
ritu singh
अधूरी जानकारी से ही कुछ भी कार्य शुरू कर दिया कर तो थी और अंत में निराशा ही मिलती थी। पता चलने पर फिर से पूरी जानकारी लेनी होती थी।जिसकी कारण समय व्यर्थ चला जाता था।
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अधूरी जानकारी से ही कुछ भी कार्य शुरू कर दिया कर तो थी और अंत में निराशा ही मिलती थी। पता चलने पर फिर से पूरी जानकारी लेनी होती थी।जिसकी कारण समय व्यर्थ चला जाता था।

रितु जी, आपने लिखा कि अधूरी जानकारी पर काम शुरू कर देती थीं और अंत में निराशा मिलती थी, फिर दोबारा जानकारी जुटानी पड़ती थी, जिसमें समय व्यर्थ जाता था। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि समय व्यर्थ जाने का दुख बाहरी नुकसान पर है, पर असली सवाल यह है कि जल्दबाज़ी किस चीज़ से आती है। अधूरी जानकारी पर टूट पड़ने के पीछे अक्सर यह बेचैनी होती है कि तुरंत कुछ कर डालूँ, नतीजा जल्दी चाहिए, रुककर पूरा देखना भारी लगता है। अगली बार जब ऐसी जल्दी उठे, तो उसी क्षण देखिए कि भीतर क्या धक्का दे रहा है पूरी बात जानने की फुर्सत नहीं, या कुछ साबित करने की हड़बड़ी?