
Braj mohan
सही है l आज मेरे अंदर इतना साहस नहीं है कि अपनी पुरानी मान्यताओं को चुनौती दे सकूँ l अभी डरता हुँ कि समाज कुछ गलत कर देगा l अभी गीता जीवन में उतरी नहीं है l
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सही है l आज मेरे अंदर इतना साहस नहीं है कि अपनी पुरानी मान्यताओं को चुनौती दे सकूँ l अभी डरता हुँ कि समाज कुछ गलत कर देगा l अभी गीता जीवन में उतरी नहीं है l

ब्रज मोहन जी, ये ईमानदारी अपने आप में बड़ी बात है। ज़्यादातर लोग साहस न होने को साहस होने का भ्रम पहनाकर घूमते हैं, आप उसे भ्रम बनाए बिना, नंगा ही देख पा रहे हैं। डर को डर कहना, उसे किसी और नाम से न बचाना, यही तो वह ईमानदार देखना है जिसकी बात हो रही थी। और गीता के जीवन में उतरने का इंतज़ार मत करिए, यह उतरना किताब पढ़ने से नहीं आता, इसी डर को रोज़ देखने से आता है। सत्र देखिए, गीता पर होने वाली परीक्षाओं से जुड़िए, वहीं वह नीयत धीरे धीरे मज़बूत होती है जो अभी कमज़ोर लग रही है।