविक स्वतंत्रता शायद इच्छा के अनुसार चलने में नहीं, बल्कि इच्छा को स्पष्ट रूप से देख पाने में है।
4. “अहंकार भी नहीं, बल्कि दुख मौलिक होता है”—इससे क्या समझा?
मैं इसे इस तरह समझता हूँ कि मनुष्य के भीतर सबसे पहले कोई अलग से बैठा हुआ “अहंकार” नहीं है, जिसे बाद में दुख पैदा होता है। बल्कि जीवन में जो दुख, असंतोष, असुरक्षा और अपूर्णता है, उससे बचने और उसे समाप्त करने की कोशिश में “मैं” की भावना मजबूत होती जाती है।
यानी दुख से बचने के लिए मन कहता है—“मुझे यह चाहिए”, “मुझे यह नहीं चाहिए”, “मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ”, “मैं ऐसा बनूँगा”—और इसी प्रक्रिया में अहंकार की संरचना मजबूत होती जाती है।
इसलिए मूल समस्या केवल “मेरा अहंकार” नहीं, बल्कि उस दुख को देखना है जिसके कारण मन लगातार किसी सहारे, पहचान, सुख या सुरक्षा की तलाश करता रहता है। दुख को ठीक से देखना ही शायद अहंकार की जड़ को देखने की शुरुआत है।