✍🏻 पोस्ट 6 | 20 अगस्त '26
💭 विषय — इतिहास──────────
🔥📖 राजा राममोहन राय: जब सवाल ने परंपरा को चुनौती दी
ज़रा उस समय की कल्पना कीजिए जब किसी सामाजिक प्रथा पर सवाल उठाना केवल असहमति नहीं, बल्कि अपने ही समाज के प्रभावशाली वर्गों के सामने खड़े होना था।
ऐसे समय में एक व्यक्ति ने पूछा:
❓ क्या केवल इसलिए कोई प्रथा सही हो जाती है क्योंकि वह पुरानी है?
नाम था राजा राममोहन राय।
उन्होंने सती प्रथा के विरुद्ध अभियान चलाया, आधुनिक शिक्षा का समर…
1809 ma तुहफ़त्तुल मुवाहदिन लिखी थी यह एकेश्वरवादियों को उपहार" है
RISHI KUMAR
i can't imagine ever, what type of circumstances he had to face
Priya Pant
❓ हम अपने समय की किन मान्यताओं को केवल इसलिए ढो रहे हैं क्योंकि उन्हें चुनौती देने के लिए हमारे भीतर उतनी ही ईमानदार नीयत और साहस नहीं है?
“जो परंपरा पुरानी है, वह सही ही होगी।”
“लोग क्या कहेंगे, इसलिए मुझे ऐसा ही करना चाहिए।”
“मेरी जाति/समुदाय/परिवार की प्रतिष्ठा सबसे पहले है।”
“पुरुष को कमाना चाहिए और स्त्री को घर संभालना चाहिए।”
“जिसके पास अधिक पैसा है, वही अधिक सफल है।”
“बड़ा पद या बड़ी नौकरी मतलब बड़ा इंसान।”
“बच्चे को वही बनना चाहिए जो समाज सफल मानता है।”
“शादी हो गई है तो रिश्ता किसी भी कीमत पर निभाना ही चाहिए।”
“बहुमत जिस बात को मानता है, वह सही होगी।”
“मेरे धर्म/विचार/गुरु की बात पर प्रश्न करना गलत है।”
“मेरी पहचान पर सवाल उठाना, मुझ पर हमला करना है।”
“दूसरों से आगे निकलना ही जीवन की सफलता है।”
“सुख बाहर की चीज़ों—पैसे, वस्तुओं, प्रशंसा और मान-सम्मान—से मिलेगा।”
“जो मेरे पास है, उसे छोड़ना नुकसान है; चाहे वह मेरे किसी काम का न हो।”
“मैं जैसा हूँ, वैसा ही रहूँ; बदलना कमजोरी है।”
Govind Singh
अंहकार मान्यताओं को अपनी पहचान मानता है इसलिए जब कोई उसकी मान्यताओं को चुनौती देता है तो उसे अपने अस्तित्व खतरा मानते हुए उसका विरोध करता है इसलिए हमें सही नियत एवं ईमानदारी से मान्यताओं एवं परम्पराओं का अवलोकन करना होगा
Anjali Singh
Which beliefs of our time are we carrying merely because we lack the same honest intention and courage to challenge them?
