✍🏻 पोस्ट 6 | 27 सितंबर '26
💭 विषय — भूगोल──────────
🌍 आपके पैरों के नीचे की ज़मीन लगातार खिसक रही है!
ज़रा अपने पैरों के नीचे देखिए।
मिट्टी, सड़क, घर, पहाड़...
सब कुछ कितना स्थिर लगता है, है ना?
लेकिन जिस धरती को हम बिल्कुल स्थिर मानकर चलते हैं, उसके महाद्वीप लगातार खिसक रहे हैं। 🌏
🧩 ऐसा कैसे?
पृथ्वी की बाहरी ठोस परत कई बड़ी-बड़ी tectonic plates में बंटी हुई है। ये प्लेटें पृथ्वी के भीतर होने वाली प्रक्रियाओं के कारण बहुत धीमी ग…
कई बार जो चीज़ हमें बिल्कुल निश्चित लगती है, वह वास्तव में सत्य की वजह से नहीं, बल्कि बार-बार सोचने, सुनने, मानने और दोहराने की आदत के कारण निश्चित लगती है।
Soni Kumari
अंहकार कभी मै को देखने ही नहीं देता है
Madhu
नहीं मुझे नहीं लगता है कि हमे निश्चित और ठोस लगता हैं मैने इसे कभी इमानदारी से देखने के लिए वो नजर ही नहीं था
लेकिन अब अचार्य जी से जुडने के बाद पता चला
Rubiya jamadar
Yes, I have been observing the 'I', watching how it thinks and desperately believes that it is a solid entity.
As I watch the movement of the "I," I see how rigid and stubborn it truly is. It avoids the real work of self-observation.
Instead, the "I" tries to change through collecting data. It reads scriptures, attends lectures, and listens to spiritual talks. It believes that gathering more adhyatmik gyan will break its old patterns and wash away the old self.
The "I" refuses to stay with itself.
This resistance arises within me often—or rather, I actively choose to refuse the work of observing myself consistently. This forgetfulness is not accidental; 'I' constantly choose to avoid deep, honest self-observation.
The 'I' stays asleep until an external force (like sessions or books) shakes it awake and gently gives the reminder to ask -who am I?.
It prefers the comfort of sleep over the discomfort of seeing its own illusions.
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Meena Kumari Meena
मै को देखना ईमानदारी का सामना करना है ।तभी वह देख पाएगा नहीं तो कुछ समझ नहीं आएगा क्या है x , मेरी पहचान,मेरी मान्यता, विचार , मेरी कहानी । मुझे यहां निश्चिंत ,ओर ठोस जैसा अभी तो कुछ लगता ही नहीं ,क्या होगा क्योंकि सब कुछ तो बदल रहा है।
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Khushboo Upadhyay
jo mujhe sabse adhik thos or nischit lagta hai main use imandari se dekha hai lekin purani vriti or smriti ke prabhav ke karan hadat ke roop me apna bana liya hai
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Khusbu Barskar
नही देख पाई मै और मै और मेरे के अलावा कुछ नही dekhta hai
Ritik
❓ क्या जो मुझे सबसे अधिक निश्चित और ठोस लगता है, मैंने कभी उसे ईमानदारी से देखा है, या केवल उसकी आदत पड़ गई है?
