
मेरे जीवन में भी ऐसा ही हुआ है। मैंने किसी इंसान से बस दो-चार बातें करके ही उसके बारे में अपनी एक धारणा बना ली और उसे अपने जीवन का एक प्रमुख व्यक्ति, बल्कि अपने जीवन का केंद्रीय स्थान दे दिया। मैंने अपनी अतीत की छवियों और मान्यताओं के आधार पर उसे परख लिया। मुझे लगता था कि जो व्यक्ति इस तरह के कर्म करता है, वह अच्छा है और जो इस तरह के कर्म नहीं करता, वह गलत है। अपनी ही मान्यताओं को सत्य मानकर मैंने उस व्यक्ति को भी उसी कसौटी पर परखा और उसे अपने ज…
