Beliefs that women should get married and go to other house, being a women, seeing my mother suffer and no support from her own brother's family, I know how alone is women and how society feel being proud to exploit women by creating such notions of marriage and make her dependable. To be get accepted in society women’s are reallt taught from childhood a whole life of pretending rituals and norms, do this this like this and yes you are now acceptable why? no one ever asks its feel very sad to know that your own family is not yours.Only your education, strength is what will get you out of your misery
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Parmar Kalpana
मैं भी आचार्य जी से जुड़ने से पहले यह सब मान्यता मानती थी पर जब से आचार्य ज को सुना हे तब से इन सब मान्यताओं पर मैं सवाल उठाना चाहती हूं। सब लोग कहते हैं की लड़की घर शादी के बाद उनका ससुराल होता है तो मैं यह कहती हूं कि उसका एक ससुराल वालों का घरअपना घर है तो वह अपनी मर्जी से क्यों नहीं रह सकती घर तो वही है ना जो अपना हो जोअपनी मर्जी से रह सके। दूसरा यह कहते हैं कि बड़ों के सामने नहीं बोलना चाहिए मैंने कहा उम्र में बड़े है तो वह तो नहीं हो सकता कि वह सबसे सच्च ही बोलते हैं हमें सच को देखना चाहिए ना ही क्यों हमारे उम्र में बड़े हैं तो उसकी सुननी चाहिए।
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B
Babita Jain
ye bahut badur aatma ka kaam h m bahut darpok rahi hu pr ab nahi hu ye to lagta tha hamesha se jb kisi k saath kuch bhi bura hota thaa ki ye kesey sahta hoga
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Rajiv Singh
वर्षों से मुझे लगता था कि मैं विद्रोही हूं, कभी लगता मैं सही हूँ,कभी लगता कि गलत हूं, कभी व्रत रखता,कभी मंदिर जाता, फिर लगता ये क्या है ओशो को पढ़ता,सुनता, अर्ध बेहोशी रहती। आचार्य जी का मिलना संयोग नहीं है इतने दिनों की बैचेनी की वजह है।एक एक बात बिल्कुल साफ होती गई। ओर बहुत सारे जबरदस्ती के कर्मकांड बंद हो गए। जैसे भंडारा,कांवड़, तेरहवीं, दसवां, जन्मोत्सव,मांसाहार, तम्बाकू मेत्री, घंटी, आरती ,बहुत सारी इज्जत की परवाह, अब तो कुछ लोग कार्ड भी नहीं देते कि आता ही नहीं।ओर कुछ लोग फोन कर बताते है कि हम आए है, देखो तुम्हें नहीं बुलाया, हंसी आती है। कि इतने लोग क्यों इकट्ठे हुए, बस खाने को। ओर क्या प्रयोजन है।जो होना है वो तो हो ही रहा है।🙏
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EKTA
negative liberty
Preeti Pandey
आज ही मेरे घर मे बड़े दादा जी का निधन हो गया है, अब कल से सभी लोग कह रहे है, १० दिनों तक कपड़े में साबुन ,और बालों कंघी और शैंपू नहीं कर सकते । और एक ही टाइम खाना बनेगा ,मुझे ये नहीं समझ में आ रहा है। कि मेरा एक छोटा स कापी किताब की दुकान है, और घर वाले कह रहे दो दिन दुकान नहीं जाना है । दुकान नहीं जाना हैं वो तो बात समझ आती है, लेकिन मेरे दो छोटे बच्चे है। अब मैं खाना सुबह बना नहीं सकती, तो बच्चों को कैसे टिफिन दे पाऊंगी । और मुझे घर में रहकर ही ये परंपरा निभाना पड़ेगा , पहले मै इन बातों को मानती थी अब मुझे इन परंपराओं को मनाने में मुझे अपने आप घिन सी आती है ,कि मैं कैसे अपने आप को रोकूं इस परंपरा से।
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Braj mohan
