✍🏻 पोस्ट 10 | 10 अगस्त '26💭 विषय — विश्व दर्शन──────────
🕉️ "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो"
📖 यह मंत्र मुण्डक उपनिषद् 3.2.4 में आता है। इसका शाब्दिक अर्थ है:
“यह आत्मा बलहीन द्वारा प्राप्त नहीं होती।”
⚠️ ध्यान रहे, यह चार पारंपरिक महावाक्यों में से एक नहीं है। लेकिन आत्मा और उसे जानने के मार्ग पर उपनिषद् की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घोषणा है।
❓ लेकिन पहले एक और कठिन प्रश्न है:
आत्म क्या है?
जिसके बारे में “यह है” कहकर कुछ कह देना ही उ…
Self-knowledge is the key. Through AP's teachings I learnt to examine myself honestly, and that helped me knowing my own mistakes, the borrowed beliefs that I was carrying without realisation, it helped me drop a lot of weight I didn't even know I was carrying and understood these were the root of my sufferings. And I have to keep doing this Self examine, So whenever it becomes clear that what I am trying to protect as 'me' , I won't feed it or protect it anymore and will look beyond it.
रजनी सिंह
आज अगर सांप दिखाई दे की जिससे मैं, मैं ,कह कर बचा रही हूं वही मेरे अधूरेपन का जड़ है तो मैं उसे बचाऊंगी नहीं उसके पर देखने की शक्ति रखूंगी कोशिश करूंगी
Rekha
आचार्य जी से समझ आया कि अपने अहंकार और पुरानी मान्यताओं को पकड़े रहना ही बंधन है। सच्ची आज़ादी तब है, जब मैं इस झूठे “मैं” को पहचानकर उससे आगे बढ़ूँ।
Shashi
मै को नही बचाएगी ।उसके पार देखने की
लगातार कोशिश करूगी ।
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Sujan Singh
आचार्य जी प्रणाम
आत्मा को पाया नहीं जा सकता बल हीन के पास आत्मा हो नहीं सकता
Neha
पार देखने का बल चाहिए। यहीं असली काम होता है, जिससे कई चूक रही हूँ।
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Sonu saini
देखना ही समस्या का निदान हैं।
KIRAN
मैं को लगातर देखते रहना ही बल पाना है
Ranjana yadav
जहाँ डर होता है वहां अंहकार होता है और जहाँ डर नही होता वहां सौंदर्य होता हैं।।
Vidya
जब तक हम अंदर से मजबूत नही होंगे । तब तक हम बाहर से बल पैदा नही पायेगा।
vivek Mishra
आत्म से शुरू होकर अनंत तक आत्मा का विस्तार है। आज इस पोस्ट से वास्तव में समझ आया कि आत्मा आत्म को जानने का ही दूसरा नाम है। जैसे जैसे आत्म को जानते हुए अहंकार विगलित होता जाता है, उसी के अनुपात में आत्मा अपने विस्तृत रूप में फलित होती जाती है। हम आत्मा के उतने ही अस्तित्व से मिल पाते हैं, जितना अपने अहंकार को गला पाते हैं। धन्यवाद आचार्य जी🙏🙏
MaNorama Vyas
सच्चा बल तब है जब मुझे दिख जाए कि मेरा अहंकार ही मेरे अधूरेपन और बंधन की जड़ है, फिर भी मैं उसकी छवि, सुविधा और मान्यता को बचाने में न लगूँ।
आत्मा कोई उपलब्धि नहीं है।
बल्कि अपने झूठे “मैं” को पहचानकर उससे आगे देखने का साहस ही साधना है।
DINESH KUMAR
बहुत जोर लगाना पड़ता है खुद की छवि, खुद की पहचान, और खुद की मान्यता का झूठ देखने में और छोड़ने में।
Ladli Kumari
आज दिनभर मैं इस बचाव को देखूँगी। और रिपोर्ट कार्ड रात में साझा करूंगी । कल तो औसत से नीचे रही रिपोर्ट।
Lovely Singh
“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो” का सीधा संकेत यह है कि आत्मज्ञान कमजोर मन से नहीं मिलता। यहाँ बल का अर्थ शरीर की शक्ति नहीं, बल्कि विवेक, साहस और सत्य के प्रति अडिग रहने की शक्ति है।
हम अक्सर अपने भीतर के डर, मोह, इच्छाओं और सामाजिक मान्यताओं के आगे झुक जाते हैं। हमें सत्य दिखाई भी दे जाए, फिर भी अहंकार कहता है—“अभी नहीं, बाद में।” यही हमारी कमजोरी है।
आध्यात्मिक यात्रा में असली बल यह है कि:
जो असत्य है, उसे असत्य देखने का साहस हो।
