
युगेश्वरी साहू
पहले मेरे लिए भी अच्छे की परिभाषा यही थी कि मैं जो भी करूं उसमें मुझे प्रशंसा मिले ,स्वीकृति मिले सब की नजरों में अच्छी रहूँ। किंतु वास्तव में अच्छे की परिभाषा क्या है वह गीता सत्रों में आकर ही जाना अच्छा वह है जो सत्य के अनुसार हो, जिसमें स्वार्थ, डर और अहंकार से लिए गए फैसलों की जगह विवेक हो।















