✍🏻 पोस्ट 27 | 23 सितंबर '26
💭 विषय — लोकधर्म─────────“गुड गर्ल सिंड्रोम”
👧 बचपन से ही लड़कियाँ कुछ बातें सुनती हुई बड़ी होती हैं: बड़ों की बात मानो, ज्यादा बहस मत करो, ठीक से बैठो, कपड़े संभालकर पहनो, घर का ध्यान रखो और अपनी इच्छाओं से पहले दूसरों के बारे में सोचो।
👉 धीरे-धीरे इन बातों से एक छवि बनती है, “अच्छी लड़की ऐसी होती है।” अलग-अलग समाजों में इस ‘अच्छाई’ के रूप अलग हो सकते हैं, लेकिन *आज्ञाकारिता, शालीनता, परिवार की सेवा और…
next time agar mujhse koi ye bolega to mai bhi bilkul aise hi chappal dungi 😂🤣🤣
Tanu
अच्छा वही है जो सही और सच्चाई की ओर चले और आचार्य जी हमे वो रास्ता दिखाने का काम कर रहे हैं l
Deepali Tiwari
Not only in personal life or society setup. This happens a lot in professional life specially in corporate. The entire chain from a junior employee to leadership, judge the way a woman employee behaves. If a male colleague at the same level shows command- he’s listened to, followed & called confident, while a woman is called bossy, irritating. How to break this pattern and still continue to grow in your career?
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Nandani
नहीं ,मुझे अपनी बात और अपना विवेक दबाने के लिए, कहा जाएगा तो,मैं उनके नज़र में अच्छी बनने के लिए ऐसा नहीं करूंगी, अच्छा तो तब हैं जब आप सही चेतना और विवेक से अपना निर्णय खुद लेते हैं, किसी की नजर में अच्छा बनने के लिए, अपनी बात नहीं दबा सकते, अच्छा बनना हैं तो, खुद की नजरों में बने खुद के लिए जो सही हैं वो करे, ना की लोगों की नज़र में अच्छा बने।
मेरी नजर में तो अच्छा वो हैं जो, सही चेतना और आत्मज्ञान वा सही समझ,से अपनी बात रखते हैं ना,कि लोगों को जो सही लगे वहीं करते हैं, लोगों को क्या अच्छा लगता हैं, और क्या नहीं इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए, वास्तव में ये देखें की क्या हमारे लिए सही है और क्या हम सच्चाई के साथ हैं।।
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Akta singh
mai bhi aisi hi thi hu lekin iski bhut badi keemat chukani padi hai aour bhi chuka rahi hu jiska asar ye hua ki mai 23 sal se deppration jhel rahi hu aour mai isse nikalna chahti hu koshish karti hu lekin fir har jati hu iska bhut bura nateeja bhogana pad raha hai uthati hu aour fir gir jati hu
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Lalit Tyagi
अच्छा वो जो सच्चा है ।जो सच्चाई को प्राथमिकता दे ।
Sandhya Kumari
मै भी ऐसी ही थी और आज भी काफी हद तक ऐसी ही हु लेकिन अब इन बनाई हुई छवियों से निकलने की यात्रा पे हू ।
इन सबसे मुझे डर, आलोचना और खुद की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं हासिल हुआ इनलोगों के लिए कितना कर दो लेकिन हर जगह ये हमें ही गलत ठहराते है क्योंकि हम एक लड़की है।
Niharika Neha
pahle mai bhi achchhi bachchi hi bankar rahti thi. kyuki isi tarah sanskarit kiya gya tha .ab bolti hu to samne vale ko kast ho jata hai .par mujhe usse koi kast nahi .
युगेश्वरी साहू
पहले मेरे लिए भी अच्छे की परिभाषा यही थी कि मैं जो भी करूं उसमें मुझे प्रशंसा मिले ,स्वीकृति मिले सब की नजरों में अच्छी रहूँ।
किंतु वास्तव में अच्छे की परिभाषा क्या है वह गीता सत्रों में आकर ही जाना अच्छा वह है जो सत्य के अनुसार हो, जिसमें स्वार्थ, डर और अहंकार से लिए गए फैसलों की जगह विवेक हो।
Shubham kumar
अच्छा वो है जो बोध से आता है
Sima Yadav
Me bhi asi hi hu lekin dheere dheere sb kuch badal raha h achrya ji ko sunne ke baad me apne liye ab bol pati hu thank you achrya ji
Dr. Sucheta Kundu
अच्छा वही है जो भीतर से आता हो।
Ved Prakash
सिर्फ सच्चा ही अच्छा है बस ।
Rahul
Well, there’s a famous saying that "elders usually feel disrespected when you don’t let them disrespect you." So, the "good" or "right" thing is often defined as anything that falls within their boundaries.
