
मैं मूर्ति के सामने जाकर निःशब्द रह जाती थी। मन मे यही भाव आता था कि जब आप सर्वज्ञ हो तो आपसे क्या मांगू? हां! तुलसीदास जी की यह चौपाई जरूर मन में आती था कि- जेहि विधि होय नाथ हित मोरा, करहु सो बेगि दास मै तोरा। पर अब समझ में आता है की कुछ ना मांगने का भी अहंकार रहता ही था।
















