
vivek Mishra
आत्म से शुरू होकर अनंत तक आत्मा का विस्तार है। आज इस पोस्ट से वास्तव में समझ आया कि आत्मा आत्म को जानने का ही दूसरा नाम है। जैसे जैसे आत्म को जानते हुए अहंकार विगलित होता जाता है, उसी के अनुपात में आत्मा अपने विस्तृत रूप में फलित होती जाती है। हम आत्मा के उतने ही अस्तित्व से मिल पाते हैं, जितना अपने अहंकार को गला पाते हैं। धन्यवाद आचार्य जी🙏🙏















