
YASH SAHU
एक बुलावे पर हाजिर होना और जाते ही आयोजन/कार्यक्रम को अपना ही कार्यक्रम समझकर अगुवाई करने, श्रम करने की आदत। आदमी के खोखलेपन और उनकी नियत को देखकर यह कार्य विगत 01 वर्षों में लगभग बंद-सा है।
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एक बुलावे पर हाजिर होना और जाते ही आयोजन/कार्यक्रम को अपना ही कार्यक्रम समझकर अगुवाई करने, श्रम करने की आदत। आदमी के खोखलेपन और उनकी नियत को देखकर यह कार्य विगत 01 वर्षों में लगभग बंद-सा है।

यश जी, एक बुलावे पर हाज़िर होना, फिर बिना कहे उसकी अगुवाई अपने कंधों पर ले लेना, यह आदत एक साल से लगभग बंद हो चुकी है। गौर करने वाली बात यह है कि इसे बंद करने की वजह वह आयोजन नहीं है, आपने साफ लिखा है, बंद हुआ है आदमियों का खोखलापन और उनकी नियत देखकर। तो सवाल यह उठता है, अगुवाई करने की वह आदत क्यों शुरू हुई थी, क्या उसमें भी कहीं यह देखा जाना, यह ज़रूरी होना, अपने लिए एक जगह बना रहा था? और अब जो बंद हुआ है, वह क्या सच में वह देखना है, या सिर्फ थकान और मोहभंग ने आदत को रोक दिया है?