✍🏻 पोस्ट 7 | 19 सितम्बर '26
💭 विषय — फ़िल्में/गीत/पुस्तकें/कला───────────
🎬 प्यासा: बाज़ारू समाज में घुटता हुआ एक आदमी
1957 की फ़िल्म प्यासा में गुरु दत्त ने विजय नाम के एक ऐसे कवि की कहानी दिखाई है, जिसकी कविताओं को दुनिया कोई मूल्य नहीं देती।
विजय के अपने भाई उसकी कविताओं को बेकार समझते हैं। प्रकाशक उसकी कविता में साहित्य नहीं, बाज़ार देखते हैं। जिस समाज में उसकी संवेदना और प्रतिभा को नहीं समझा जाता, वहाँ पैसा, प्रतिष्ठा और उपयोगिता…
The world places great value on a girl who appears well-mannered, cultured, and demure, but I have come to realize the hollowness beneath that facade.☠️
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Priti Choudhary
हाँ, अगर हम लोगों की अपेक्षाओं के अनुसार चलते है तो हम अच्छे ही लगते है लेकिन एक बात भी अग़र अपनी मर्जी से कुछ करते है तब पता चलता है खोखलापन कैसे कूट कूट कर भरा रहता है, लेकिन अब सब समझ आने लगा है।
Neha
मेरे पास ऐसी कोई चीज तो नहीं जिसे दुनिया महत्व देती है लेकिन हां मेरे पास ऐसी चीज जरूर है जिसे दुनिया महत्व नहीं देती।
Sandhya
🙏🙏😥
Suneeta Devi
पता नहीं चलता लोग कब मेरी तारीफ करते हैं कब बुराई, क्योंकि मैं ज़्यादा मेल-मिलाप से दूर ही रहती हूॅं।
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Harjeet singh bachchu
matlab vijay ko apni kala ko samarpit rhna chahiye .. usme prasidhi mile to thik n mile to thik.. par vijay apne hunar ko apni kala ko value de in sab se pare..
Shyama kewat
महत्व मैंने दे रखा है क्योंकि जो महत्वपूर्ण है उससे बच सकूं
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Saraswati dhankar
मेरा जॉब जो संयोग से सरकारी है जिसको दुनिया महत्व देती है।
Gayatri Makwana
mere pass esa kuch nahi hai jise duniya mahatva de ha lekin kuch mahino se teacher ki job suru ki hai thoda bahut hi sahi logo ka muje dekhne ka ravaiya badal gaya hai naito ab tak sirf gov. ki preparation kar rahi thi to sabka behaviour or questions alag hi the...
par ab dekh paa rahi hu e sab bahari question and answer jo vyakti ko uski bahari chije jo dikhti hai usse hi milte haii par ab acharyaji ko sunti to in sabse jyada fark nai padta....
Nivedita Raje
For me, one thing the world values a lot is academic and professional achievement.
Degrees, qualifications, being a lawyer, being able to argue well or explain something intelligently these things can very easily become social currency. People listen differently when certain labels are attached to your name. And I would be lying if I said I am completely unaffected by that.
The uncomfortable part of Pyaasa is that Vijay can see the marketplace when it rejects him, but the real test comes when the same marketplace begins applauding him. Rejection makes its shallowness easy to see. Recognition makes it much harder.
I can criticise society for measuring people through degrees, professions, money or status. But what happens when those very measurements place me somewhere favourable? Do I still see their hollowness, or do they suddenly start looking quite reasonable? Perhaps that is the more useful question for me.
Not whether recognition is good or bad, but what happens inside me when it arrives.
If a title makes me feel like I have become more worthy, then somewhere I have accepted the same marketplace I claim to question.
And then the problem isn’t society’s valuation anymore. It is my willingness to use that valuation to feel valuable.
