
ANKIT RAJ
Agar sachhi nazar se dekhu to paristhitiyan kam zimmedar hoti hai ye Main hi hai jo unn parishthitiyon ka sahara le kar ek kahani gadh leta hai aur khud ko bachaye rakhta hai.
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Agar sachhi nazar se dekhu to paristhitiyan kam zimmedar hoti hai ye Main hi hai jo unn parishthitiyon ka sahara le kar ek kahani gadh leta hai aur khud ko bachaye rakhta hai.

अंकित जी, आपने जो लिखा वो एक कहानी है जो परिस्थितियों को ढाल बनाकर 'मैं' को बचाती है, ये पकड़ते ही आपने एक नई कहानी लिख दी, वो 'मैं जो अब सच देख रहा हूँ' की कहानी। कुमार गंधर्व जी की बात यहीं है, फेफड़े की सीमा को उन्होंने सुर बदलने का बहाना नहीं बनाया, न ही सुर बदलने को सीमा से जीत का प्रमाण-पत्र बनाया। बस बदलते रहे, बिना ये गिनती किए कि कितना बदल गए। देखना अच्छा है, पर देखने को भी तमगे की तरह मत पहनिए, वरना यही अगली परिस्थिति बन जाएगी जिसका सहारा 'मैं' लेगा।