✍🏻 पोस्ट 01 | 18 सितंबर '26💭 विषय — पर्यावरण एवं जलवायु─────────🌍 15 कंपनियाँ, 85.9 लाख टन कार्बन: कीमत कौन चुकाएगा?बांग्लादेश के परिधान निर्यात का 26.3% हिस्सा 15 बड़ी वैश्विक फैशन कंपनियों की खरीद से जुड़ा है।स्टैंड. अर्थ के विश्लेषण के अनुसार, अगर ये कंपनियाँ स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव में पैसा लगाएँ, तो 2040 तक करीब 85.9 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन रोका जा सकता है।
*⚡ बांग्लादेश के बिजली तंत्र में नवीकरणीय ऊर्जा की…
This post should reach everyone. A few years back this trend of overconsumption has grown tremendously. Half of it because everyone gets a chance to show their pictures, videos etc in social media. Reels of not just clothes but simple home utility items are being shared due to affiliate marketing. The cons of all of this is going to be paid by nature alone.
The people born in 80s and 90s can easily correlate with the increase in spending and over consumption.
During my school days I never saw a single temple of Sai Baba or Sani Dev in my hometown. But, in last decade there has been a increase in these temples in my hometown. They don't just increase religious activities but also sell many items near these temples that is a sign of overconsumption. yes, certainly it has employed people in and around it. I see a lot of religious activities that need the entire group to wear a perticular colour, pattern of cloth for that occasion. And the worst is they don't even repeat it in the next puja or activity they engage in. Last time I visited my village, I saw many temples being built. When I asked someone, "I didn't see this before" I got a reply they get government grants to build temples and to perform in certain rituals. And everyone gets a chance to showcase their talent, clothes, belongings with the presence of social media.
Can we go back to that way of living where we used to repeat our clothes be it any occasion. How many people do that really? People are engaged in overconsumption and show casing all these. Yesterday, one of my friend from childhood started a new channel just to showcase how she is decorating lord Krishna, Jagannath and other deities at her home on a daily basis. Can we really show them the negatives of these?
The worst part of religious clothes is people dump them in rivers because that has been the norm from our childhood. We don't segregate them, recycle them but just dump them in our water bodies.
Sarita
भारत में लोकधर्मीयों ने सभी त्योहार, भंडारा, बर्थ-डे पार्टी न जाने कितने डे वगैरह और स्कूल में भी क्या - क्या फंक्शन सेलीब्रेट किए जाते हैं पर ये सभी फंक्शन का ट्रेंड कपड़े ,मेकअप, तेज साउंड वाला डी जे ,हुड़दंग, मीट,डेयरी प्रोडक्ट के दोहन के बिना अब पूरा ही नहीं होता ।सबका रूप 'अहम की अपूर्णता का भोग ' करने के लिए बन गया है और हम और कितना और भोग लें ,झूठा दिखावा कर लें इसी में अंधे हैं। साधारण अब कुछ रह ही न गया ।हम अपनी नीयत को परखने और सभी का महत्व समझ कर आवश्यकतानुसार ही सब उपयोग करें
