✍🏻 पोस्ट 22 | 24 सितंबर '26
💭 विषय — मानव उत्कृष्टता────────────
🎶 कुमार गंधर्व: जब उत्कृष्टता अपनी आवाज़ खोजती है
🎤 कुमार गंधर्व जी भारतीय शास्त्रीय संगीत के ऐसे कलाकार थे जिन्होंने अपनी अलग गायकी से संगीत की स्थापित धारणाओं को चुनौती दी।
लेकिन उनकी असाधारण यात्रा केवल उनकी प्रतिभा की कहानी नहीं है। उनके जीवन में एक ऐसा दौर आया जिसने उनकी आवाज़ और गायन, दोनों को हमेशा के लिए बदल दिया।
🫁 युवावस्था में उन्हें *क्षय रोग (Tuberculos…
हम किसी सीमाओं से नहीं बंधे होते, बल्कि हम डरते हैं उस "मैं" से।
Vimla Patel
सीमाओं से बंधे नहीं है बल्कि बदलाव से डरते हैं और उसकी वजह है "मै" और उसकी पहचान।
Manisha kumari
simao se bhandh janaa bs ek parda hai
jise hum moti diwaar bna baithte hai
such mai aham bhaw se darte hai,
shayad mai khud bhi aham se grasit
hokar bol rahi hun.
ese dekh janchna bahut jaruri hain.
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Mukesh
सही जगह पर चोट है उस मैं को बदलने से डरते हैं
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ANKIT KUSHWAH
मैं छोटी सी बीमारी को इतना बड़ा मान लेता हूँ कि जो छोटे- छोटे काम हैं वो भी पूरा नहीं करता। बहुत शर्म आती हैं अपने आप पर।
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Isha
हम अपनी सीमाओं से नहीं बंधे हैं बल्कि उस मैं से जो उन्हें बदलने से डरता है। किसी भी क्षेत्र में कुछ नया प्रयोग या किसी भी कार्य को नए ढंग से करने से पहले बहुत प्रश्न मन में जागृत होते हैं कि मेरे आस पास वाले मेरे बारे में क्या सोचेंगे कि मैने उनकी परंपरा का पालन नहीं किया। कहीं वो मेरे प्रयोग को विरोध की तरह तो नहीं लेंगे और फिर मेरी उस छवि का क्या जो हमेशा सामाजिक स्वीकृतियों के पीछे ही भागती रही है
Puja kumari
ham apni kamjoriyon ko apni pahchan bana lete hain.
Nishi kumar
हां हम भी उस समय को पकड़े हुए हैं जो हमें डराता है और हम उसे प्रगति भी नहीं जब फरकते हैं तो अपनी ही मानता टूटने लगती है
Rani
khud ko badalne se darna
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Chhotu Kumar jha
हम मैं में हीं लगातार फंसे हुए हैं, और जब तक हम अपने मैं को चुनौती नहीं देंगे हम इससे बाहर नहीं आ पाएंगे।🙏🙏🙏🙏🙏
Nirmala Pratap
सही केंद्र से सही काम जीवन पर्यंत करनी चाहिए , परिणाम जो भी आयेगा सब सही होगा।
Deepa Kushwaha
❓ क्या हम सच में अपनी सीमाओं से बंधे हैं, या उस ‘मैं’ से जो उन्हें बदलने से डरता है?
हम सच में अपनी सीमाओं से बंधे नहीं होते बल्कि उस ' मैं ' से ही बंधे होते हैं जो बदलना नहीं चाहता। जिसको बदलने से डर लगता है।
जबकि यदि हम बदलने का चुनाव कर ले तो ये सीमाएँ हमारी रुकावट नहीं बनती, अहंकार ही रुकावट बनता है क्योंकि उसकी पहचान, उसकी धारणा, उसकी मान्यता को बदलना पड़ता है इसलिए हमारा मन में तरह तरह की कल्पनाएं करने लगता है कि ऐसा हुआ तो ऐसा हो जाएगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता है।
इसको मैं एक अपने साथ हुई घटना से जोड़ना चाहूंगी, मैं बिना बताए bookstall जाती थी और एक रात मैं बुक स्टॉल टीम के साथ उनके यहाँ रहने चली गई। मैं उस रात रूम पर नहीं आई तो मकान मालकिन कॉल करके डांटने लगी और मेरे परिवार वालों से बात करने को बोलने लगी, उस वक्त मुझे समझ नहीं आया कि क्या करूँ लेकिन फिर मैंने हिम्मत दिखाई और अपने पापा से बात किया, उनको सब बताया, तो पहले वो थोड़ा बहुत डांटने लगे फिर बोले की ठीक है कोई बात नहीं।
फिर अगले दिन मैंने यह बात अपने पापा के सामने रखी कि मुझे टीम के साथ रहना है और वहीं मुझे काम करना है, मुझे गवर्नमेंट जॉब नहीं करनी।
इसके लिए भी मुझे मेरे परिवार वालों से बहुत सुनना पड़ा लेकिन फिर पापा बोले कि मैं वहां जब आऊंगा तब चली जाना लेकिन मैं जब तक नहीं आता हूँ तेरे रूम पर तब तक तुम कहीं नहीं जाना, बुक स्टॉल पर भी नहीं।
और मैं अभी उनकी बात मानकर नहीं जा रही बुक स्टॉल पर क्योंकि कुछ दिन बाद वो आ जाएंगे तो जहाँ टीम रहती है उनके यहाँ शिफ्ट करा देंगे।
क्या मैं अभी बुक स्टॉल जाऊं या नहीं, मुझे नहीं समझ आ रहा, क्योंकि अगर ये बात घर पर पता चली तो वो मुझे टीम के साथ फिर कभी नहीं जाने देंगे
मैं अभी क्या करूँ?
