
Shashi maheshwari
🕉️ "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो" “यह आत्मा बलहीन द्वारा प्राप्त नहीं होती।” आज अगर साफ़ दिखाई दे कि जिसे मैं “मैं” कहकर बचा रहा हूँ, वही मेरे अधूरेपन की जड़ है, तो क्या मैं उसे बचाता रहूँगा या उसके पार देखने का बल रखूँगा? जो होना है आचार्य जी के सानिध्य में होना है। हीरा पायो, गांठ कठे आओ
















