
MaNorama Vyas
सच्ची स्वतंत्रता शायद सीमाओं के समाप्त हो जाने में नहीं, बल्कि उनके सामने खड़े होकर यह देखने में है कि मेरे भीतर कौन-सा ‘मैं’ पीछे हटना चाहता है। जब यह डर थोड़ा ढीला पड़ता है, तब मिली हुई परंपरा, परिस्थिति या सीमा अंत नहीं रहती—वही आगे बढ़ने की शुरुआत बन सकती है।




