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Rajkumar Jatwa
जग दर्शन का मेला
MaNorama Vyas
सच्ची स्वतंत्रता शायद सीमाओं के समाप्त हो जाने में नहीं, बल्कि उनके सामने खड़े होकर यह देखने में है कि मेरे भीतर कौन-सा ‘मैं’ पीछे हटना चाहता है। जब यह डर थोड़ा ढीला पड़ता है, तब मिली हुई परंपरा, परिस्थिति या सीमा अंत नहीं रहती—वही आगे बढ़ने की शुरुआत बन सकती है।
sarala khare
“उत्कृष्टता केवल अपनी पुरानी क्षमता को वापस पाने में नहीं है ,बल्कि बदली हुई परिस्थितियों को समझ कर अपनी क्षमता का नया रूप खोजने में भी हो सकती है ।”
कितना सुन्दर वाक्य है! कल के सत्र में जो मेरी समझ अधूरी रह गई थी उसे एक नया आयाम मिला ।
Sandhya Sharma
you can't sahi hai usse Aakhri Dam Tak karte raho
Ganga ji
अक्सर हमें हमारी सीमाएँ नहीं, बल्कि उनसे चिपका हुआ ‘मैं’ बाँधता है।
सीमा परिस्थिति हो सकती है, लेकिन उसे देखकर रुक जाना या उसके भीतर से नया रास्ता खोज लेना—यह हमारे देखने और चुनाव पर निर्भर करता है। कुमार गंधर्व जी ने अपनी शारीरिक सीमा को स्वीकार करके उसी के भीतर नई गायकी और अपनी मौलिक पहचान खोजी।
यही मानव उत्कृष्टता है—सीमा को बहाना नहीं, नई संभावना का आधार बना देना।
Prince kumar
दोहराना ही नहीं होता कुछ अलग भी किया जा सकता है ✌
Komal
अपनी सीमाओं से नहीं बंधे या उस ‘मैं’ से जो उन्हें बदलने से डरता है पेहले मै बहुत खुद को बचाने की कोशिश कर ति
पर aachrya ji से जुड़ने से डर को छोड़ पा रहे है
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Prince yadav
मैं खुद को बदलने से डरता है ।
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Shivansh Soni
जो काम सही है वह जीवन की अंतिम सांस तक करते रहो परिणाम कुछ भी
Gyan Kaur
मै, से जो मे बदलने से डरता है
ANKIT RAJ
Agar sachhi nazar se dekhu to paristhitiyan kam zimmedar hoti hai ye Main hi hai jo unn parishthitiyon ka sahara le kar ek kahani gadh leta hai aur khud ko bachaye rakhta hai.
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Anita Dodiyar
ham me ke badle se derte h
Binod Shaw
गहराई से देखें तो मनुष्य परिस्थितियों से उतना नहीं बँधता, जितना उस छवि से बँधता है जो उसने अपने बारे में गढ़ रखी है। जब हम कहते हैं कि यह मेरी सीमा है, तो अक्सर हम एक तथ्य नहीं, बल्कि एक सुरक्षा कवच बयान कर रहे होते हैं। सीमा को तोड़ना केवल एक आदत या स्थिति को बदलना नहीं है, बल्कि उस पुराने मैं की मृत्यु जैसा है जिसने उस सीमा के भीतर जीना सीख लिया था।
Nilam Maurya
मैं किसी बंधन से नहीं बंधी हूँ बस मैं उनके मैं के बंधन से बंधी हूं . मेरी माँ है,जो उनका जो मैं है खोने से डर रही है
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Braj mohan
मैं यदि ईमानदारी से देखूं तो मैं सच में सीमाओं से बंधा हुआ नहीं हूं l मैं अहंकार की वजह से रुका हुआ हूं क्योंकि अहंकार चाहता है की सीमाओं को मत तोड़ो क्योंकि यदि सीमाएं टूट गई तो वह भी टूटने लगता है इसी कारण वह आगे बढ़ने से डरता है l
KULDEEP YADAV
मैं से जो उन्हें बदलने से डरता है। डर लगता हैं कामयाब नहीं हुईं तो, तो जो है वो भी छिन जायेगा।
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Pankaj Kumar
sidhe-sidhe Taur per Ahankar Satya Ko Nahin Apna tha bahut jaldi ..
✍🏻 पोस्ट 22 | 24 सितंबर '26 💭 विषय — मानव उत्कृष्टता ──────────── 🎶 कुमार गंधर्व: जब…