अपनी गलत धारणाओं को छोड़ने की ताकत हो।
सुख-सुविधा के लिए सत्य से समझौता न करें।
मन की हर इच्छा को आदेश मानना बंद करें।
बाहरी सहारे के बजाय अपने भीतर विवेक को मजबूत करें।
“मैं कौन हूँ?” इस प्रश्न से भागें नहीं।
आत्मा कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे कहीं बाहर जाकर प्राप्त करना है। बल्कि अज्ञान और अहंकार के पर्दे हटने पर जो सत्य बचता है, उसी को जानना आत्मज्ञान की दिशा है।
इसलिए इस मंत्र की सीख मेरे लिए यह है:
कमज़ोरी यह नहीं कि शरीर कमजोर है; असली कमजोरी यह है कि सत्य सामने होते हुए भी हम अपने अहंकार, मोह और डर के साथ खड़े रहते हैं। सत्य के पक्ष में अपने ही झूठ के विरुद्ध खड़े हो जाना।
Arnab Mandal
ma mera adhura pan ko katam karne ka kousis karenge or usa par dakh na ka bal paunga or asahi ma mera adhura pan ko khatam karunga
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Akshay
इतना सब कुछ सुनकर भी अहंकार कहता है मुझे समझ आ गया और फिर परिस्थिति, मजबूरी का रोना बहाना बनाकर गिर जैसा था वैसा ही जीने लगता है
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Hempal meena
मुझे यहां सबसे रोचक बात यह लगी कि मेरे पास नीयत नहीं है, मेरी नीयत में ही खोट है।मुझे पता तो लग जाता है कि मैं जो पहले किया था वहीं गलती फिर से दोहरा रहा हूं। पर फिर भी उसके पार देखने का हर बार साहस नहीं दिखा पाता हूं।
मैं वहां पर उसे हल्के मैं ले लेता हूं। शायद मुझे उसी क्षण ओर गहराई से तहकिकात करनी चाहिए।
Kalpana Verma
जिसे आज तक मै कह कह कर बचाया,अब उसके विषयों को देख देख कर समझ कर मै को गलाना है।
Chandra Shekhar Nayak
अहंकार दुःखी होने से नहीं डरता , अपनी अनुपस्थिति से डरता है । अज्ञेय से नहीं , ज्ञात के खो जाने की स्थिति से भयभीत रहता है ।
Ranjan Kumar
नहीं, मैं उसे नहीं बचाऊँगा। उसके पार देखने की कोशिश करूँगा।
अगर मुझे आज साफ दिखाई दे कि जिसे मैं “मैं” कहकर बचा रहा हूँ, वही मेरे अधूरेपन की जड़ है और फिर भी मैं उसी को पकड़े जा रहा हूँ, तो यह मेरी नीयत की बात है। मुझे ही चुनाव करना है कि मैं इसी मैं, मे बना रहूँ या उसे समझकर उससे हटने का चुनाव करूँ।
Vishal Thakur
✅🙏 aapane Mera pura doubt clear kar diya.
Brahma kumari Rao
मैं "मैं" (अहंकार) जब आत्मवलोकन से चुनाव करूंगी "मैं"को मिटाने का तो जो अब मैं बचेगा वो अहंकार क्षीण अहंकार होगा।परचुनाव कर नियत और ईमानदारी से पुनः पुनः मिटने का, क्षीण होने का यह अभ्यास जारी रहेगा यही आत्मोनमुखी अहंकार हैं।🪔🪔🙏
Priya
Uske par dekhne Ka sahas karongi try karongi Apne aapse lad Pau or Sach Ka samna Kar pau🙏
Mamta Jaiswal
aatma old or young nahi hoti jis din m mera khtam ho jayega use din aap khud se milego or khud ko samajhoge
Rachana tiwari
नियति अगर साफ़ है तो जो ग़लत है
उसका साथ नहीं देना है 🙏
P
Pallavi Aglawe
आत्मा का ना कोई आकार है ना कोई रंग , वो निराकार है...!
S
Sanjana Rajbhar
m मैं कह कर बचा रहूं वही मेरे अधूरेपन की जड़ है उसे बचाना नहीं उसके ऊपर देखने का बाल रखूंगी।
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Shashi maheshwari
🕉️ "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो"
“यह आत्मा बलहीन द्वारा प्राप्त नहीं होती।”
आज अगर साफ़ दिखाई दे कि जिसे मैं “मैं” कहकर बचा रहा हूँ, वही मेरे अधूरेपन की जड़ है, तो क्या मैं उसे बचाता रहूँगा या उसके पार देखने का बल रखूँगा?
जो होना है आचार्य जी के सानिध्य में होना है। हीरा पायो, गांठ कठे आओ
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Shiv narayan
🚩👍
✍🏻 पोस्ट 10 | 10 अगस्त '26 💭 विषय — विश्व दर्शन ────────── 🕉️ "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो" 📖…