सही है l आज मेरे अंदर इतना साहस नहीं है कि अपनी पुरानी मान्यताओं को चुनौती दे सकूँ l अभी डरता हुँ कि समाज कुछ गलत कर देगा l अभी गीता जीवन में उतरी नहीं है l
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Ranjan Kumar
सबसे पहले राजा राम मोहन राय जी को और उनके जैसे सभी योद्धाओं को देखकर मुझे बहुत प्रेरणा मिलती है। जिन्होंने गलत होते देखा तो पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। उन्होंने आवाज उठाई और अंत तक लड़े भी। समाज तरफ से जितना भी विरोध मिला, उसके बावजूद वे डटे रहे।
मैं भी अब पहले के मुकाबले तथ्यों पर बात करना शुरू कर रहा हूँ। बस अभी साहस और नीयत की थोड़ी कमी है कि मैं अपनी बातों को हमेशा अच्छे से रख नहीं पाता। और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि अगर मैं अपनी बात को अच्छे से समझा भी दूँ, तो सामने वाले की नीयत पर भी निर्भर करता है कि वह उसे मानेगा या नहीं।
मैं धीरे-धीरे इन चीज़ों को समझ रहा हूँ। सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस और नीयत अब धीरे-धीरे आ रही है।
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Brahma kumari Rao
सबसे पहले तो मैं कृतज्ञ हूं राजा राममोहन राय जी की और उनके ही जैसे अनेक समाज सुधारकों की आज जो कुछ हूं उन्हीं की बदौलत हूं जिन्होंने समाज में चल रही गलत मान्यताओं की सफाई के लिए अपना जीवन,सुख सुविधा ,भोग सब कुछ त्याग दिया बस ऊंचा रखा तो सिर्फ एक ही लक्ष्य जो गलत है सो गलत है उसे आगे नहीं बढ़ने दूंगा चाहे इसका विरोध मेरे लिए कितना ही घातक क्यों ना हो। मेरे जीते जी तो वह न बच सकेगा।😢😢🪞🙏🙏🪔
और एक मैं हूं इस समाज की दबी , डरी ,कमजोर कड़ी जो गलत को गलत कहने से महज इसलिए पीछे हट जाती हूं क्योंकि अपनी बनाई हुई छवि को ध्वस्त होने से बचना चाहती हूं।
ऊपर दिए लेख को पढ़ने और उसे छोटी सी clip को देखने के बाद मे मैं इतनी आहत हुई हूं की इन दृढ़ निश्चयी, समाज सुधारकों और महापुरुषों ने मुझे वो देने की कोशिश की जो आसमान के तल का था और मैं खुद को इतना काबिल भी नहीं बन पाई की धरती पर भी अपनी रक्षा के लिए दृढ़ता से खड़ी रह जाती। उनके बलिदान को हम जैसों ने व्यर्थ ही गंवा दिया।😢🪔🙏🙏
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Shailesh vishwakarma
इस मान्यता को हम इसलिए ढ़ोते आ रहे है,
इसका कारण हमारी खुद की नीयति का है,
हम यह कह देते है की हमरे घर मे ऐसा ही होता है,
हम खुद को एक कठपुतली की तरह नच्चा रहे है,
इसका कारण हमारे खुद के चुनाव के कारण हुआ है।
Anita narang
एकदम सही कहा आपने नियत और ईमानदारी तो है ही नहीं।
लोक धर्म की बेड़ियों में जकड़ा हुआ इंसान।
न नियत और ईमानदारी आ ही नहीं पाती है बाबाओं पाखंडों में इतना अहंकार उलझा हुआ है कि बाहर निकालने के लिए अपने स्वार्थ आड़े आ जाते हैं।
VIKAS
ऋग्वेद 10.18.7 & 10.18.8 मे सती प्रथा से संबंधित श्लोक हैं, तो क्या सती प्रथा वेद लिखने से पहले की परंपरा है?
VIKAS
परंपरा का अंधाधुन विरोध नहीं करना है बल्कि इसे अपने विवेक की कसौटी में कसना है और आचार्य जी की शिक्षाओं के साथ आगे बढ़ना है, जो काम राजा राम मोहन राय ने किया वो काम आचार्य जी कर रहे हैं।।
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Priyankakumari Kumar
अभी भी है जाती धर्म कर्मकांड
Nibha kumari
