
Dr.swati Dubey
आचार्य जी के ये विचार और दर्शन जो मूर्ति को लेकर हैं इन्हे जानने से पहले मैं मूर्ति पूजन के विरोध में रहती थी, लेकिन अब मुझे समझ आया मूर्ति पूजन का सही अर्थ कि कोई भी मूर्त रूप जो तुम्हे अंतस की ओर मुड़ कर देखने के लिए हो, कोई भी मूर्ति अगर अहंकार के विगलन का माध्यम बने तो फिर मूर्ति पूजन भी जीवन में उपयोगी हो सकती हैं. मूर्त को पकड़ने की नीयत अपनी उच्चतम की ओर बढ़ने की होनी चाहिए. बहुत बहुत धन्यवाद आचार्य जी, अगर मैं आपसे नहीं जुड़ती तो जीवन मूर्ति…















