
🪔 बोधकार्य 1. वेदांत में सत्य की ओर इशारा करने के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल होता है, ऐसे 50 शब्द खोजिए। फिर देखिए कि उनमें से कितने सकारात्मक (via-positiva) हैं। 🌱 सकारात्मक ब्रह्म, आत्मा, आत्मन्, परमात्मा, सत्, चित्, आनंद, सच्चिदानंद, चैतन्य, स्वरूप, स्व, साक्षी, द्रष्टा, तत्त्व, तत्, परम, पूर्ण, अद्वैत, एकत्व, कैवल्य, मुक्ति, मोक्ष, शुद्ध, नित्य, शाश्वत, अविनाशी, अमृत, अज, कूटस्थ, स्वप्रकाश, ज्ञान, बोध, आत्मबोध, ब्रह्मज्ञान, शांति, स्वतंत्रता, तुरीय, अक्षर, अव्यय, अनंत, अद्वितीय। 🌱 नकारात्मक नेति, नेति-नेति, अनात्मा, निर्गुण, निराकार, निरुपाधिक, निरंजन, निरपेक्ष, असंग, अचल, अशरीर, अरूप, अगोचर, अवर्ण, अव्यक्त, अनिर्वचनीय, अचिन्त्य, अविषय, निर्विशेष, निष्क्रिय, निष्कल, निरवयव, निराधार, निर्मल, निःसंग, निःस्पृह, निरहंकार, देहातीत, मनातीत, इन्द्रियातीत, विचारातीत, नाम-रूपातीत, देशातीत, कालातीत, विकाररहित, बंधनरहित, द्वैत-रहित, भेदरहित, द्वंद्वरहित, मायातीत, गुणातीत, प्रपंचातीत, संसारातीत, मृत्युरहित, सीमातीत, असीम, अदृश्य, अगम्य, अलक्ष्य, अवर्णनीय, अपरिमेय, अविभाज्य, अद्वितीय। 2. जब आप जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करते हैं, तो उसे व्यक्त करने के लिए आपकी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? आपके अनुसार ऐसा क्यों है? जब भी उच्चतम की बात करती हूं तो नकार में ज्यादा करती हूं। अहंकार को घटाने की दिशा के बारे में ज्यादा focus होकर बात करती हूं, और ऐसा इसलिए करती हूं क्योंकि जब से आचार्य जी से जुड़ी हूं तब से सोचने का, समझने का और चीजों को देखने का पूरा तरीका बदल गया है। पहले जो सोचने का pattern था वह लोकधर्मी था, क्योंकि वही सब बताया गया था। वही सब देखा था बचपन से और लगता था कि यही अध्यात्म है। पहले जब उच्चतम की बात होती थी तो सकारात्मक रूप में होती थी ( शांति, मुक्ति, आनंद, oneness, परमात्मा ) पर इसका असली मतलब नहीं पता था। जो भी बात होती थी, जो भी कर्मकांड होते थे, सब बेहोशी में होते थे। पहले बहुत कुछ मानती थी, अब जानना शुरू किया है, भीतर अंतर्द्वंद चलता रहता है, मन में डर भी रहता है, पर अब धीरे-धीरे चीजों को समझने लगी हूं, जानने लगी हूं और जो मान्यताएं हैं उनको छोड़ने लगी हूं। आपका सहृदय से बहुत-बहुत धन्यवाद आचार्य जी 🙏🏻



