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Balvir kaur
मैं शुरू से ही बहुत व्यवहार कुशल लड़की रही हूँ, इस बात का मुझे बहुत महत्व मिलता रहा है और आज भी मिल रहा है। दूसरी बात, अपने रंग-रूप को लेकर मैंने यह बात देखी है। पर इन बातों का खोखलापन अब समझ आता है। जब तक दूसरों के अनुसार चलते रहो, तब तक तुम सबको अच्छे लगते हो। अगर सच बोल दो उनके बारे में तो बुरे कहलाओगे।
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Ulka Thakur
मैंने अपनों को और उनकी सच्चाई और भोलेपन को समाज के झूठ से तौला है।समाज या ऐसे लोग जो खुद सही नहीं है वो हमे जज करेंगे औरों के जैसा व्यवहार नहीं करेंगे,इसमें डर हावी हो गया और वहां सच, वास्तविकता को ठुकराने की कोशिश की।।😞😞
आज जब वे नहीं रहें तो उनके लिए महत्व और बढ़ गई ,इससे अंदर हमेशा अपने प्रति एक दोगलेपन महसूस होता है।समाज ,समाज जो इंसान को खाता है जीते जी उन्हें जीने नहीं देता न ही उनकी सच्चाई को महत्व देता है।हमारे अंदर कॉन्फिडेंस नहीं आता ,जब तक नौकरी न हो ।आज नौकरी और आचार्य जी के कारण हिम्मत थोड़ी बढ़ी है।
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Sandhya Verma
जैसे हम रहते है वैसा हमारी संगति रहती हैं, पद,प्रतिष्ठा , सुंदरता, पैसा , धोखा देना और धोखा पाना। ये सब हट रहा, लेकिन धीरे धीरे , मुझे बहुत ख़ुशी है देखने की नियत दी आपने आचार्य जी 🙏
🙏❤️
Shivam
पहले मैं भी जब आचार्य जी से नहीं जुड़ा था तो लोगों की बातों में आ जाता था लेकिन अब नहीं, लेकिन मैं अभी आचार्य जी को सुन रहा हूं और सुनता रहूंगा, और जहां मैं काम करता हूं, वहां के जो ,काम करने वाले हैं वे बोलते हैं कि बहुत कम बोलते हो, लेकिन उस समय में चुप रह जाता हूं। पता नहीं क्यों उनके सवालों का जवाब दे व्यर्थ सा लगता है।
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Dinesh Chandra
मुझे भी समाज में कुछ लोग एक फौजी जो ज्यादा किसी से मतलब नहीं रखता,और शायद खतरनाक है या अलग ही मिजाज़ का है, इस तरह से देखते हैं। इसमें भी वे लोग कुछ अच्छाई ढूंढ़ लेते हैं। वो ये कि वे मेरी दिनचर्या को मेरे पुराने पेशे से जोड़ देते हैं, जिनसे उनको सुरक्षा महसूस होती है। जिससे उनको खुद से सवाल न पूछने का बहाना मिल जाता है। मेरे किसी सामाजिक उत्सव में या धार्मिक कर्मकांड में शामिल न होने को वे लोग अनुशासन या सादगी का नाम देकर बचना जानते हैं।
मेरा अकेले लम्बी सैर पर निकल जाना उन्हें दिखा देता है कि मैं उनके साथ चप्पल नहीं घिसना चाहता, लेकिन फिर भी वे लोग उसे सेहत के लिए अच्छा है बोलकर बच निकलते हैं।
कुछ लोग मेरे रवैये को मेरी जाति से जोड़कर तारीफ़ों के फूल बांधने लगते हैं, ताकि उनका व्यापार चलता रहे और कोई सवाल न खड़ा हो।
मेरे ही रिश्तेदार या परिवार वाले या ससुराल वाले, जो मेरे ही रवैये से परेशान रहते हैं, वे कभी कभी मेरे इसी तौर तरीके को किसी दूसरे के सामने ऐसे सफाई से दिखाते हैं कि उनके नाम पर खरोंच आने की बजाय उन्हें और कुछ अच्छा सुनने को मिले। याने मेरे फौजी होने का और मेरा कम मिलना जुलना इसका श्रेय तो वे लेते ही हैं, अब मुझे लगता है कि मेरा आचार्य जी के साथ होना भी अब वो कुछ इस तरह से बताते होंगे कि उन्हें मजा ही आए। जबकि उनकी दुनिया में आचार्य जी कहीं भी नहीं है।
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Anjali Kumari
मेरे पास भी ऐसी चीजें हैं जिन्हें समाज बहुत महत्व देता है, जैसे अच्छे अंक, पैसा, अच्छा करियर और लोगों की तारीफ। कई बार मैं भी इन चीजों को इसलिए ज्यादा महत्व देने लगती हूँ क्योंकि बाकी लोग इन्हें महत्वपूर्ण समझते हैं।
मुझे लगता है कि असली बात यह है कि हमें खुद देखना चाहिए कि किसी चीज की सच में कितनी जरूरत है और हम उसे सिर्फ इसलिए तो नहीं चाहते क्योंकि समाज उसे बड़ी चीज मानता है। जब कोई चीज हमारे पास नहीं होती, तब उसका खोखलापन आसानी से दिखाई देता है, लेकिन जब वही चीज हमें मिल जाती है और लोग हमारी तारीफ करने लगते हैं, तो हम उसकी कमियां भूल जाते हैं।
इसलिए मेरे लिए जरूरी है कि किसी चीज का मूल्य दूसरों की नजर से तय करने के बजाय खुद समझूँ। वरना हो सकता है कि जिसे मैं अपनी सफलता समझ रही हूँ, असल में वही मेरे अहंकार की वजह बन जाए।
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Ankit Kumar Singh
Meri mobile jise duniya bahut deti Hai.
Durgesh Nandani
pranam Acharya ji 🙏🙏
sabke liye mera hanji-hanji karna sabko bahut bhata tha, ab jab se naji naji karna shuru kiya hai tab se kuch badal gaya hai.
ahnkar chahta hai ki aur gulami karo, satya chahta hai khud ko sudharo, sab sudhar jayega.....
