
Arti Gupta
अगर चाह वही रहे, तो ऊर्जा का स्रोत बदलने से भी जड़ नहीं बदल सकती क्योंकि जब तक सारी माँग अहंकार के केंद्र से संचालित होंगी सतही बदलाव से कुछ खास अंतर नहींपदने वाला। 🧐क्या मैं भी अपनी सुविधा का हिसाब रखता हूँ, लेकिन उसे पाने की पूरी कीमत अपने बहीखाते में दर्ज करता हूँ? अगर अभी की बात करूं तो हा अब मैं जरूरत और शौक में अंतर करने लगी हु जितना जो मुझे जरूरत का लगता है , मै अब उसे तब ही खरीदती हूं जब लगता है कि इसके बिना काम नहीं चलेगा।















