✍🏻 पोस्ट 5 | 14 अक्टूबर '26 💭 विषय ─ भूगोल ───────── 🏜️ एक धरती, दो रूप! कच्छ के रण का…
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72 comments
Vidya-Avidya
✍🏻 पोस्ट 5 | 14 अक्टूबर '26
💭 विषय ─ भूगोल
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🏜️ एक धरती, दो रूप! कच्छ के रण का अनोखा भूगोल
🌊 गुजरात का कच्छ का रण एक ऐसा प्राकृतिक क्षेत्र है, जहाँ मानसून में पानी फैल जाता है और शुष्क मौसम में दूर-दूर तक सफेद नमक की परतें दिखाई देने लगती हैं। पहली नज़र में यह किसी विशाल रेगिस्तान जैसा लगता है, लेकिन इसकी भौगोलिक कहानी सामान्य रेगिस्तान से कहीं अधिक रोचक है।
🗺️ आखिर धरती का यह रूप बनता कैसे है?
कच्छ का रण भारत के गुजरात में स्थि…
जी हा बहुत बार ऐसा हुआ है कि किसी आदमी को या परिस्थिति को देख कर मै अपना राय बना लेता था पर अब कम हुआ है। मुझे लगता था कि वो ऐसा बर्ताव करता है तो वो ऐसा आदमी होगा ओर कुछ ना कुछ अपने मन में धारणा बना लेता था।
ritu singh
अधूरी जानकारी से ही कुछ भी कार्य शुरू कर दिया कर तो थी और अंत में निराशा ही मिलती थी। पता चलने पर फिर से पूरी जानकारी लेनी होती थी।जिसकी कारण समय व्यर्थ चला जाता था।
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RITESH KUMAWAT
from a long time, I was getting overwhelmed by a particular distant family member.
recently I got a chance to spend a couple of months with him during his medical treatment. with each day i got more clear picture of him that every action and word of him drives from his narsisitic EGO and his family members are participants of his way of hypnosis for getting their desires fulfilled. he shows himself as a very religious Guy but it's also another Way to get things done. he doesn't care whether others will be fine or not, it's just that his work must be done anyhow.
Neha Prakash
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शीतल shital
हां, एसा कही बार होता है ईस लीए अब मे प्रतिक्रिया देने से पेहले खुद को देख रही हु ओर कम प्रतिक्रिया देने लगी हु।
ashok
अधूरी जानकारी लेकर मैं कई शहरों और जगहों पर गया हूं बस उसकी कुछ छवियों के आधार पर लेकिन वास्तविकता और उस जगह की उपयोगिता वहां कुछ दिन बिताने के बाद पता चली।
मैं बस एक ही दृष्टिकोण से जगहों और परिस्थिति को देखता हूं लेकिन जब उससे सामना होता है अलग नजरिए, दृष्टिकोण और तथ्यों से तब भ्रम टूट जाता है कि हमें कुछ मालूम था।
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Pushpa Lahu Dudhabhate
हाँ, अक्सर मेरे साथ यही होता है|
Rahul
Yes, earlier I used to form opinions based on shallow information and even faced difficulty while changing my perspective. Ultimately, that perspective would become a part of my identity, and I would feel agitated whenever I had to make changes.
The post reminded me of some of my earlier wounds. The Rann of Kutch, too, used to feel like just a desert to me because I never had the habit of probing deeper into things. Now, I've understood the phenomenon behind its formation. Thanks a lot to the AP community!
Bhawna Sagar
हाँ, मेरे साथ ऐसा हुआ है कि मैने अधूरी जानकारी से ही व्यक्ति की स्थिति का अनुमान लगा लिया और कई बार हुआ है ।
ex..