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Rekha Chaturvedi
Aacharya ji ko sunne k bad jo v kuch kharidari husme sbse pahle swal Krna sikh gyi hu kyu lena h,iski jrurt kitni h,ya ye ki iski jarut h v ya bs aise hi pasand aa gya.jarurt ko dyan rkhti hu wo v bises jarut,isse mera ek faida to hua h ki fijul kharch ekdm na ho gya h.dhanyawad Aacharya ji, simple pahle v rehti thi ab bilkul simple ho gyi hu or ye bahut hi acha lgta h,bahut sari baten Aacharya ji ki chot ki tarah lgi ahankar ko or wo bahut kuch sikhati chali gyi🙏
Vimlesh Saini
नहीं रखते हम उसकी वास्तविक क़ीमत।
Meera Singh Kakan
मैं कभी भी बहुत अधिक खरीदारी नहीं करती थी। आचार्य जी से जुड़ने के बाद इस बात का ध्यान रखती हूं कि अनावश्यक वस्तुएं घर में न आएं।
Archana
when not join the session I will not think but that days I didn't buy much more and consuming is less
dheerajkuntal
dikhae sab ko de rha h,
bs sabhi doosre ka intzar kar rhe h,
koe
aae or sab shi kar de
ahikar apni galti maan le to karta mumukchhu bn jay
Parmar Kalpana
इश्क है आसमान में उड़ जाना ओ सत्र में आचार्य जी ने समझाया है कि अहंकार हर चीज में अपनी बेचैनी मिटाने की कोशिश करेगा। पर उसके बेचैनी कभी नहीं मिटने वाली है। कपड़े बदलते रहेंगे पर अहंकार तो वही रहेगा
Yashpal Singh
अहंकार = कार्बन डाइऑक्साइड
रजनी नाघरे
जब व्यक्ति को पैसों का लालच होता है तो वह प्रकृति की रक्षा क्यों करेगा l
आत्म अज्ञान की वज़़ह से , सही ज्ञान सही काम
Rahul
This is why exposure to the Gita, Upanishadic and Vedantic teachings can be important not merely for acquiring another set of beliefs, but for examining the one who is doing the chasing. If the desire behind the chase is never examined, fulfilling one desire will simply give rise to another, and the chase can become endless.
Earlier, I used to keep accounts largely according to my own convenience, while neglecting the full cost of what I was pursuing. I would compromise things that mattered for the sake of temporary pleasures and immediate gratification.
Now, the inquiry is different: What am I gaining, what am I compromising, and who is the one demanding this gain in the first place?
Raka Devi
हमनें अपनें बचपन में देखा कि एक ही नये कपडें की त्योहार निकल जातें थें अब हर त्योहार पर नया कपडा और शादी-ब्याह में तो पूछो मत रस्म पर नया कपडा, क्योकि हर फोटो में अलग कपडा होना चाहिए नही तो लोग टोकने लगतें हैं, आरे आप कें पास एक ही कपडा हैं क्या। मुझें तो फर्क नही पङता।
Surya kant Biswas
That's the problem. I have never learnt how to build a proper ledger regarding what am I using and consuming in my daily lives.
The carbon cost calculation is never included in my ledger.
Sahil Dhanda
जब काम भरा हो आँखों में, तब सच नजर नहीं आता है 🙏
Preeti Patel
सुविधा का ख्याल तो रखती हूॅं लेकिन उसकी कीमत भूल जाती हूॅं।
Arti Gupta
अगर चाह वही रहे, तो ऊर्जा का स्रोत बदलने से भी जड़ नहीं बदल सकती क्योंकि जब तक सारी माँग अहंकार के केंद्र से संचालित होंगी सतही बदलाव से कुछ खास अंतर नहींपदने वाला।
🧐क्या मैं भी अपनी सुविधा का हिसाब रखता हूँ, लेकिन उसे पाने की पूरी कीमत अपने बहीखाते में दर्ज करता हूँ?
