
वर्षों से मुझे लगता था कि मैं विद्रोही हूं, कभी लगता मैं सही हूँ,कभी लगता कि गलत हूं, कभी व्रत रखता,कभी मंदिर जाता, फिर लगता ये क्या है ओशो को पढ़ता,सुनता, अर्ध बेहोशी रहती। आचार्य जी का मिलना संयोग नहीं है इतने दिनों की बैचेनी की वजह है।एक एक बात बिल्कुल साफ होती गई। ओर बहुत सारे जबरदस्ती के कर्मकांड बंद हो गए। जैसे भंडारा,कांवड़, तेरहवीं, दसवां, जन्मोत्सव,मांसाहार, तम्बाकू मेत्री, घंटी, आरती ,बहुत सारी इज्जत की परवाह, अब तो कुछ लोग कार्ड भी…

















