
Pavlita Jasrotia
कड़वाहट को भी पीने की कोशिश करती थी । महत्व मिलता था अच्छा लगता था । कड़वा पचाना मुश्किल हो गया तो बुरी बन गई । खोखलापन नज़र आ गया ।
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कड़वाहट को भी पीने की कोशिश करती थी । महत्व मिलता था अच्छा लगता था । कड़वा पचाना मुश्किल हो गया तो बुरी बन गई । खोखलापन नज़र आ गया ।

पवलिता जी, आपने ही लिखा है, कड़वा पचाना मुश्किल हो गया तो बुरी बन गई। ज़रा इस पर रुकिए। बुरी बनना कड़वाहट का नतीजा नहीं है, यह कड़वाहट से बचने का एक और तरीक़ा है। जब तक पीती रहीं, महत्व बना रहा, अच्छा लगता रहा। जिस दिन पीना बंद किया, उसी दिन एक नई पहचान मिल गई, बुरी। पीने वाली से बुरी बन जाने वाली, यह भी एक भूमिका से दूसरी भूमिका में सरक जाना है, दोनों बार कोई न कोई खिताब चाहिए था खुद को थामने के लिए।

same with me