
1. वेदान्त में सत्य की ओर संकेत करने वाले 50 शब्द और उनमें कितने सकारात्मक हैं? वेदान्त में सत्य की ओर संकेत करने के लिए अलग-अलग शब्दों का प्रयोग हुआ है। लेकिन इन शब्दों को किसी वस्तु, अवस्था या उपलब्धि की तरह पकड़ना ही मूल भूल हो सकती है। कल के सत्र में “One is not an object. One is an absence of the subject.” पर ज़ोर दिया गया है। कुछ प्रमुख शब्द: 1. ब्रह्म — सकारात्मक 2. आत्मन् — सकारात्मक 3. सत्य — सकारात्मक 4. चैतन्य — सकारात्मक 5. सत् — सकारात्मक 6. ज्ञान — सकारात्मक 7. आनन्द — सकारात्मक 8. पूर्ण — सकारात्मक 9. एकम् — सकारात्मक 10. अद्वैत — नकारात्मक 11. अखण्ड — नकारात्मक 12. निर्गुण — नकारात्मक 13. निराकार — नकारात्मक 14. निरुपाधिक — नकारात्मक 15. निरंजन — नकारात्मक 16. निर्विकार — नकारात्मक 17. निरपेक्ष — नकारात्मक 18. निर्लेप — नकारात्मक 19. निःसंग — नकारात्मक 20. निःस्पृह — नकारात्मक 21. अकर्ता — नकारात्मक 22. अभोक्ता — नकारात्मक 23. अजात — नकारात्मक 24. अचल — नकारात्मक 25. अव्यय — नकारात्मक 26. अविनाशी — नकारात्मक 27. अनन्त — नकारात्मक 28. अज — नकारात्मक 29. अव्यक्त — नकारात्मक 30. असीम — नकारात्मक 31. असंग — नकारात्मक 32. असंहत — नकारात्मक 33. अमृत — सकारात्मक 34. तुरीय — सकारात्मक 35. कैवल्य — सकारात्मक 36. स्वप्रकाश — सकारात्मक 37. कूटस्थ — सकारात्मक 38. साक्षी — सकारात्मक 39. शुद्ध — सकारात्मक 40. बुद्ध — सकारात्मक 41. मुक्त — सकारात्मक 42. शांत — सकारात्मक 43. परम — सकारात्मक 44. निरंतर — नकारात्मक 45. नेति-नेति — नकारात्मक 46. व्योमातीत — नकारात्मक 47. विषयातीत — नकारात्मक 48. अहंता-रहित — नकारात्मक 49. द्वैत-रहित — नकारात्मक 50. उपाधि-रहित — नकारात्मक इनमें से लगभग 20–22 शब्द सकारात्मक भाषा में हैं, जबकि लगभग 28–30 शब्द नकारात्मक या निषेध की भाषा में हैं। यह संख्या इस बात पर भी निर्भर करेगी कि हम किसी शब्द को किस संदर्भ में वर्गीकृत करते हैं। लेकिन असली बात गिनती से आगे है। “एकम्”, “ब्रह्म”, “आनन्द” जैसे सकारात्मक शब्द भी अहंकार के लिए नई वस्तु बन सकते हैं। इसके विपरीत “अद्वैत”, “निर्गुण”, “निराकार”, “नेति-नेति”, “विषयातीत” जैसी भाषा पकड़ को काटती है। इसलिए वेदान्त की भाषा को केवल यह देखकर नहीं समझना चाहिए कि वह क्या बताती है, बल्कि यह देखकर भी समझना चाहिए कि वह अहंकार से क्या छुड़ाती है। 2. जब मैं जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करता हूँ, तो मेरी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? क्यों? मेरे अनुसार नकार की भाषा अधिक उपयोगी है। क्योंकि सकारात्मक भाषा बहुत आसानी से अहंकार के लिए एक नया लक्ष्य बना देती है। अगर मैं कहूँ, “सत्य आनन्द है”, तो मैं तुरंत कल्पना करने लग सकती हूँ कि सत्य कोई विशेष अवस्था होगी, जिसे मुझे प्राप्त करना है। “एक” कहने पर भी मैं उसे किसी वस्तु की तरह अपने सामने रख सकती हूँ। तब “मैं” और “वह एक” दो हो जाते हैं। कल के सत्र में, “One is not an object. One is an absence of the subject.” इसलिए “नेति-नेति” मेरे लिए अधिक उपयोगी है। यह मुझे कोई नई वस्तु या उपलब्धि नहीं देता, बल्कि पूछता है कि जिसे मैं अभी तक पकड़े बैठी हूँ, क्या वह वास्तव में वही है? 🪞 शास्त्र का उद्देश्य मेरे लिए सत्य की कोई तस्वीर बनाना नहीं, बल्कि मुझे अपनी ही पहचान, धारणाओं, डर, इच्छाओं और पकड़ को देखने के लिए लौटाना है। इसलिए नकार की भाषा अहंकार को नई चीज़ देने के बजाय उसकी पुरानी पकड़ को हटाती है। सकारात्मक भाषा कह सकती है, “कुछ है जिसे पाना है।” नकार पूछता है, “जिसे तुम पकड़े हुए हो, क्या वह वास्तव में वही है?” इसी अर्थ में “नेति-नेति” केवल दो शब्द नहीं, बल्कि स्वयं को देखने की एक विधि बन जाता है।




















