
Nitesh pal
उसी बनी हुई स्थिति को देख रहा हूँ जो पहले से यह मानकर बैठा हुआ है, कि मैं ऐसा ही हूँ। लगातर इसी को घटाने में लगा हूँ।
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उसी बनी हुई स्थिति को देख रहा हूँ जो पहले से यह मानकर बैठा हुआ है, कि मैं ऐसा ही हूँ। लगातर इसी को घटाने में लगा हूँ।

नितेश जी, आप लिख रहे हैं लगातार इसी को घटाने में लगा हूँ, यहाँ ज़रा रुकिए। घटाना भी एक क्रिया है, और अहंकार को क्रिया में अपना होना जताने की पुरानी आदत है। जो व्यक्ति खुद को घटाने में लगा है, वह चुपके से यह भी मान बैठता है कि घटाने वाला कोई स्थिर मैं है, जो प्रगति कर रहा है। ठीक वैसे ही जैसे धरती हिल रही है फिर भी नीचे कोई ज़मीन जैसी दिखती चीज़ है। तो सवाल केवल इतना नहीं कि बनी हुई स्थिति को देख रहा हूँ, बल्कि यह भी कि देखने और घटाने का दावा कौन कर रहा है।