अभी भी मैं देख पा रही हूं कि पुरानी मान्यताएं इसलिए मान रही हु क्योंकि हमारे पूर्वज से ही मानते आ रहे हैं जैसे गुरुवार को नाखून ना कटना, कही जाने से पहले दही चीनी खाना , लड़की को श्रृंगार करना , कोई भी मेहमान आए उनका पैर छूना, रसोई में महिलाओं का होना, पूजा करने की सामग्री में फल फूल, अगरबत्तीऔर अन्य चढ़ाना, आदि
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Anamika Tiwari
बहुत हैं अभी भी। जैसे
१- सजना सँवरना क्योंकि मैं एक लड़की हूँ। सजूँगी तभी सुंदर लगूँगी।
२- ज़्यादा काम किया, वे वक़्त सोई तो स्वास्थ्य ख़राब होगा। इतने घंटे की नींद तो लेनी ही चाहिए।
३- माँ बनना। ( ये कभी कभी आता है पर आता है)
४- घर वाले गीता सुने ये नहीं पर उनसे बात तो करनी पड़ेगी और कुछ पुराने दोस्त भी। :(
५- अभी भी लोगों से तारीफ़ की भीख माँगना।
६- “ मैं शुरू से ऐसी ही हूँ” ये बोलना। मैं ये शब्द खत्म करना चाहती हूँ।बेसिक नेचर तो नहीं बदल सकता। पर वो अहंकारियों है या बस शारीरिक, ये मैं नहीं जानना चाहती।
Priyanka Kumari Chhoty
sahi me inhone jo kiya wo hamare liye atulay esk rid ham kabhi nahi chuka sakte h 🙂🙏
Sunita
यह सवाल वास्तव में “समाज गलत है या सही?” से ज्यादा कठिन सवाल है—क्योंकि यह हमसे पूछता है कि हम स्वयं किन मान्यताओं को बिना जाँचे स्वीकार कर रहे हैं।
मेरे विचार से हमारे समय में कुछ ऐसी मान्यताएँ हैं जिन्हें हम इसलिए ढोते रहते हैं क्योंकि उन्हें चुनौती देने की कीमत—परिवार का विरोध, सामाजिक असहमति, अकेलापन या अपनी सुविधा छोड़ना—हम उठाना नहीं चाहते।
1. “लोग क्या कहेंगे?” को नैतिकता समझ लेना
हम अक्सर सामाजिक स्वीकृति को सही-गलत का पैमाना बना देते हैं।
लड़की कैसे कपड़े पहने, कब शादी करे, किससे मिले, नौकरी करे या घर संभाले—इनमें से कई निर्णयों को व्यक्ति की स्वतंत्रता के बजाय समाज की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया जाता है।
असल प्रश्न होना चाहिए:
“क्या इससे किसी व्यक्ति के अधिकार या स्वतंत्रता का वास्तविक नुकसान हो रहा है?”
न कि—“लोग इसे क्या समझेंगे?”
2. परंपरा को सत्य का प्रमाण मान लेना
किसी बात का पुराना होना यह प्रमाण नहीं है कि वह सही है।
हमारे पास ऐसी अनेक परंपराएँ रही हैं जिन्हें बाद में समाज ने बदला—बाल विवाह, अस्पृश्यता, स्त्री शिक्षा पर रोक, सती जैसी प्रथाओं के विरुद्ध संघर्ष इसका उदाहरण हैं।
इसलिए हर परंपरा के सामने एक ईमानदार प्रश्न होना चाहिए:
“अगर यह परंपरा आज पहली बार हमारे सामने आती, तो क्या हम इसे स्वीकार करते?”
अगर उत्तर “नहीं” है, तो केवल पुरानी होने के कारण उसे बचाने का तर्क कमजोर पड़ जाता है।
3. “अच्छी स्त्री” और “अच्छे पुरुष” की तय भूमिकाएँ
आज भी हम अनजाने में मान लेते हैं—
स्त्री = त्याग, देखभाल, परिवार
पुरुष = कमाई, निर्णय, नेतृत्व
समस्या यह नहीं कि कोई स्त्री परिवार की देखभाल करना चाहती है या कोई पुरुष कमाना चाहता है। समस्या तब शुरू होती है जब इसे चुनाव के बजाय प्राकृतिक कर्तव्य बना दिया जाता है।
सच्ची समानता का अर्थ है:
भूमिकाएँ व्यक्ति की क्षमता और इच्छा से तय हों, जन्म से नहीं।
4. जाति को सामाजिक वास्तविकता मानकर उससे आगे न बढ़ना
बहुत से लोग जाति-व्यवस्था की आलोचना तो करते हैं, लेकिन विवाह, दोस्ती, सामाजिक संबंध और राजनीतिक समर्थन के स्तर पर उसी व्यवस्था को दोहराते हैं।
यहाँ सबसे कठिन ईमानदारी अपने भीतर झाँकने की है:
“क्या मैं जिस भेदभाव की आलोचना सार्वजनिक रूप से करता/करती हूँ, उसका कोई छोटा रूप स्वयं अपने जीवन में निभा रहा/रही हूँ?”