अगर अभी की बात करूं तो हा अब मैं जरूरत और शौक में अंतर करने लगी हु जितना जो मुझे जरूरत का लगता है , मै अब उसे तब ही खरीदती हूं जब लगता है कि इसके बिना काम नहीं चलेगा।
poonam bhatt
ahaankar khud ko bachane ke liye naye naye tarike dundhta h par khud ko nhi dekhta
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Padmalochan Hembram
ego = carbon dioxide
Vivek Kumar
लोग शेयर मार्केट में पैसा लगा रहे है और ये नहींसमझ रहे है कि वो कम्पनी आखिर काम क्या करती है ,उनका भी बड़ी भूमिका का धरती 🌍 के शोषण में ।
RITU
मैं भी अपनी सुविधा का हिसाब तो रखती हूं लेकिन उसे पाने की पूरी कीमत का हिसाब नहीं लगाती।
Akanksha Mishra
mai hamesha hisab se sb kuch krti hu pr ye nahi samajh payi ki kya na kru ki paryavaran ko nuksan na pahunche
Heeralal Yadav
सारी समस्या की जड़ भीतरी अज्ञान ही है और बढ़ती जनसंख्या
Reeta Gautam
मुझे शुरू से व्यर्थ के खर्चे पसंद नहीं थे, तब आर्थिक हिसाब किताब होता था ।
असली हिसाब किताब तो आचार्य जी से जुड़कर जाना ।
ये बोध वाली है अब देखती हूं कि पर्यावरण को कितना नुकसान हो रहा है ।
Nilam Maurya
पढने के बाद मुझे यह समझ आया की।परिधान निर्यात और ऐसी चीज जो प्रकृति को नुकसान पहुंचा रही है। इसे सही समय रहते नहीं रोका जाएगा तो एक समय ऐसा आएगा की
मनुष्य द्वार जो निर्मित की गई जहरीली गैस ,कार्बन डाइऑक्साइड का घनत्व बढ़ता जाएगा और एक समय ऐसा आएगा कि ऑक्सीजन की मात्र कम होते जाएगी और इस तरह पृथ्वी पर रहने वाले जीव जंतु और मनुष्य की हालत बहुत खराब हो जाएगी मनुष्य द्वारा की गई खराब करनामो के करण वे वेजुवन जनवारों को भुगतान पड़ेगा जिसका कोई कशुर नहीं है
प्रकृति जो अस्तित्व बनाए राखी है वो धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खो देगी।
और इसका एक मात्र समाधान है आचार्य जी का ज्ञान का प्रकाश हर जगह फैलाना
आचार्य जी का ज्ञान से हम आत्मज्ञान भी बन रहे हैं और साथ ही आचार्य जी हमें प्रशिक्षित भी कर रहे हैं. तो हमारा कर्तव्य है कि इस ज्ञान को अपने पास न रखा जाए, हम इस ज्ञान को हर जगह फैलाए जाएं। जितना जल्दी ज्ञान को फैलेंगे उतना जल्दी हम सब मिलकर प्रकृति को संकट से बचा सकते हैं और इंसान को रोज़मर्रा जीवन से मुक्त कर सकते हैं।✊✊✊✊✊✊ अपने हाथ की मुट्ठी बांधो और बोलो हम सब मिलकर अपने प्रकृति को आने वाले संकट से बचा सकते हैं
Saurabh
हाॅं, मैं भी केवल अपनी सुविधा का हिसाब रखता हूॅं। लेकिन उसे पाने की पूरी कीमत अपने बहीखाते में दर्ज करता हूँ?
कपड़ा पाने का लाभ देखता हूॅं, लेकिन प्रकृति और सूक्ष्म जीवों कितना नुक़सान हुआ है, उसको नहीं देखता हूॅं।
Priya Pant
मैंने देखा है जब मैं कम्युनिटी से जुड़ जाती हूं तो मेरे फालतू के खर्चे बंद हो जाते हैं।
मुझे नए-नए कपड़े खरीदना बहुत अच्छा लगता था लेकिन जब तक वह मुझे मिल नहीं जाता था।
और जब कपड़े आ जाते थे फिर मन भर जाता था। फिर मन दूसरे नये कपड़ों की ओर भागता था।
कम्युनिटी से जुड़ जाने के बाद आलतू फालतू चीजों में दिमाग ही नहीं जाता है।
समस्या उस अधूरेपन में है जो हमें लगातार अधिक सुविधा और अधिक वस्तुओं की ओर खींचता है।
Renu Singh
