
🏵️आज का बोधकार्य:— 🌿25 सितंबर, 2026 | शुक्रवार आत्म ज्ञान के प्रकाश में अंधे कर्म सब त्याग दो निराश हो, निर्मम बनो ताप रहित बस युद्ध हो (अध्याय 3,श्लोक 30) 2. जब आप जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करते हैं, तो उसे व्यक्त करने के लिए आपकी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? आपके अनुसार ऐसा क्यों है? 🌈अवलोकन:— पहली बात तो गीता समागम से जुड़ने से पहले, मेरी धारणा यहीं सत्य के, ब्रह्म के प्रति और आत्मा को लेकर कुछ इस प्रकार से था — बड़े बड़े तपस्वी के पास शक्तियां होती है, उन्हें ब्रह्म की विद्या होती है, आत्मा पुण्य कर्मों से आती है, जब मैं अपनी दिल की बात को सुनूंगा तो आत्मा अंदर से फुटकर बाहर निकलेगी,😃 सत्य के साथ जिओ मतलब किसी को धोखा न देना, चोरी न करना, लड़ाई झगड़ा मत करना और झूठ मत बोलना तो सत्य तुम्हारे लिए होगा। गीता समागम और आचार्य जी के शिक्षाओं का प्रभाव: लेकिन अब अपने हर एक पल का, मतलब सिर्फ़ "नकार" से होता है, अब पसंद जैसा लगता है,नकार। मुझे नहीं पता कि मैने नकार शब्द को भी अपनी पहचान लिया है या नहीं। लेकिन "नकार" शब्द अपने आप पर्याप्त है मेरी सब धारणाओं, मान्यता को और एक पहचान जो मैं छवि के रूप गढ़ते रहता हूँ, "नकार" — किसी भी विश्वास या रूप, नाम, पहचान को न आकार देने में है, यानी जो पहले से हमारे पास उधार का, उसमें और कुछ अधिकता न जुड़ने का नाम है, नकार। जो है, पहले से मौजूद उसी को छोड़ने, गिरा देने और निराश हो जाने का नाम है, "नेती नेती"। क्योंकि अहंकार असहज हो जाता है, निर्विकार होने में, छिपने के लिए कोई आश्रयता नहीं मिल पाती।


