5. सफलता को केवल पैसा और पद मान लेना
हमने “सफल जीवन” की एक बहुत संकरी परिभाषा बना ली है—
अच्छी नौकरी → अधिक पैसा → बड़ा घर → प्रतिष्ठा।
लेकिन क्या किसी व्यक्ति का शांत, स्वतंत्र, रचनात्मक या सामाजिक रूप से उपयोगी जीवन कम सफल है?
यह मान्यता इसलिए मजबूत है क्योंकि इसे चुनौती देने का अर्थ अपनी जीवन-शैली और महत्वाकांक्षाओं पर भी सवाल उठाना होगा।
6. “बहुमत सही होता है” मान लेना
लोकतंत्र में बहुमत शासन करने का तरीका है; सत्य निर्धारित करने का तरीका नहीं।
इतिहास में कई बार अल्पसंख्यक विचार बाद में सामाजिक परिवर्तन का आधार बने हैं।
स्त्री मताधिकार, दलित अधिकार, श्रमिक अधिकार, अंतरजातीय विवाह—इन सबको कभी न कभी “असामान्य” या “समाज-विरोधी” कहा गया।
इसलिए किसी विचार को केवल इसलिए सही नहीं मानना चाहिए कि:
“सब लोग ऐसा ही मानते हैं।”
7. धर्म और संस्कृति के नाम पर हर प्रश्न को बंद कर देना
यह शायद सबसे संवेदनशील क्षेत्र है।
धर्म या संस्कृति व्यक्ति को अर्थ, नैतिकता और समुदाय दे सकते हैं। लेकिन किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक दावे को प्रश्न से ऊपर रख देना विचार की स्वतंत्रता को समाप्त कर देता है।
ईमानदार आस्था प्रश्न से डरती नहीं।
और सबसे कठिन मान्यता कौन-सी है?
शायद यह:
“मैं स्वयं पर्याप्त पूर्वाग्रही नहीं हूँ।”
हम दूसरों की पितृसत्ता, जातिवाद, रूढ़िवाद या अंधविश्वास आसानी से पहचान लेते हैं। लेकिन जब वही चीज हमारी अपनी सुविधा, परिवार या पहचान से जुड़ी होती है, तो हम उसके लिए नए तर्क खोज लेते हैं।
इसलिए अपने समय की सबसे जरूरी बौद्धिक आदत शायद यह होनी चाहिए:
जिस मान्यता से हमें सबसे अधिक लाभ मिलता है, उसकी सबसे कठोर जाँच हमें स्वयं करनी चाहिए।
और साहस का अर्थ हर परंपरा को तोड़ देना नहीं है।
साहस का अर्थ है—जिसे सही मानते आए हैं, उसके गलत सिद्ध होने की संभावना को भी ईमानदारी से स्वीकार करना।
यहीं से वास्तविक आत्म-आलोचना और वास्तविक सामाजिक परिवर्तन दोनों शुरू होते हैं।
Saraswati Ekka
हम अपने सब त्योहारों को पुरानी मान्यताओं और कहानी के साथ मनाते आ रहे हैं, लेकिन उन मान्यताओं को चुनौती नहीं दे रहे, ना ही उनमें जो व्रत,उपवास रखे जाते हैं उन पर सवाल उठाते हैं? इनके नाम पर जो बाजारवाद चलता हैना ही उसे चुनौती देते हैं। मेरे भीतर भी नीयत और ईमानदारी की कमी है जिसके कारण मैं भी त्योहारों पर जो मान्यताएं चलती हैं उन्हीं को किसी ना किसी रूप में मानती हूं।
Ashish himacha
बड़े जो कहे वो बात सही है, क्योंकि ये कलयुग है और आगे ये कलयुग बढ़ता जाएगा इसलिए जो पहले हो चुका वो सार्थक है अभी हमें उसके हिसाब से ही चलना है ।
सार्थक वो जो जगत में प्रचलित है, आजाद वो जिसके जगत में किसे है , साहसी वो जो किसी को भी दबा सके, विद्रोही वो जो किसी दूसरी धारा के बारे में पुरजोर गलत बोल रहा है ।
