
Ranjan Kumar
नहीं, मैं उसे नहीं बचाऊँगा। उसके पार देखने की कोशिश करूँगा। अगर मुझे आज साफ दिखाई दे कि जिसे मैं “मैं” कहकर बचा रहा हूँ, वही मेरे अधूरेपन की जड़ है और फिर भी मैं उसी को पकड़े जा रहा हूँ, तो यह मेरी नीयत की बात है। मुझे ही चुनाव करना है कि मैं इसी मैं, मे बना रहूँ या उसे समझकर उससे हटने का चुनाव करूँ।