एक बार मैं ऑटो में जा रही थी और एक महिला थी जोकि बुरखे में थी , वो पहले से ही कुछ स्नैक खा रही थी और कुछ इस प्रकार से कि उनका चेहरा भी न दिखे और वो खा भी ले मेरे लिए काफी अजीब था कि यह ओपनली क्यू नहीं खा सकती फिर सोचा कि रूल होगा कोई , उसके ब उन्होंने इशारे से अपने हसबैंड से दवाई मांगी , वो थोड़ी दूर थे , उसक बाद पानी मांगा इशारे में ही , उन्होंने दवाई खाई तो उनका चेहरा थोड़ा सा दिख गया, उन्हें देखकर मुझे लगा कि वो बोल नहीं सकती है मेरे मन में करुणा जैसा एक उभार आया , विचार आने लगे कि कितना कुछ होगा इनके जीवन में कठिन , और इसी बात को और प्रमाणित करते हुए उन्होंने फिर इशारा किया और बोल भी रही थी लेकिन शब्दों में नहीं , उसके बाद उन्हीं महिला ने जब बोला कि "लो यह दवाई भी रखलो " तब मेरी आँखें खुली की खुली रह गई और मुझे खुद पर खुद की बेवकूफी पर बहुत हंसी आने लगी , मैं ऑटो में ही हंसने लगी , में दादा भी थे साथ में unhone बोला क्या हुआ , पर क्या बताती मैं 😂😂।
उस दिन से ठान लिया है आगे से ऐसे कोई धारणा नहीं बनानी है यह गलत है ।
Kajal priya
सच्चाई पता चलने के बाद अपने निष्कर्ष को बदल दिया करती थी।
Lovely Singh
किसी चीज़ को देखकर उसका नाम जान लेना, उसे वास्तव में समझ लेना नहीं है। जैसे कच्छ के रण को देखकर वह सामान्य रेगिस्तान लगता है, लेकिन उसके पीछे जलवायु, वाष्पीकरण और भूगर्भीय इतिहास की लंबी प्रक्रिया काम करती है।
इसी तरह, हम भी किसी व्यक्ति या परिस्थिति को थोड़ी-सी जानकारी के आधार पर समझने का दावा कर देते हैं। फिर जब सच्चाई हमारी धारणा से अलग होती है, तो उसे स्वीकार करने के बजाय अपनी पुरानी राय को सही साबित करने में लग जाते हैं।
वास्तविक समझ तभी आती है, जब हम अपनी धारणाओं से चिपके रहने के बजाय वास्तविकता को जानने के लिए तैयार होते हैं। हमें निष्कर्ष पर पहुँचने की जल्दी नहीं, बल्कि सत्य को समझने की जिज्ञासा रखनी चाहिए।
Roma kuari
हाँ कई बार ऐसा हुआ है जिसके बारे में बिना जाने उसके बारे अच्छे ओर बुरे छवि बना लेती हूं ओर बाद में उसका उल्टा होता है
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Yogesh Sakhare
क्या आपने कभी किसी व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में अधूरी जानकारी के आधार पर राय बना ली और बाद में सच्चाई जानकर अपना निष्कर्ष बदलना पड़ा ? अपना अनुभव टिप्पणी में साझा कीजिए।
अभी जो मैं महाराष्ट्र पैदल चल रहा हूं तो जो एक एक कदम आगे बढ़ा रहा हूं तो मेरी जो राय इस राज्य के स्थिति के बारे में मैंने पकड़ रखी थी वह धीरे धीरे टूट फूट हो रही हैं। जैसे मुझे जो कुछ मिला है जीवन में उसमे सबकुछ संयोग से हैं। यह बात अब हर जगह को देखते देखते दिख रही हैं।
आचार्य जी ने मुझे पकड़ा है। मेरी उसमें कोई मेहनत नहीं। अब भी संस्था ने ही बहुत सारे तरीके निकाले हैं कि मैं गीता सत्र से जुड़ा रहु।
सच में भागने की संभावना बनी रहती हैं क्योंकि आसपास लोकधर्म प्रभावी हैं और भीतर भी उसका राज अभी कायम है।
हर चुनाव उसका ही संघर्ष होता हैं।
Jayant
A lot of the time, there is a saying: "Don't judge a book by its cover". I used to believe what people were saying, but now I don't listen to whatever belief comes into place. I like to know about them before concluding.
Chandani
हा कई बार ऐसा हुआ
Tikesh kumar
haa bilkul jo kuch politics hai or to kuch family ke sab ke dwra smmanit vyakti
Deepa Kushwaha
क्या आपने कभी किसी व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में अधूरी जानकारी के आधार पर राय बना ली और बाद में सच्चाई जानकर अपना निष्कर्ष बदलना पड़ा? अपना अनुभव टिप्पणी में साझा कीजिए।
हाँ बिल्कुल, ऐसा बहुत बार होता है कि किसी व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में अधूरी जानकारी के आधार पर हमारे मन में एक छवि बन जाती है, हम थोड़ी सी जानकारी या उस स्थिति को देखकर तुरंत इसके निष्कर्ष तक पहुंच जाते है। कभी भी और जानने की कोशिश नहीं करते हैं कि सच्चाई क्या पता कुछ और ही हो। लेकिन अगर सच्चाई पता चलती है तो हमें निष्कर्ष बदलना पड़ ही जाता है।
Lovely Kumari
मेरे जीवन में भी ऐसा ही हुआ है। मैंने किसी इंसान से बस दो-चार बातें करके ही उसके बारे में अपनी एक धारणा बना ली और उसे अपने जीवन का एक प्रमुख व्यक्ति, बल्कि अपने जीवन का केंद्रीय स्थान दे दिया।
