
1. वेदांत में सत्य की ओर इशारा करने वाले 50 शब्द आत्मा, ब्रह्म, सत्य, चैतन्य, चेतना, साक्षी, अद्वैत, आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान, आत्मबोध, ब्रह्मबोध, आनंद, शांति, पूर्णता, अनंत, अखंड, नित्य, शुद्ध, मुक्त, अमर, अविनाशी, अजन्मा, असंग, निर्गुण, निराकार, निरपेक्ष, निर्विकार, अद्वितीय, तुरीय, मोक्ष, मुक्ति, निर्वाण, एकत्व, परमात्मा, परम सत्य, नेति-नेति, अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि, सत्, स्वप्रकाश, अहंकार-रहित, इच्छारहित, बंधनमुक्त, भयमुक्त, स्वतंत्रता, विवेक, वैराग्य, करुणा, प्रेम, शून्यता। इनमें कुछ शब्द positive हैं—जैसे आनंद, शांति, पूर्णता, प्रेम। वहीं कुछ शब्द नकार के माध्यम से सत्य की ओर इशारा करते हैं—जैसे असंग, निर्गुण, निराकार और नेति-नेति। मुझे इससे समझ आया कि सत्य को किसी वस्तु की तरह पाने से ज्यादा जरूरी है अपने अंदर की गलत धारणाओं को पहचानना और छोड़ना। 2. मेरी व्यक्तिगत स्थिति अभी मैं एक ऐसे relationship में हूँ जहाँ उससे बात करने पर मुझे खुशी मिलती है और उसकी फ़िक्र भी होने लगी है। लेकिन साथ ही मेरे अंदर उम्मीद रहती है कि वह मुझे समझे, मेरी feelings को समझे और मेरे करीब रहे। मैं उसे बाँधना नहीं चाहता और न ही उस पर कोई अधिकार चाहता हूँ। फिर भी जब उससे दूरी होती है, तो मन बेचैन होने लगता है और मैं फिर उसके करीब चला जाता हूँ। अब मुझे प्रेम और attachment का फर्क थोड़ा दिखाई दे रहा है। प्रेम: वह अपनी तरह से स्वतंत्र और खुश रहे, चाहे वह मेरे करीब हो या नहीं। Attachment: मैं उसे बाँधना नहीं चाहता, लेकिन अंदर से चाहता हूँ कि वह मुझे समझे, मेरे करीब रहे और मेरी feelings का जवाब दे। शायद मेरे अंदर दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। इसलिए आज मैं खुद से पूछ रहा हूँ—क्या मैं सच में प्रेम कर रहा हूँ, या अपनी उम्मीद और attachment को प्रेम समझ रहा हूँ? मुझे अब लग रहा है कि मुझे कोई नई चीज़ पाने से पहले अपने अंदर की इस पकड़ को देखना है। शायद मेरे लिए अभी नेति-नेति का अर्थ यही है—जो मुझे बाँध रहा है, उसे पहचानना और धीरे-धीरे छोड़ना।




