Dipti Sharma
ऐसी तो किसी ने कभी महत्त्व दिया नहीं पर कहते है कुछ लोग की ये सबकी मदद करती है। लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता क्योंकि जब मदद करो और वो किसी को सही न लगे तो फिर हम खराब।
Shruti Thakur
"The more I come to understand the truth, the more suffocated I feel living in this society... I wonder, can't these people see that what is happening is not right? Yet, they blindly continue down the same routine path... It leaves me feeling deeply uncomfortable inside, and my mind spirals into a strange state of confusion... But then, in a way, I realize that I am feeling restless precisely because I can see... Someone living in complete unawareness—what confusion or restlessness could they possibly have?"
Kajal priya
धन,वैभव,सम्मान/प्रतिष्ठा,कौशल-इन चीजो को संसार बहुत महत्व देती हैं
मैंने कभी इन सबके पीछे के खोखलेपन को देखने की कोशिश नहीं की थी पर अब वो दृष्टि विकसित हो रहा है, आचार्य जी के अनुकंपा से ❤️❤️❤️🙏।
Pavlita Jasrotia
कड़वाहट को भी पीने की कोशिश करती थी । महत्व मिलता था अच्छा लगता था । कड़वा पचाना मुश्किल हो गया तो बुरी बन गई । खोखलापन नज़र आ गया ।
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Sushant Narayan Walk
मेरे पास नही है ।
Sanket Sudhakar Mahajan
❓ आपके पास ऐसी कौन-सी चीज़ है जिसे दुनिया बहुत महत्व देती है?
क्या आपने उसके पीछे के खोखलेपन को ईमानदारी से देखा है, या महत्व मिलते ही देखना छोड़ दिया?
👉🏽 लोग मेरे सीधेपन को बहुत महत्व देती हैं, हा उस बात का खोखलापन कभी-कभी देखता हू | मै जब भी इमानदारी से देखता हू मेरा लोगो के सामनेवाला सिधापन एक कुटील चाल होती हैं | जिसमे मै कुछ सुविधा या पहचान के सहाय से क्षेतिज गती करने की कोशिश करता हू |
Sonam
हमारे पास तो ऐसी एक ही चीज है और वह है अहंकार क्योंकि यही तो है जिसे दुनिया बहुत महत्व देती है अहंकार को ही सम्मान, धन, मकान और और रिश्ते चाहिए क्योंकि यह इतना स्वार्थी होता है कि सब चीजों को बांधे रखना चाहता है लेकिन जब मैंने इसके पीछे के खोखलेपन को देखा तो थोड़ा-थोड़ा समझ में आने लगा कि स्वार्थ समाज में नहीं हमारे अपने अंदर है
Pinki Ray
नहीं,मेरी कोइ वैल्यू नहीं हैं। अगर कोइ देता भी हैं तो मुझे उसका नियत दिखाई देती हैं...
किसलिए देगा।
AMRITASH KUMAR OJHA
मुझे अपने अंकों, पढ़ाई-नौकरी और सामाजिक विज्ञान के लिए काफी तारीफ सुनने को मिला है। पर मुझे यह साफ दिखा की यह मेरी किसी प्रेम की जाने वाली चीज को एक बहुत ही अलग आवरण पहनाया जा रहा है। या जो चीज मुझे नैसर्गिक मिली है उसकी फालतू तारीफ हो रही है।
जैसे अगर मुझे सामाजिक विज्ञान में रुचि है तो बचपन से ही घर परिवार के लोगों को लगा कि मैं सिविल सर्विसेज की परीक्षा दूंगा। लेकिन मैंने वैसा नहीं किया। हालांकि ऐसी बात नहीं है कि मैंने उसके बाद खुद को बाजार में नहीं बेचा। मैने खुद को उन्हें ढर्रों पर डाल दिया जो कभी मेरी नहीं थी पर उसे समय उतनी समझ नहीं थी।
आज वह समझ है तो मैं उनकी तारीफों को नजरअंदाज कर देता हूं और उसके पीछे का खोखलापन दिखता है ।
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SNEHA
मेरे पास मेरी डॉक्टर की डिग्री हैं जिसे मेरा परिवार और रिश्तेदार बहुत महत्व देता हैं, पर वो डिग्री जब पैसे नहीं देती तब...
मैं अभी मेरे मामा के यहां गई थी, मैं अभी जॉब नहीं करती तो पैसे नहीं मिलते हालाकि क्लिनिक हैं पर उससे इतनी कमाई नहीं होती।
तो मामा कह रहें थे की डिग्री लेके क्या फायदा जब पैसे ही नहीं मिलते।
Manoj Kumar
मेरे पास ऐसा कुछ नहीं है
YASH SAHU
एक बुलावे पर हाजिर होना और जाते ही आयोजन/कार्यक्रम को अपना ही कार्यक्रम समझकर अगुवाई करने, श्रम करने की आदत। आदमी के खोखलेपन और उनकी नियत को देखकर यह कार्य विगत 01 वर्षों में लगभग बंद-सा है।