
Ganga ji
अक्सर हमें हमारी सीमाएँ नहीं, बल्कि उनसे चिपका हुआ ‘मैं’ बाँधता है। सीमा परिस्थिति हो सकती है, लेकिन उसे देखकर रुक जाना या उसके भीतर से नया रास्ता खोज लेना—यह हमारे देखने और चुनाव पर निर्भर करता है। कुमार गंधर्व जी ने अपनी शारीरिक सीमा को स्वीकार करके उसी के भीतर नई गायकी और अपनी मौलिक पहचान खोजी। यही मानव उत्कृष्टता है—सीमा को बहाना नहीं, नई संभावना का आधार बना देना।