ये मेरी अनुभव की हुई मान्यता है ।
neelam Digrase
मुझे दिख रहा है लेकिन मेरी नियत ओर ईमानदारी दोनों नहीं है उन्हें चुनौती दे सकू ।मेरा स्वार्थ जो जुड़ा हुआ है रिश्ते ,अपनी अच्छी छवि पहचान से 😐
RICHA CHATURVEDI
हम अपने आसपास ,अपने घर में, समाज में ऐसी न जाने कितनी परंपराएं, धारणाएं, रीति- रिवाज, अंधविश्वास देखते हैं लेकिन जब उन्हें देखकर के और उनको जान करके जब हम तथ्यों के साथ खड़े होते हैं तो यही हमारा ईमानदार चुनाव होता है और अहंकार की विगलन की नियत भी होती है
Arti Gupta
❓ हम अपने समय की किन मान्यताओं को केवल इसलिए ढो रहे हैं क्योंकि उन्हें चुनौती देने के लिए हमारे भीतर उतनी ही ईमानदार नीयत और साहस नहीं है?
...कोई भी धार्मिक काम हो सबसे पहले मिठाई बनेगी उसे मिठाई से चाहे लोगों को जितनी भी बीमारियाँ होती हैं तब भी वाह बनेगी और बोलेगी भी...
पहला हिसा दान के लिए निकला जाएगा जो कि तथाकथित पंडित को दिया जाता है.
हर त्यौहार में नए कपडे पहनना जरूरी है ,त्यौहार का व्यापक मतलब क्या है उसे लोग धार्मिक लोगों का कोई लेना देना नहीं है..
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Anu bala
आज मेरी फोन पर अपनी बड़ी sis से बात हो रही थी ।वह बोली कि अब मै भी सुबह जल्दी खाना खा लेती हु और फिर बोली कि मेरी मौसी सास से बात हुई तो वह कह रही थी कि अपने पति को पहले खाना खिलाते है और उसके बाद में तुम्हे खाना चाहिए। अब तो हंसी आती है ऐसी औरतों पर।क्या क्या नहीं सिखाती है ये🤣
Shriram Singh
❓ हम अपने समय की किन मान्यताओं को केवल इसलिए ढो रहे हैं क्योंकि उन्हें चुनौती देने के लिए हमारे भीतर उतनी ही ईमानदार नीयत और साहस नहीं है?
🐒 हमारे भीतर ईमानदारी नियति की कमी नहीं है हमारे भीतर स्वार्थ भोग और लालच की अधिकता है। हमें मान्यताओं को ढोने में बहुत लाभ मिलता है समाज में हमारी इज्जत होती है और स्वार्थ भोग की छक्कर पूर्ति करते हैं।
🐒 हम अपनी अधिकता को नहीं देखना चाहते हैं क्योंकि अधिकता ईमानदारी और नियति के ऊपर पर्दे की तरह चढ़ गई है अधिकता ही हमारी हस्ती बन गई है हमको लगता है कि अभी बहुत कमी है और हम कमी के नाम पर अपनी अधिकता को बढ़ाते हैं।
🐒 हम अपनी मान्यता को चुनौती नहीं देते हैं क्योंकि उससे हमारे स्वार्थ और भोग पर चोट पड़ते हैं हम ईमानदारी को चुनौती देते हैं कि किसी भी तरह से ईमानदारी दिख न जाए हम अपने भीतर नहीं चुनौती देते हैं बाहर के विषयों को चुनौती देते हैं विषय तो अनंत हैं जीवन अनंत नहीं है जीवन चुक जाता है।
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✍🏻 पोस्ट 6 | 20 अगस्त '26 💭 विषय — इतिहास ────────── 🔥📖 राजा राममोहन राय: जब सवाल ने…