
MaNorama Vyas
सच्चा बल तब है जब मुझे दिख जाए कि मेरा अहंकार ही मेरे अधूरेपन और बंधन की जड़ है, फिर भी मैं उसकी छवि, सुविधा और मान्यता को बचाने में न लगूँ। आत्मा कोई उपलब्धि नहीं है। बल्कि अपने झूठे “मैं” को पहचानकर उससे आगे देखने का साहस ही साधना है।




























