
✍🏻 पोस्ट 2 | 31 अगस्त '26 💭 विषय — विश्व दर्शन ────────── 🗿 मूर्ति सामने है, पर नज़र कहाँ है? 🛕 कोई द्वारका जा रहा है, कोई काशी, कोई मथुरा। निर्गुण संत दादू दयाल बाहरी धार्मिक आडंबर और कर्मकांड पर प्रश्न उठाते हुए खोज को भीतर की ओर मोड़ते हैं। 📖 मूर्ति और बाहरी खोज को लेकर उनकी वाणी काफ़ी सीधी है : "जिन कंकर-पत्थर सेविया, सो अपना मूल गँवाय। अलख देव अन्तर बसे, क्या दूजी जगह जाय॥" और आगे, *"दादू क…











































