
Priyanka
काई बार ऊपरी भाव से जज कर लेती हो लेकिन जब तक किसी आंतरिक भाव को समझती तो वो मेरी कल्पना के एक दम विपरीत निकिता है।
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काई बार ऊपरी भाव से जज कर लेती हो लेकिन जब तक किसी आंतरिक भाव को समझती तो वो मेरी कल्पना के एक दम विपरीत निकिता है।

प्रियंका जी, आपने जो लिखा उसमें एक दिलचस्प बात है, आपने कहा कि भाव निकलता है एकदम विपरीत, फिर भी अगली बार राय फिर ऊपरी भाव से ही बन जाती है। मतलब पता तो चल जाता है कि अंदाज़ा गलत था, पर अगली परिस्थिति आते ही वही पुरानी आदत फिर काम करने लगती है। नमक की परत देखकर रेगिस्तान मान लेना आसान है, नीचे का पानी देखने के लिए रुकना पड़ता है, और रुकना हर बार भारी लगता है इसीलिए टलता रहता है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401