मैंने अपनी अतीत की छवियों और मान्यताओं के आधार पर उसे परख लिया। मुझे लगता था कि जो व्यक्ति इस तरह के कर्म करता है, वह अच्छा है और जो इस तरह के कर्म नहीं करता, वह गलत है। अपनी ही मान्यताओं को सत्य मानकर मैंने उस व्यक्ति को भी उसी कसौटी पर परखा और उसे अपने जीवन में इतना महत्त्वपूर्ण स्थान दे दिया।
लेकिन जब आचार्य जी के सान्निध्य में मुझे एक नई दृष्टि मिली, तब समझ में आया कि मैं अपनी मान्यताओं को ही सत्य मानकर चल रही थी, जबकि मेरी मान्यताएँ स्वयं झूठी थीं।
मुझे यह भी समझ में आया कि अच्छे और बुरे कर्मों की सामाजिक परिभाषाएँ तो लगभग सभी जानते हैं। इसलिए केवल किसी व्यक्ति के बाहरी कर्मों को देखकर उसे चुन लेना या उसके बारे में कोई अंतिम निष्कर्ष बना लेना पर्याप्त नहीं है। कोई व्यक्ति यह भी जान सकता है कि समाज में अच्छा कहलाने के लिए कैसे कर्म प्रदर्शित करने चाहिए।
अब समझ में आ रहा है कि किसी व्यक्ति को अपने जीवन में स्थान देने से पहले केवल उसके कर्मों को नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे कर्ता को, उसके केंद्र को समझना भी आवश्यक है। वह जो कर रहा है, उसके पीछे उसकी वास्तविक मंशा क्या है और वह भीतर से किस आधार पर संचालित हो रहा है—यह देखना अधिक महत्त्वपूर्ण है।
आचार्य जी के सान्निध्य से मेरी दृष्टि में यही बदलाव आ रहा है कि किसी को अपनी मान्यताओं के आधार पर सत्य मान लेना और उसे अपने जीवन का केंद्र बना देना, स्वयं को भ्रम में रखना भी हो सकता है।
आज समझ में आ रहा है कि किसी को जान लेना और उसके बारे में अपनी धारणा बना लेना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
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Anima Jaria
मैं भी किसी के बारे मे अधुरी जानकरी रखी, और सच पता लगने के बाद मुझे बहुत अफसोस हुआ, सबको acha समझ लेने की गलती मै बार बार करती हूँ, बाद में बहुत दुख होता है|
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Seema Patel
हाँ मै भी कभी किसी के बारे मे गलत सोच लेती हूँ, लेकिन जब बाद मे उनके बारे मे जानकारी निकालती हूँ। तो पता चलता है कि मै जैसा सोच रही थी वो तो ऐसे हैं ही नही।
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Azad More
हाँ, बिल्कुल मैंने आधी अधूरी जानकारी से व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में मेरी राय बना ली और बाद में सच्चाई जानकर अपना फैसला बदलना पड़ा। मैं अक्सर यह करता हूं कि किसी व्यक्ति से मिला, शुरुआत में तो लगा कि अच्छा है उसके आधार पर उसको मान लिया कि अच्छा है लेकिन फिर बाद में पता लगता है कि इस व्यक्ति में तो बहुत गड़बड़ी है। अब नहीं साथ निभा सकता, फिर उसका साथ छोड़ना पड़ता है।
और मैंने बिएड में एडमिशन लिया था, थोड़ी बहुत जानकारी लेकर। लेकिन अब समझ आ रहा है कि गलत कॉलेज में आ गया हूं। अब एडमिशन निरस्त करवाना चाहता हूं।
ये बार – बार जीवन में देखता हूं। यही चीजें दोहराता हूं। आज यहां अवलोकन करके ओर नज़दीक से समझ पाया हूँ।🪔
अब चीज़ों, परिस्थितियों को बिना समझे फैसल नहीं लेना है। सुधार करूंगा।🙏
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Ranjna dubey
हां कई बार ऐसा हुआ किसी परिस्थित में अधूरी जानकारी में राय बना ली फिर जब सच्चाई सामने आई तो निष्कर्ष बबदलना पड़ता हैं
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Priyanka
काई बार ऊपरी भाव से जज कर लेती हो लेकिन जब तक किसी आंतरिक भाव को समझती तो वो मेरी कल्पना के एक दम विपरीत निकिता है।
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Anamika
Ha merai sarth bahut baar ho chuka hai baad mai afsos hota hai bahut
Vicky Re
ha मेरे साथ होते रहता है
Sima
हां, मैंने किसी की अधूरी बात करते हुए ही उसका निष्कर्ष निकाल लिया, बाद में उसकी पूरी जानकारी मिल गई, मुझे अपना राय बदलनी पड़ी।
KAJAL MEHTA
ह मैने भी यही किया । शायद इसलिए हम मेहनत से बचते है ।
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Aditya
सच्चाई जानकर अपना निष्कर्ष अनुभव में बदलना
Prasenjit Malakar
हां आचार्य ji के बारे में
Nidhi Yadav
हाँ, बहुत बार किसी इंसान या अन्य चीज़ों के बारे में मैं तुरंत राय बना लेती हूँ, मगर बाद में उस व्यक्ति से बात करके या उसके बारे में जानकर समझ आता था।