But the switch shouldn’t be made instantly towards disrespecting them from now on, because that would simply make us act exactly like them.
The more honest question would be: "Who is this 'I' that feels compelled to pay respect to such individuals?
Is it really respect, or is there some selfish motive behind this compulsion?" The more honestly one inquires, the greater the possibility of coming out of the trap. Otherwise, the shackles will remain tied to the same old point.
Vinit
🕊️अच्छे का मतलब " खुद को समझते भी हो" जो खुद को समझता हो ,सही नियति से हर काम ,वस्तु ,भावनाओं को देखता हो ,फिर वो जो कुछ भी करेगा वो सही ही होगा।
☘️और जो दूसरों की बातों के लिए अपने विचार और विवेक को दबाता हो वो कहा से अच्छा होगा ,वो तो गुलाम होगा । मुझे तो लगता है आज जो अध्यात्म से नहीं जुड़ा है शायद वो दूसरों के विचारों का गुलाम ही होगा , जैसे मै था आचार्य जी से जुड़ने से पहले।
Shivansh Dixit
😌 🙏
Shikha
aatmgyan k Prakash m aur Chennai ki upastidhi m vivekpurna nirnay se hum jo bhi karenge aachcha hi hoga
Saguna
मुझमें भी पहले यही सिंड्रोम था। ओर फिर मैने उसका बहुत ही खामियाजा भोगा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है मुझे लगता ही नहीं था कि यह कंडीशनिंग है, मुझे लगता ये सब तो सही है मेरे अपने है मै ही बुरी हु। पर जीवनमे इसी परिस्थितियां आई कि मुझे सच में उनके साथ की जरूरत थी तब कोई नहीं था। फिर समझ आया। अब में ये देख पाती हु कि मेरा यह वर्तन कहा से आ रहा है।
Sharma awanish
जो सत्य की तरफ ले जाए बस वहीं चीज अच्छा है।
Sunita
👉दुसरो की नजर मैं अपनी बात,अपना विवेक दबाना अच्छी(स्वर्थो के अनुसार ) बात नही, क्युकी दूसरे खुद बर्बाद है,वो लोगो को बर्बादी और बेईमानी के साथ आगे बढ़ायेगे। क्युकी वो भी उन्ही सुरक्षित रास्तो से होकर आय है, उन्हें पता है, की जीवन मैं स्वार्थ के साथ ही जीना उनके हिसाब से एक सफल जीवन है।तो इन सब को देखकर अगर मैं भी सब लोगो की तरह वैसा ही जीवन जीना सूरू करुँगी, तो मुझे और ज्यादा इज्जत और बड़ाई मिलेगी। जों मुझे संस्कार के नाम पर मुझसे अपने स्वार्थ पूरा करने की मशीन बना देंगे। और ज़ब मैं खुद से इस गुलामी को स्वीकार करुँगी, तो धिरे -धिरे मेरी क़ीमत भी नही रहेगी, और मैं कमजोर बन जाऊगी, मानसिक और शरीरक तोर पर फिर वो लोग अपना असली चेहरा भी लायगे तो भी मैं कुछ नही कर पाऊँगी। ये समझ ज़ब आएगी तब तक देर चुकी होंगी, अब चुनाव करने का अधिकार है, और सच्चाई जानने का समय है, इन सब good girl वाले चोचले छोड़ना है, और मुझे जानना है, खुद के बारे मे फिर अविधा के बारे मे उसके बाद कोई मान्यताओं नही चलेगी। सच्चाई ही बताई जायगी किसीको अच्छी या बुरी लेगे तो लगे। मुझे क्या🤷♀️?