कीमत तो आज नहीं तो कल हमें ही चुकानी है। सही मायने में कहा जाए तो अभी भी चुका ही रहे है ।कहां है वह मौसम जो हुआ करते थे। हमारे जीवन शैली ही हम पर भारी पड़ रही है और अहंकार बाहरी विषयों पर ध्यान दे रहा है ।और अपने अंदर झांकने की कोशिश नहीं कर रहा है। हमारी जरूरत से ज्यादा उपभोग करने की वजह से ही यह सब हो रही है ।ना हम उपभोग इतना करेंगे ना बाजार में इतनी चीजें उपलब्ध होगी। जब हमारी डिमांड बढ़ती है तभी मार्केट में भी तरह-तरह की वस्तुओं का निर्माण होना शुरू होता है। जब तक हम अपने अहंकार के ऊपर लगाम नहीं लगाएंगे तब तक यह होती रहेगी। तो हमें अध्यात्म की ओर बढ़ना चाहिए ।और आचार्य जी की कही बातों के अनुसार खुद को आईने में देखना चाहिए। एक ही रास्ता है अपना आत्ममलोकन करें। मैं तो जब से आचार्य जी के संस्था से जुड़ी हूं फालतू खर्चों पर लगाम लगाई हूं और आगे भी कोशिश करती रहूंगी। ❣️❣️🙏🙏
Priyanka
गीता के सत्रों (sessions) से जुड़ने से पहले तक, मैं अपने दुखों को ढकने के लिए और खुद को छोटी-मोटी खुशी देने के लिए कपड़े खरीदा करती थी, जो कि शरीर की जरूरत से कहीं ज्यादा होते थे। सेल (sale) देखकर, 'सस्ते हैं' या 'ऑफर्स हैं तो बाद में काम आ जाएंगे' का बहाना बनाकर मैं उन्हें खरीद लेती थी। नए-नए डिज़ाइन के कपड़े मुझे आकर्षित करते थे ताकि उन्हें पहनकर मैं सबसे अलग और श्रेष्ठ (superior) दिखूं।बाजार में या ऑनलाइन कपड़े देखते ही उन्हें लेने की तीव्र इच्छा होने लगती थी और अगर वे मेरी पहुंच में होते, तो ना-ना करते हुए भी बिना किसी आत्म-नियंत्रण (self-control) के मैं कुछ ना कुछ तो ले ही आती थी।लेकिन अब, जैसे-जैसे गीता जीवन में उतर रही है... वैसे-वैसे ही इन कपड़ों के लिए मेरी व्याकुलता और तीव्र इच्छा अपने आप कम होती जा रही है। अब नए और अलग डिज़ाइन के कपड़ों के लिए पहले की तरह मन नहीं ललचाता।बल्कि अब मुझे जहाँ भी जरूरत से ज्यादा लगता है, मैं वहाँ खुद को रोक पाती हूँ... देख लेती हूँ कि इतनी तो जरूरत नहीं है, तो अब और लेना केवल अहंकार (EGO) को पोषित करना होगा।अब शॉपिंग से बचे हुए पैसों को मैं अपने मिशन के योगदान में लगाती हूँ... ♥️ और खुद के लिए तथा दूसरों के लिए किताबें खरीदने में इस्तेमाल करने लगी हूँ। 🪔❤️🔥 सूरज न बन पाओ तो बन के दीपक जलता चल 🪔🙏
JITESH KUMAR TELI
मैं अब अपनी आवश्यकता के अनुसार ही वस्तुएं खरीदता हूं और इससे मेरा ही फायदा हुआ है।
Priyanka Mondal
हम बस स्वार्थपर की तरह अपने को जो चाहिए उस चीज का अपने हिसाब से हिसाब रख लेते हैं। पर अगर वो दुनिया को कहीं ना कहीं बहुत हिसाब चुका रहा है, तो हम उसको उतना देखते नहीं हैं और अगर दिख भी रहा है, तो ये बोल के अवॉयड करते हैं कि अब हम क्या ही कर सकते हैं, इसके सिवा और क्या ही व्यवहार करें। ये तो आपको जरूरत है ही है। तो ठीक है, कई कभार ऐसे होते हैं कि आप उस चीज को त्याग नहीं सकते जो दुनिया के लिए खराब हो, पर आप उन चीजों का तो देखो, जो चीजें आप कर सकते हो। आप उस चीज का पूरा विस्तार से देखो, कि अगर वो चीज कर रहे हों, तो वो सबके हिसाब से देखो, न कि सिर्फ खुद के हिसाब से।
✍🏻 पोस्ट 01 | 18 सितंबर '26 💭 विषय — पर्यावरण एवं जलवायु ───────── 🌍 15 कंपनियाँ, 85.9…