ज्यादातर तो ऐसा ही लगता है कि उसकी आदत पड़ गई है मुझको
Dipali sharma
ab samajh a Raha hai gita satro se judane ke bad mai hi mai bas nahi hun
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Rupesh Kumar
मैं अभी तक नहीं देखा तो संभवत है कि उसकी आदत पड़ गई है
Neha Kumari
> अक्सर जिसे हम अपना स्थिर सत्य मानते हैं, वह केवल पुरानी पहचान, आदत और मान्यताओं का जमा हुआ रूप होता है। उसे ईमानदारी से देखने पर पता चलता है कि “मैं” भी उतना ठोस नहीं, जितना हमने मान रखा है।
Shikha
phle to sirf m hi m thi ab drasti aa rahi h Aacharya ji k sath
Nitesh pal
उसी बनी हुई स्थिति को देख रहा हूँ जो पहले से यह मानकर बैठा हुआ है, कि मैं ऐसा ही हूँ। लगातर इसी को घटाने में लगा हूँ।
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Lovely Singh
जो चीज़ हमें स्थिर, ठोस और निश्चित दिखाई देती है, वह वास्तव में हमेशा वैसी हो—यह ज़रूरी नहीं। जैसे पृथ्वी की प्लेटें धीरे-धीरे लगातार बदल रही हैं, वैसे ही हमारे भीतर का “मैं” भी केवल एक बनी हुई पहचान, धारणाओं और आदतों का मेल हो सकता है। इसलिए अपनी पहचान को बिना जाँचे सच मान लेने के बजाय उसे ईमानदारी से देखना ही आत्मदर्शन की शुरुआत है।
A Chinnaswamy
imandhari। se dekha hi nahin bas aadat padi hui thi
KHUSHBU RAI
humne dekha hi nahin iski aadat pad gai
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Ashwani Kumar
अब कभी-कभी देख पाता हूं लेकिन ज्यादातर उसे मैं की आदत पड़ गई है
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Swati singh
आदत पड़ गई है ईमानदारी से कभी देख नहीं देखती तो बेईमानी तो दिख ही जाती ।
Ishika sharma
ईमानदारी से नहीं देखती हु मै क्योंकि जब देखूंगी तब अहंकार को चोट लगती है। जिससे लगता है जो है सही इसी प्रकार आदत पड़ गई है। क्योंकि अपने अहंकार को देखना ही नहीं चाहते है। जब देखेंगे तब अपने भीतर हर तरह का सही गलत दिखने लगेगा। जैसे ही देखना शुरू करते है तब अपने आप सच्चाई की दिशा में चलने लगती है। फिर जो भ्रम है सब टूटने लगता है।
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Kumar kundan
केवल उसकी आदत पड़ गई है,
Ajad Yadav
आदत पड़ गई है। लेकिन अब ईमानदार से देखते और समझते हैं।
Rohit kumar kushwaha
हां हम ईमानदारी से नहीं देखे हैं आदत
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Priyanshu
❓ क्या जो मुझे सबसे अधिक निश्चित और ठोस लगता है, मैंने कभी उसे ईमानदारी से देखा है, या केवल उसकी आदत पड़ गई है?
=>उसकी आदत पड़ गई है।
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Gudiya singh
हम अपने मै की गिरफ्त में जकड़ गये हैं,लेकिन हमे उस मै से लड़कर बाहर आना होगा जो सच है उससे सवाल करना होगा,तभी अहंकार विघटित हो सकता है।
Pallavi
humne jo bhi rules-regulations, thoughts bana liya usko kabhi dekhne ki koshis nhi ki.
lekin jab se Acharya jii ko sunna start kiya hai tab se sirf questions hote hai her thoughts me or un questions ko imandari se dekhne ki koshis krti hu..
Gagandeep yadav
😔🥺
Sandeep Verma
भूगोल सभी विषय से जुड़ता है, प्रभावित करता है ।उसी तरह अहंकार हमारे सभी विषयों में शामिल होकर हमें प्रभावित करता है।
Tanu
हमने कभी ईमानदारी से देखा ही नहीं l इसकी आदत सी पड़ गई हैं l बचपन से जो करते आए हैं , समाज हमे बताता है वही सत्य लगता है l अब धीरे-धीरे समझ आ रहा है कि समाज अपने स्वार्थों के पीछे भागता है l इसलिये हमे आध्यात्म और वेदान्त को समझना चाहिए l सत्य को समझना चाहिए l
Shikha kumari
hamne bachapan se yahi shikhaya jata h isliye aadat pr gai h
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Manju Saini
हमें आदत हो गई थी लेकिन अब पता चला है जबकि पहले कभी ध्यान ही नहीं दिया कि ऐसा भी होता हैं ये अहंकार आखिर कितना बड़ा है कितनी जड़ें जमाए बैठा है
पर जैसे ही सच पता चलता हैं तो अहंकार टूट जाता हैं
✍🏻 पोस्ट 6 | 27 सितंबर '26 💭 विषय — भूगोल ────────── 🌍 आपके पैरों के नीचे की ज़मीन लगातार…