👉अच्छा का मतलब जों आमलोगो की परिभाषा है वो ऐसे है।= अच्छा माने लोगो के स्वर्थो के हिसाब से चलना उनके हाथो की कठपुतली बनकर जैसे नचाय वैसे नाचना, और अगर कुछ सवाल किया जाय तो,कहते है। छोरी हाथ से निकल गयी, पहले सामने आवाज तक नही निकलती थीं, अब तो हमारे सामने सवाल करने लगी है। ऐसे बोलकर हमें शांत करते रहना, और उन्हें सही मानकर गलत को सही समझकर जीना यही अच्छी लड़की की पहचान होती है, जिसके बाद अगर उसकी शादी होगयी फिर कोई प्रॉब्लम हो वो खुद देखेगी, हमारा कोई हक़ नही ऐसे कह कर पीछे हट जाते है, वो अच्छे लोग जों संस्कार की नदिया बहाया करते है। वो सब जों हमें प्यार के नाम पर कमजोर करते है,और फिर हम कही के नही रहते ।
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Tara Shukla
अच्छा के बजाय सच्चा बनना आवश्यक है। अच्छा कहलाने के चक्कर में
हम अपनी मौलिकता खो देते हैं।
धन्यवाद🙏
Sunita BARANWAL
अच्छा बनना है —यह हमारे रोम रोम में समा दिया गया है।
KUSUM Bhakuni
अच्छा मतलब खुद के साथ क्रूरता न करना।
SUMAN
अच्छी लड़की 👧 कहलाने वाली छवि, कभी नहीं बनानी चाहिए, यह बहुत खतरनाक है, हर लड़की के लिए, वह सबके लिए तो अच्छी बन जाती है, लेकिन ख़ुद के लिए
अनजानी हो जाती है,
Mitali Das
समाज में बचपन से ही लड़कियों को रहन सहन पहनावा बात मानना इन्हीं सब कामों से अच्छी बुरी का पहचान करा जाता हे। आज भी कुछ नहीं बदला। घरवालों की अनुमति के बिना शादी करना फिर ससुराल में ससुराल के बिना अनुमति की कुछ भी करना खाना पहनना इसमें बुरी बेटी बुरी बहु तोह बन सुकी फिर अलग रही दूसरा दिक्कत की वजह से। फिर कल ही की बात हे खुद के दुकान में एक ड्रेस पहनकर गई जिसमें कोई बुराई नहीं थी लड़कियों वाली ड्रेस ही थे फिर आज ओर एक ड्रेस पहनकर गई तोह पति बोला आज वाली ड्रेस के लिए, है यही सब ड्रेस पहनकर आना दुकान में कल वाली वो सब ड्रेसेस पहनकर मत आना अच्छा नहीं लगता। तोह ड्रेस के वजह से में बुरी बन गई वो भी ठीक ही थी ड्रेस।
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BYOM KUMAR
अच्छा मतलब अपने बोध अपने समझ से चले |
Ruchika Pandya
मुझे भी बचपन से अच्छा बनने की ही शिक्षा मिली थी 😇
Pratibha Gupta
achchi bachchi or bahu bankar hamane bahut kuch kho diya ...
Hema
सही काम में बुराई ही मिलती है पर बंधनों को तोड़ना है तो सत्य को जीवन में उतारना ही पड़ेगा
Uma Soni
वाकई में यह बात बिल्कुल 100% सच है कि छोटी सी लड़कियों को यह बोला जाता है कि:
- तुम्हें यह नहीं करना, वो नहीं करना, ऐसे करना, वैसे करना
- बड़ों के सामने नजरेनीचे रखना
- बalki उनकी बातों को ध्यान से सुनना, मानना
- कपड़ों के आधार पर, reason के आधार पर, बातचीत करने के आधार पर
सभी में एक दिशा-निर्देश रहता है, जो कि शुरू से हमें अपने द्वारा रखना पड़ता है और उस उच्चतम संभावना तक नहीं पहुंच पाती, जहां हमें पहुंचना चाहिए।
इसलिए यह चीज़ आज के समय में लड़कियों के लिए बहुत सी जागरूकताएँ आचार्य जी के माध्यम से आई हैं। उन्होंने नहीं कह सकते कि लड़कियों को और लड़कों को एक समान मानने की पहल की है। उन्होंने कहा कि gender में फर्क नहीं होना चाहिए।
चेतना वो महत्वपूर्ण चेतना है। सबसे बड़ी बात यह है कि हम stri को देह नहीं बरन चेतना मानें। चेतना मानने से सारी अलगाव-वाद दृष्टियाँ समाप्त हो जाती हैं और एक सोच उचित सम्मान की ओर जाती है।
धन्यवाद acharya जी। 🙏❤️
✍🏻 पोस्ट 27 | 23 सितंबर '26 💭 विषय — लोकधर्म ───────── “गुड गर्ल सिंड्रोम” 👧 बचपन से ही…