
1. वेदांत में सत्य की ओर इशारा करने के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल होता है, ऐसे 50 शब्द खोजिए। फिर देखिए कि उनमें से कितने सकारात्मक (via-positiva) हैं। अनिकेत, ब्रह्म, आत्मा, निराकार, निर्गुण, अविनाशी, अगोचर, निर्मम, निराधार, नित्य, अनिर्वचनीय, निर्लज्ज, निर्विकल्प, निरालंब, अनंत, पूर्ण, शून्य, प्रज्ञा, निर्विकार, अलख, अलक्ष्य, शिवोहम, शिवत्व, मुक्ति, अनुपम, प्रकाश, ज्ञान, अमृत, अद्वैत, रसो वै सः, अनाम, अरूप, सच्चिदानंद, कूटस्थ, एकम्, ॐ, अव्यय, अजन्मा, सनातन, परम, तुरीय, निश्चल, प्रज्ञान, मोक्ष, कैवल्य, अभय, विजय, असंग, परब्रह्म, विषयातीत। इनमें— 🔹 नकारात्मक / via-negativa — 28 🔹 सकारात्मक / via-positiva — 22 यानी सत्य की ओर संकेत करने वाले शब्दों में नकार की भाषा अधिक दिखाई देती है। सत्य को किसी नई चीज़ के रूप में पाना नहीं है, बल्कि जो असत्य, अतिरिक्त और आरोपित है, उसे हटाते जाना है। नेति-नेति — यह भी नहीं, वह भी नहीं। 🌌 2. जब आप जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करते हैं, तो उसे व्यक्त करने के लिए आपकी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? आपके अनुसार ऐसा क्यों है? ईमानदारी से कहूँ तो मुझे कोई भी सकारात्मक शब्द, सकारात्मक दिखाई ही नहीं देता। मुझे तो वहाँ भी ‘नेति-नेति’ ही दिखाई देता है। अगर मैं सत्य को अभिव्यक्त करती हूँ, तो वह भी अधिकतर नकारात्मक शब्दों में ही होता है— अनिकेत — जिसका कोई घर नहीं। 🏚️ निरालंब — जिसका कोई आधार नहीं। निर्लज्ज — जिसे सामाजिक शर्तों से कोई लेना-देना नहीं। असंग — जिसका कोई संग नहीं। अनाम — जिसका कोई नाम या पहचान नहीं। ये नकारात्मक शब्द हमें कुछ देते नहीं, बस यह दिखाते हैं कि हमने क्या-क्या अतिरिक्त पकड़ रखा है। हमारा उद्देश्य बना रहता है— “एक घर बना लूँ, सैटल हो जाऊँ।” 🏠 लेकिन अनिकेत दिखाता है— देखो, घर के साथ तुमने अपनी सुरक्षा, अपनी स्थिरता और अपनी पहचान भी बाँध ली है। 🍁निरालंब दिखाता है— देखो, तुमने कितने सहारों को अपना आधार बना लिया है। 🌿असंग दिखाता है— देखो, तुमने किस-किस की संगति कर ली है और उसके लिए क्या कीमत चुका रहे हो। 🥀 अनाम दिखाता है— देखो, तुमने अपने नाम, अपनी पहचान, अपनी उपलब्धियों और अपनी छवि को कितना पकड़ रखा है। “मैं ये हूँ।” “ये मेरा है।” “मैं ऐसा हूँ।” रिश्ते, प्रतिष्ठा, उपलब्धियाँ, विचार— हमने सबको ‘मैं’ और ‘मेरा’ बना लिया है। सत्य हमें यह नहीं बताता कि हमें क्या नया बनना है, बल्कि यह दिखाता है कि जो कुछ पकड़ा है, उसमें वास्तव में हमारा है क्या। इसलिए सत्य की भाषा शायद नकार की भाषा है— क्योंकि तुम्हें कुछ पाना नहीं है, छोड़ना है। सत्य कोई वस्तु नहीं जिसे पाया जाए। वह तो शायद उस सबके हट जाने पर जो शेष रह जाता है—वही है। नेति। नेति। नेति। 🌌 «सत्य की ओर यात्रा कुछ जोड़ने की नहीं, बल्कि लगातार घटते जाने की यात्रा है। 🕊️»


















