
Geeta Bhanushali
सामने रखी मूरत है, पर ध्यान तुम्हारा कहाँ अटका? ईश्वर को बाहर ढूँढ रहे, यह खेल बना सब मन का। काशी-मथुरा दौड़ रहे सब, पत्थर में रब पाते हैं, पर जो साहिब भीतर बैठा, उसको देख न पाते हैं। मूर्ति तो बस एक दर्पण है, खुद का सच दिखलाने को, पर हम शीशे को पूज रहे, खुद को छुपाने, बचाने को। 'मैं भक्त हूँ' या 'मैं ज्ञानी हूँ', अहंकार के रूप हज़ार, बाहर की इस दौड़ को छोड़ो, भीतर झाँको एक बार। जो साधन तुम्हें तुमसे मिला दे, वही सच्चा आधार है, बाकी सब तो बस…















