
1- ब्रह्म, आत्मा, आत्मन्, सत्य, चित्, आनंद, सच्चिदानंद, सत्, चैतन्य, प्रज्ञान, ऋत, अनंत, पूर्ण, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, अमृत, अविनाशी, अज, अकर्ता, अभोक्ता, निर्गुण, निराकार, निरंजन, निर्विकार, निरपेक्ष, निर्लेप, नित्य, शाश्वत, अव्यय, अचल, असंग, अद्वैत, अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यक्त, अनिर्वचनीय, अप्रमेय, अजात, अभय, स्वयंज्योति, साक्षी, द्रष्टा, पुरुष, तुरीय, कैवल्य, निरुपाधिक, असीम, स्वयंप्रकाश। सकारात्मक शब्द- ब्रह्म, आत्मा, आत्मन्, सत्य, चित्, आनंद, सच्चिदानंद, सत्, चैतन्य, प्रज्ञान, ऋत, पूर्ण, शुद्ध, बुद्ध, अमृत, नित्य, शाश्वत, अभय, स्वयंज्योति, साक्षी, द्रष्टा, पुरुष, तुरीय, कैवल्य, स्वयंप्रकाश। 2-जब मैं अपने जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करती हूँ, तो मेरी भाषा अधिकतर सकारात्मक होती है। मैं सत्य को शांति, प्रेम, आनंद, स्वतंत्रता, पूर्णता, ज्ञान जैसी किसी प्राप्त करने योग्य अवस्था के रूप में सोचने लगती हूँ। मुझे लगता है कि सत्य मिल जाएगा तो मैं शांत हो जाऊँगी, मेरा जीवन बेहतर हो जाएगा और मेरी सारी समस्याएँ समाप्त हो आचार्य जी की बात से देखने पर समझ आता है कि शायद इसलिए ऋषियों ने नकार की भाषा को इतना महत्व दिया। "मैं सत्य को क्या मानती हूँ?" से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है—"मैं अभी किन चीज़ों को सत्य मानकर पकड़े बैठी हूँ?" मेरे भीतर की बेचैनी, भय, तुलना, अपेक्षा, आसक्ति और अपनी बनाई हुई पहचान—इन सबको देखना और कहना कि "यह मैं नहीं हूँ", "यह सत्य नहीं है", "इसे भी छोड़ना है"—यही नेति-नेति की दिशा है। इसलिए अब मुझे लगता है कि सत्य को सकारात्मक शब्दों से पकड़ने की कोशिश करने की अपेक्षा, असत्य को पहचानकर छोड़ना अधिक वास्तविक है। क्योंकि सत्य मेरे लिए वास्तव में क्या है, यह शायद मेरी वर्तमान बुद्धि नहीं जानती; लेकिन इतना तो मैं देख सकती हूँ कि जो चीज़ मुझे बार-बार अशांत करती है, उससे मेरा मोह कितना गहरा है। इस अर्थ में नकार निराशावाद नहीं, बल्कि मुक्ति की शुरुआत है। सत्य को पाने से पहले उन धारणाओं को खोना पड़ता है जिन्हें मैं सत्य समझकर बैठी हूँ। नेति-नेति मुझे कोई नई पहचान नहीं देती; वह धीरे-धीरे मेरी झूठी पहचानों को हटाती है। और शायद इसी में शास्त्र का आईना होना सार्थक होता है—वह मुझे सत्य की कोई तस्वीर नहीं देता, बल्कि मेरी अपनी बनाई हुई तस्वीरें तोड़ता है।



















