कल वेदांत संहिता सत्र में आचार्य जी ने कहा: ये मत पूछिए कि शास्त्रों में क्या लिखा है, ये पूछिए कि शास्त्र मुझसे मेरे बारे में क्या कह रहे हैं। शास्त्र आईना हैं। उनका काम है आपको आपकी ओर लौटाना, क्योंकि हमारी आदत बाहर भागने की है, इस उम्मीद में कि तृप्ति कहीं और मिल जाएगी। इसीलिए शास्त्र एक ही बात बार-बार कहते हैं। उनके पास कहने को कम नहीं है, हम भूलते बहुत हैं। ऋषियों ने सत्य की ओर इशारा करने के लिए अनेक शब्द कहे, पर ये शब्द बड़ी सावधानी से चुने गए। आचार्य जी कहते हैं, ऋषियों ने हम पर बहुत भरोसा नहीं किया। वो जानते थे कि जो भी शब्द कहेंगे, अहंकार उसे पकड़कर एक नया विषय बना लेगा, सोचने लायक, पाने लायक। इसलिए उन्होंने पूरा कष्ट उठाया कि बात गलत न समझी जाए। फिर भी हम ब्रह्म, आत्मा, सत्य की ऐसे बात करते हैं जैसे वो कोई चीज़ हों, कोई ऊँची अवस्था जिसके बारे में सोचा जा सके। ऋषियों की इतनी सावधानी के बाद भी। पर ये सावधानी सिर्फ़ भाषा की नहीं थी। जिस सत्य की तस्वीर बन सकती है, अहंकार उसे भी अपनी जेब में रख लेता है। इसलिए ऋषियों का ज़ोर पाने पर नहीं, छोड़ने पर रहा। आचार्य जी कहते हैं: नेति-नेति सत्य से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है। नकार, किसी दावे या किसी उपलब्धि से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि सत्य आपके लिए क्या लाएगा, ये आप नहीं जानते। पर आप ये ज़रूर जानते हैं कि आपकी मौजूदा हालत आपको कैसी अशांति, कैसी बेचैनी दे रही है। उसे छोड़ना होगा। पर वो छूटती नहीं, क्योंकि उसमें आपके दाँव लगे हैं। यहीं दिखता है कि सत्य हमेशा चुनाव क्यों है, और हमेशा त्याग क्यों माँगता है। अगर आप जैसे हैं, उसी से संतुष्ट हैं, तो आप वैसे ही रह जाएँगे। छोड़े बिना, गिराए बिना, नकारे बिना कोई सत्य नहीं। इसके लिए एक साफ़ निराशा चाहिए, एक गहरा मोहभंग, उम्मीद का पूरी तरह टूट जाना। श्रीकृष्ण इसे निर्ममता कहते हैं जो कुछ मैं पकड़े बैठा हूँ, वो मेरा नहीं है, और उससे मेरा मोह पूरी तरह टूट चुका है। तो ऋषियों की भाषा अगर बार-बार "नहीं" कहती है, तो वो कंजूसी नहीं, करुणा है। वो आपको कोई नया सहारा नहीं दे रहे, पुराने सहारे दिखा रहे हैं। अब उन्हें छोड़ना है या नहीं, ये आप पर है। _______ आज का बोधकार्य इसी विषय पर आधारित है: 1. वेदांत में सत्य की ओर इशारा करने के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल होता है, ऐसे 50 शब्द खोजिए। फिर देखिए कि उनमें से कितने सकारात्मक (via-positiva) हैं। 2. जब आप जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करते हैं, तो उसे व्यक्त करने के लिए आपकी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? आपके अनुसार ऐसा क्यों है?














































