🪔बोध कार्य🪔 1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है? 💡AP फ्रेमवर्क के अनुसार चेतना…
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Chanchal Thakur
🪔बोध कार्य🪔
1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है?
💡AP फ्रेमवर्क के अनुसार चेतना कोई बाहर रखी हुई वस्तु नहीं है, जिसे अहंकार एक वैज्ञानिक वस्तु की तरह देखकर माप सके। सामान्यतः हम चेतना को विचार, भावना, स्मृति, इच्छा और अनुभवों का नाम मान लेते हैं, लेकिन ये चेतना की सामग्री हैं।
चेतना में हमेशा एक द्रष्टा और दृश्य, यानी विषय और विषयी का द्वैत होता है। इसीलिए चेतना को समझने के लिए केवल बाहर की दुनिया को देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि…
1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है? अपने शब्दों में लिखिए।
AP framework चेतना द्वैतवादी है बिना द्वैत के चेतना नहीं हो सकती यह दृष्टा है जो अनुभव करता हैं विचार, भावनाएं, स्मृति और इच्छा चेतना की सामग्री है खुद चेतना नहीं
2. तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) चेतना को कैसे परिभाषित करता है और ये AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है? विज्ञान में चेतना को ऑब्जेक्ट की तरह देखते हैं पर Ap फ्रेमवर्क चेतना को यानि मैं को सब्जेक्ट की तरह देखते है
3. आचार्य जी के अनुसार स्वतंत्र इच्छा (Free Will) क्या है? अपने जीवन से कुछ उदाहरण दीजिए जहाँ आपको लगता आप स्वतंत्र इच्छा का पालन करते हैं, क्या वाकई स्वंतंत्र होतीं हैं।
मै गुस्सा हु मैं सफ़ल हुं जैसे अभी मुझे लगता हैं मैं अपने फैसले खुद ले रही हूं पर जब गुस्सा आता हैं या रोना आता हैं तब मुझे लगता हैं मैने किया पर ये स्वतंत्र नहीं है क्यूंकि कोई भी आकर आपको हिला कर चला जाए शब्दों से ही तो ये गुलामी की निशानी हैं स्वतंत्रता की नहीं
4. कल के बोध प्रत्युषा सत्र में आचार्य जी ने कहा कि अहंकार भी नहीं, बल्कि ‘दुख’ मौलिक होता है। आप इससे क्या समझे? संक्षिप्त में
लिखिए। दुख पहले होता हैं जब भी कुछ चाहिए होता हैं उदाहरण के लिए दूसरों से सम्मान और ना मिले तो दुख होता हैं अहंकार खुद को बचाने के लिए दोष दूसरों पर डाल देता हैं खुद को देखना ही मुक्ति की तरफ ले जाएगा अपने दुख को देखने से ही हम अपने दुख से मुक्त हो सकते हैं
Rajni Singh
Pooja Kumaari
अहंकार कामना के विषय को ही सब कुछ मानता है।
anu
आप इन फोटो को कैसे बनाती है कृपया मुझे भी बताइए।🙏🙏
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Kashyap payal Payal
ye anhankar mai hu to is mai galat kya h maff kiziyega mai smjhna chahiye rhi ki mujse jb bechaini dukh milti h to mai bs chain shanti chahti hu ,maine acharya ji se suna h lekin smjh nhi ata anhankar m galt kya h agr m hu to ,or mai bs dekhti hu khud ko ki kaha mai khud ko bachati hu kisi se jurna chahti hu jo v ho taki akele na rhu lekin dikkat h kya hmko kuch chahiye to mtlb anhankar kya.
Rutva
1. AP फ्रेमवर्क चेतना को कैसे परिभाषित करता है? अपने शब्दों में लिखिए।
चेतना एक दर्शक और दृष्टा, अर्थात् विषय और विषयी के संबंध की दृष्टि है। इस द्वैत को ही चेतना कहा जाता है। AP फ्रेमवर्क में चेतना केवल विषय या उसके भीतर मौजूद सामग्री नहीं है, बल्कि उस सामग्री को देखने और उसका अर्थ निकालने वाली दृष्टि भी है।
2. तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) चेतना को कैसे परिभाषित करता है और यह AP फ्रेमवर्क से कैसे अलग है?
तंत्रिका विज्ञान चेतना को मुख्यतः ऐसी घटना मानता है जिसमें मस्तिष्क और तंत्रिका-तंत्र के माध्यम से उत्पन्न अनुभवों का व्यक्ति द्वारा अर्थ-निर्धारण या व्याख्या की जाती है। जबकि AP फ्रेमवर्क का ध्यान उस विषय पर नहीं, बल्कि उस दृष्टि पर केंद्रित होता है जो उस विषय का अर्थ-निर्धारण या व्याख्या करती है।
3. आचार्य जी के अनुसार स्वतंत्र इच्छा (Free Will) क्या है? अपने जीवन से कुछ उदाहरण दीजिए जहाँ आपको लगता है कि आप स्वतंत्र इच्छा का पालन करते हैं। क्या वास्तव में वे इच्छाएँ स्वतंत्र होती हैं?
सामाजिक परिस्थितियों, सिखाई गई मान्यताओं, विचारों, स्मृतियों आदि से उत्पन्न होने वाली इच्छा को स्वतंत्र इच्छा नहीं कहा जा सकता। इनके प्रभाव से मुक्त होकर जो इच्छा उठती है, वही स्वतंत्र इच्छा के अधिक निकट है।
मेरे जीवन में पहले मुझे लगता था कि पढ़ाई करके घर की महिलाओं की तरह जीवन न जीना मेरी स्वतंत्र इच्छा है। लेकिन अब मुझे लगता है कि यह भी मेरी परिस्थितियों और अपनी स्थिति से उत्पन्न हुई एक इच्छा हो सकती है। जब किसी स्थिति में दुख या पीड़ा का अनुभव होता है, तो स्वाभाविक रूप से व्यक्ति उसका समाधान खोजने का प्रयास करता है। इसी प्रकार आचार्य प्रशांत को सुनना भी मेरे जीवन में पहले से मौजूद conditioning से प्रभावित हो सकता है। इसलिए अब मैं समझती हूँ कि हमारी इच्छाओं के पीछे की नीयत और उनकी दिशा को देखना अधिक महत्वपूर्ण है।
4. कल के बोध-प्रत्युषा सत्र में आचार्य जी ने कहा कि अहंकार नहीं, बल्कि ‘दुःख’ मौलिक होता है। आप इससे क्या समझे? संक्षिप्त में लिखिए।
मैंने इससे यह समझा कि दुःख और बेचैनी की तड़प ही हमें भीतर देखने और सत्य को खोजने के लिए प्रेरित करती है। यदि जीवन में दुःख या बेचैनी का अनुभव ही न हो, तो हमें अध्यात्म की आवश्यकता क्यों महसूस होगी? इसलिए दुःख केवल एक समस्या नहीं है; वह हमें अपनी स्थिति को समझने और उससे मुक्त होने की दिशा में देखने का अवसर भी देता है।
Seema Kumari
अहंकार ऐसा बेहोश होता है कि वो विषय में इस तरीके से चिपक कर लिप्त हो जाता है की वह विषय को ही अपना सब कुछ मान लेता है । अहंकार को न जाने क्यों नए-नए अनुभव में यानी खुद को पूर्णता भूल जाने में या फिर किसी विषय से दूर हो जाने में इतना डर क्यों लगता है । क्योंकि वह बेहोश है , लेकिन उसकी मूलवृति ही यही है कि अहंकार खुद को भूलकर आत्मा में लिप्त हो जाना ।